अशोक “प्रवृद्ध”
तमसो मा ज्योतिर्गमय की सनातन उद्घोषणा का साक्षात स्वरूप दीपावली पर्व, भारतीय कालगणना और लोकचेतना का चरमोत्कर्ष है। कार्तिक मास की अमावस्या के सघन अंधकार को पराजित करती दीपकों की वह अनंत श्रृंखला जिसे हम दीपमाला कहते हैं, वास्तव में केवल मिट्टी के पात्रों में जलती हुई वर्तिका मात्र नहीं है,वह भारतीय समाज की सामूहिक समृद्धि, पारस्परिक सौहार्द और विकेंद्रीकृत आर्थिक सुदृढ़ता का दैदीप्यमान प्रतीक है किंतु समकालीन कालखंड में, वैश्वीकरण और अनियंत्रित उपभोक्तावाद के अंधानुकरण ने इस पावन आलोक-पर्व के मूल अधिष्ठान को ही संकट में डाल दिया है। जब भारत का उपभोक्ता वर्ग अपनी ही धरती के स्वेद (पसीने) से सिंचित उत्पादों को विस्मृत कर, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के आभासी मायाजाल (ओनलाईन प्लेटफॉर्म्स) के सम्मोहन में आबद्ध हो जाता है, तब दीपमाला की वह नैसर्गिक झड़ी एकाएक फीकी पड़ जाती है।
बाजार की इस बदली हुई प्रवृत्ति ने एक अत्यंत चिंताजनक और विरोधाभासी परिदृश्य उपस्थित कर दिया है। प्रतिवर्ष भारत की पावन धरा से अरबों-खरबों रुपयों का राजस्व समेटने वाली ये सीमापार की महाकाय कॉर्पोरेट इकाईयां, यहां के उत्सवों में केवल अपने लाभ के अवसर ढूंढती हैं। आपदा, महामारी अथवा किसी सामाजिक विपदा के समय इनका सामाजिक उत्तरदायित्व कागजी आंकड़ों से परे शून्य सिद्ध होता है। इसके विपरीत, हमारे ग्रामीण अंचलों, कस्बों, और नगरों की संकीर्ण गलियों में स्थित पारंपरिक व्यवसायी, जो हमारी अर्थव्यवस्था के वास्तविक रीढ़ हैं, वे अपनी दुकानों की चौखट पर बैठे ग्राहकों की राह टुकुर-टुकुरनिहारने को विवश हैं। यह विमर्श केवल व्यापारिक लाभ-हानि का नहीं है, अपितु यह भारतीय समाज, उसकी अर्थव्यवस्था, और शाश्वत सांस्कृतिक मूल्यों के अस्तित्व की रक्षा का शंखनाद है।
प्राचीन भारतीय मनीषियों ने अर्थ को धर्म, काम और मोक्ष के पुरुषार्थचतुष्टय में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान दिया है। किंतु भारत की आर्थिक दृष्टि कभी भी संकुचित, आत्मकेंद्रित या केवल लाभलोलुप नहीं रही। ऋग्वेद का सुप्रसिद्ध सूक्त उद्घोष करता है-
शतहस्त समाहर सहस्रहस्त संकिर।
अर्थात- सौ हाथों से धन का अर्जन करो, और हजार हाथों से उसका समाज में वितरण कर दो।
यह सूक्त स्पष्ट करता है कि धन का संचय कभी भी किसी एक सत्ता या दूरस्थ केंद्र में नहीं होना चाहिए, बल्कि उसका परिसंचरण स्थानीय समाज में निरंतर होते रहना चाहिए। जब धन स्थानीय स्तर पर घूमता है, तो वह समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचता है। इसके विपरीत, जब ऑनलाइन वाणिज्य के माध्यम से धन सीधे बहुराष्ट्रीय कंपनियों के विदेशी खातों में स्थानांतरित हो जाता है, तो अर्थतंत्र का यह नैसर्गिक प्रवाह अवरुद्ध हो जाता है।महाभारत के शांतिपर्व में भी राजा और समाज के लिए यह निर्देश है कि व्यापार और शिल्प का रक्षण इस प्रकार किया जाए कि स्थानीय उत्पादक कभी निर्धन न हों। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि जो राज्य अपने स्थानीय शिल्पियों, कृषकों और व्यापारियों (वैश्यों) की उपेक्षा कर विदेशी व्यापारियों को अनियंत्रित प्रश्रय देता है, वह अंततः अपनी आर्थिक संप्रभुता खो बैठता है। आचार्य चाणक्य लिखते हैं कि “कोष मूलो हि राजा”, परंतु यह कोष तभी सुदृढ़ रहता है जब प्रजा के भीतर क्रय-विक्रय की क्षमता जीवंत हो और कर का प्रवाह स्थानीय स्तर से उद्गम पाकर लोककल्याण में ही विलीन हो जाए।
वर्तमान डिजिटल युग में ईकॉमर्स ने सुविधा और गति के लुभावने आवरण में भारतीय बाजार पर एकाधिकार स्थापित कर लिया है। इस आभासी चमक-दमक के पीछे एक भयावह आर्थिक असंतुलन छिपा हुआ है। बहुराष्ट्रीय कंपनियां प्रेडेटरी प्राइसिंग (घाटा सहकर भी मूल्य कम करना) और डीप डिस्काउंटिंगकी अनैतिक रणनीतियों के बल पर स्थानीय खुदरा व्यापार को मरणसन्न स्थिति में पहुंचा रही हैं।इस कार- बार का सूक्ष्म अनुसंधानात्मक विश्लेषण करने से स्पष्ट होता है कि विदेशी पूंजी से संचालित ये मंच भारतीय उपभोक्ताओं से जो धन कमाते हैं, उसका 90 प्रतिशत से अधिक भाग देश की सीमा से बाहर चला जाता है।
इसे आधुनिक संदर्भों में दादाभाई नौरोजी के ड्रेन ऑफ वेल्थ (धन का निष्कासन) सिद्धांत के नवउपनिवेशवादी स्वरूप के रूप में देखा जा सकता है। 18वीं-19वीं शताब्दी में जो कार्य ईस्ट इंडिया कंपनी ने प्रत्यक्ष करों और बल प्रयोग के माध्यम से किया था, वही कार्य आज ये डिजिटल कंपनियाँ अल्गोरिदमऔर क्लिकके माध्यम से अत्यंत सूक्ष्मता से कर रही हैं।इसके विपरीत, भारत का पारंपरिक व्यापारी वर्ग, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद में एक विशाल योगदान देता है और कृषि के बाद सर्वाधिक रोजगार सृजित करता है, आज अपनी साख बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है। दीपावली जैसे बड़े त्योहारों पर, जहां पूर्व में इन दुकानों पर पैर रखने की जगह नहीं होती थी, आज वहां सन्नाटा पसरा हुआ है, जो किसी भी जीवंत अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं कहा जा सकता।
भारतीय समाज केवल एक बाजार नहीं है, यह एक वृहत परिवार है। यहां का व्यापारिक संबंध केवल क्रेता और विक्रेताका यांत्रिक संबंध नहीं है, अपितु यह एक भावनात्मक और सामाजिक अनुबंध है। यह आपदकाल का संबल है।जब कोई प्राकृतिक आपदा, महामारी, जैसे कोविड-19 या परिवार में आकस्मिक संकट आता है, तब कोई भी बहुराष्ट्रीय ऑनलाइन कंपनी किसी भारतीय नागरिक को उधार राशन या वित्तीय सहायता प्रदान नहीं करती। उस समय समाज का रक्षक वही स्थानीय किराना व्यवसायी या पारंपरिक दुकानदार होता है, जो बिना किसी क्रेडिट स्कोर के, केवल पारस्परिक विश्वासके आधार पर महीनों तक उधार देकर उस परिवार को भुखमरी से बचाता है। हमारे लोक-उत्सवों, जैसे दुर्गा पूजा, दीपावली, छठ पूजा, अथवा स्थानीय देवअनुष्ठानों में चंदे और सहयोग की जब बात आती है, तो ये स्थानीय व्यापारी ही अग्रणी भूमिका निभाते हैं। मोहल्ले की रामलीला से लेकर सामाजिक कन्यादान तक, इनका धन समाज के भीतर ही लोकमंगल के कार्यों में पुनर्निवेशित होता है।
ऑनलाइन खरीदारी ने मनुष्य को एक एकाकी उपभोक्ता बना दिया है। पारंपरिक बाजार में जाकर मोल-तोल करना, एक-दूसरे का कुशलक्षेम पूछना, और सुख-दुख साझा करना, हमारे सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करता था। डिजिटल स्क्रीन ने इस मानवीय संवेदना को समाप्त कर दिया है।गांधीवादी अर्थशास्त्री जे.सी. कुमारप्पा ने अपनी कालजयी कृति इकोनॉमी ऑफ परमानेंसमें स्पष्ट किया था कि एक स्थायी और अहिंसक अर्थव्यवस्था वही है, जो स्थानीय संसाधनों और स्थानीय उपभोग पर आधारित हो। जब हम स्थानीय स्तर पर क्रय करते हैं, तो हम एक गुणक प्रभावउत्पन्न करते हैं। उदाहरणस्वरूप, यदि आप दीपावली पर किसी स्थानीय कुम्हार से मिट्टी के दीपक खरीदते हैं तो वह धन उस कुम्हार के घर जाता है।वह कुम्हार उस धन से स्थानीय दर्जी से वस्त्र सिलवाता है।वह दर्जी स्थानीय कृषक से अन्न खरीदता है।इस प्रकार, वह एक छोटा सा धन समाज के अनेक परिवारों को आजीविका प्रदान करता हुआ घूमता रहता है। परंतु जब वही दीप या सजावटी सामान किसी विदेशी, ऑनलाइन मंच से खरीदा जाता है, तो वह धन तुरंत स्थानीय चक्र से बाहर निकलकर सीधे कॉर्पोरेट मुख्यालय में संचित हो जाता है, जिससे स्थानीयअर्थव्यवस्था में तरलताका गंभीर संकट उत्पन्न हो जाता है। यह केंद्रीकृत आर्थिक मॉडल अंततः समाज में भीषण आर्थिक असमानता को जन्म देता है।
समय आ गया है कि भारत का प्रबुद्ध समाज अपनी क्रयशक्ति के सामर्थ्य को पहचाने। हमारी क्रयशक्ति केवल एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं है, यह एक राष्ट्रनिर्माणका मत है। हमें यह विचार करना होगा कि हम अपना धन किसे सौंप रहे हैं, उसे जो हमारे सुख-दुख में हमारे साथ खड़ा रहता है, या उसे जिसके लिए हम केवल एक डेटा या उपभोग की वस्तु मात्र हैं। दीपावली की इस दीपमाला को वास्तव में सार्थक बनाने के लिए हमें स्वदेशी और स्थानीयताके संकल्प को पुनर्जीवित करना होगा। प्राचीन ग्रंथों का यही संदेश है, समकालीन अर्थशास्त्र की यही आवश्यकता है, और हमारे समाज की सुरक्षा का यही एकमात्र मार्ग है। आइए, इस दीपावली पर अपनी अंतरात्मा की पुकार सुनें, अपनी गलियों और कस्बों के उन दीपकों को बुझने से बचाएं जो सदियों से हमारी संस्कृति के संवाहक रहे हैं, और स्थानीय दुकानों से खरीदारी कर संपूर्ण भारतवर्ष को सच्चे अर्थों में प्रकाशमान करें।
अशोक प्रवृद्ध