सौरभ वार्ष्णेय
जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व सांसद आजम खान को गाजियाबाद की विशेष पीएमएलए अदालत ने 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है। उन्हें डासना जेल में रखा जाएगा। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) अब उनसे पुलिस कस्टडी में पूछताछ के लिए रिमांड लेने की तैयारी कर रहा है। जांच एजेंसी का आरोप है कि जौहर यूनिवर्सिटी के निर्माण और उसके वित्तीय प्रबंधन में सरकारी धन के कथित दुरुपयोग तथा वित्तीय अनियमितताओं की आशंका है। आजम खान की गिरफ्तारी ने एक बार फिर देश की राजनीति में जांच एजेंसियों की भूमिका, राजनीतिक जवाबदेही और कानून के निष्पक्ष इस्तेमाल को लेकर बहस छेड़ दी है।
लोकतंत्र में कानून का शासन सर्वोपरि होता है। किसी व्यक्ति का राजनीतिक कद कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि उसके विरुद्ध वित्तीय अनियमितताओं या भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं तो जांच होनी चाहिए। सार्वजनिक जीवन में रहने वाले व्यक्तियों की जवाबदेही आम नागरिकों से कम नहीं, बल्कि अधिक होनी चाहिए। लेकिन इसके साथ ही यह भी उतना ही आवश्यक है कि जांच की प्रक्रिया निष्पक्ष, पारदर्शी और संविधान की मर्यादाओं के अनुरूप हो। किसी व्यक्ति को राजनीतिक पहचान के आधार पर न तो अपराधी माना जा सकता है और न ही राजनीतिक सहानुभूति के आधार पर आरोपों से मुक्त किया जा सकता है।
आजम खान उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक चर्चित और प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। रामपुर की राजनीति से राष्ट्रीय स्तर तक अपनी पहचान बनाने वाले आजम खान समाजवादी पार्टी के प्रमुख नेताओं में शामिल रहे हैं। उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री और सांसद के रूप में उनकी राजनीतिक भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में उनके विरुद्ध दर्ज विभिन्न मुकदमों और कानूनी कार्रवाइयों ने उनके राजनीतिक जीवन को लगातार प्रभावित किया है। अब जौहर यूनिवर्सिटी से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में ईडी की कार्रवाई ने उनके सामने एक नई कानूनी चुनौती खड़ी कर दी है।
इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आजम खान लगभग 11 महीने जेल में रहने के बाद शनिवार को रामपुर जेल से बाहर आए थे। लेकिन उनकी रिहाई की खुशी अधिक समय तक नहीं टिक सकी और प्रवर्तन निदेशालय ने उन्हें दूसरे मामले में हिरासत में ले लिया। रविवार को गाजियाबाद की विशेष अदालत ने उन्हें 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। अब ईडी उनसे जौहर यूनिवर्सिटी की स्थापना, उसके निर्माण में इस्तेमाल धन, फंडिंग के स्रोत और कथित मनी ट्रेल के संबंध में पूछताछ करना चाहती है। यह पूरा घटनाक्रम कई गंभीर सवाल खड़े करता है।
सबसे पहला सवाल जौहर यूनिवर्सिटी के वित्तीय प्रबंधन का है। किसी भी शैक्षणिक संस्थान की स्थापना और संचालन के लिए धन की आवश्यकता होती है। यदि किसी संस्थान को सरकारी सहायता, निजी दान या अन्य वित्तीय स्रोतों से धन मिला है तो उसका पूरा हिसाब-किताब सार्वजनिक और कानूनी मानकों के अनुरूप होना चाहिए। आखिर धन कहां से आया, किस उद्देश्य से प्राप्त हुआ और उसका उपयोग किन कार्यों में किया गया? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों और वित्तीय साक्ष्यों के आधार पर सामने आना चाहिए। यदि सरकारी धन के दुरुपयोग या अवैध लेन-देन के प्रमाण मिलते हैं तो दोषियों के विरुद्ध कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल आरोपों के आधार पर किसी को दोषी ठहराना न्याय के सिद्धांतों के विरुद्ध होगा।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और उनकी कार्यप्रणाली से जुड़ा है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्षी दलों के अनेक नेताओं पर केंद्रीय जांच एजेंसियों की कार्रवाई को लेकर राजनीतिक विवाद सामने आते रहे हैं। विपक्ष अक्सर आरोप लगाता है कि जांच एजेंसियों का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को दबाने के लिए किया जा रहा है, जबकि सरकार और जांच एजेंसियां इन कार्रवाइयों को कानून के तहत की गई जांच बताती हैं। ऐसे में जनता के मन में उठने वाले संदेहों को दूर करना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। इसका सबसे प्रभावी तरीका यही है कि जांच एजेंसियां अपने प्रत्येक कदम को ठोस साक्ष्यों और कानूनी प्रक्रिया के आधार पर उचित ठहराएं।
आजम खान के मामले में भी समाजवादी पार्टी की ओर से राजनीतिक प्रतिशोध के आरोप लगाए जा सकते हैं, लेकिन इन आरोपों की सत्यता का फैसला अदालत और उपलब्ध साक्ष्य ही करेंगे। इसी तरह ईडी के आरोपों को भी अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। जांच और मुकदमे के बीच अंतर समझना जरूरी है। न्यायिक हिरासत में भेजे जाने का अर्थ दोष सिद्ध होना नहीं है। भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष सुनवाई और कानूनी बचाव का अधिकार देता है। आजम खान को भी यह अधिकार पूरी तरह मिलना चाहिए।
इस प्रकरण का एक व्यापक पक्ष शिक्षा और सार्वजनिक संस्थानों की विश्वसनीयता से भी जुड़ा है। जौहर यूनिवर्सिटी जैसे संस्थान केवल किसी व्यक्ति या राजनीतिक दल की संपत्ति नहीं होते, बल्कि उनसे हजारों विद्यार्थियों और कर्मचारियों का भविष्य जुड़ा होता है। यदि वित्तीय अनियमितताओं के कारण किसी विश्वविद्यालय की गतिविधियां प्रभावित होती हैं तो सबसे अधिक नुकसान विद्यार्थियों को उठाना पड़ता है। इसलिए जांच के दौरान यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था और विद्यार्थियों के हित अनावश्यक रूप से प्रभावित न हों।
राजनीतिक दलों को भी इस मामले में संयम बरतने की जरूरत है। सत्ता पक्ष को जांच को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करने से बचना चाहिए और विपक्ष को भी हर कानूनी कार्रवाई को राजनीतिक साजिश बताकर खारिज नहीं करना चाहिए। लोकतंत्र में न तो जांच एजेंसियां किसी सरकार की निजी संस्था हैं और न ही राजनीतिक नेता कानून से ऊपर हैं। इसी तरह सरकार को भी यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह जांच के नाम पर किसी नागरिक के संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी करे।
आजम खान का मामला केवल एक नेता की गिरफ्तारी या जेल भेजे जाने तक सीमित नहीं है। यह देश की न्याय व्यवस्था, जांच एजेंसियों की विश्वसनीयता और राजनीतिक जवाबदेही की कसौटी भी है। ईडी को यदि वित्तीय अनियमितताओं के प्रमाण मिले हैं तो उन्हें अदालत के सामने मजबूती से प्रस्तुत करना चाहिए। आजम खान को भी अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों का कानूनी जवाब देने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। अदालत को उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर निष्पक्ष निर्णय करना चाहिए।
लोकतंत्र की वास्तविक मजबूती इसी में है कि कानून का तराजू सत्ता और विपक्ष, प्रभावशाली और सामान्य नागरिक के बीच कोई भेदभाव न करे। अपराध साबित होने पर सजा मिले और निर्दोष होने पर सम्मानपूर्वक न्याय। आखिरकार न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि उसकी निष्पक्षता जनता को दिखाई भी देनी चाहिए। आजम खान प्रकरण में भी देश की निगाहें इसी न्यायिक कसौटी पर टिकी हैं।