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मासूम बचपन पर मजदूरी का बोझ: क्या बच्चों के संवैधानिक अधिकार सुरक्षित हैं?”

12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस

बाबूलाल नागा

   जब किसी होटल में चाय परोसता, किसी ढाबे पर बर्तन साफ करता या ईंट-भट्टे पर काम करता बच्चा दिखाई देता है, तब केवल एक बच्चा मजदूरी नहीं कर रहा होता बल्कि संविधान की आत्मा भी कहीं न कहीं घायल होती है। बच्चों के हाथों में किताबों और खिलौनों की जगह औजारों का होना इस बात का प्रमाण है कि विकास और अधिकारों के तमाम दावों के बावजूद समाज का एक हिस्सा अब भी अपने सबसे कमजोर नागरिकों को उनका बचपन नहीं दे पाया है। 12 जून, विश्व बाल श्रम निषेध दिवस, हमें इसी कठोर यथार्थ के सामने खड़ा करता है।

   भारत सहित दुनिया के करोड़ों बच्चों के सपनों पर गरीबी, शोषण और सामाजिक असमानता का ऐसा बोझ है कि उनका बचपन मजदूरी की भेंट चढ़ जाता है। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस हमें इसी कड़वी सच्चाई से रूबरू कराता है कि आज भी लाखों बच्चे स्कूलों के बजाय कारखानों, खेतों, होटलों, ईंट-भट्टों और घरों में काम करने को मजबूर हैं। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं है, बल्कि बच्चों के संवैधानिक अधिकारों और मानवाधिकारों पर सीधा हमला है।

   अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनिसेफ की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में लगभग 16 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न हैं। इनमें से करोड़ों बच्चे ऐसे कार्यों में लगे हैं जो उनके स्वास्थ्य, शिक्षा और मानसिक विकास के लिए खतरनाक हैं। भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 1.01 करोड़ बच्चे श्रमिक के रूप में कार्यरत पाए गए थे। विशेषज्ञों का मानना है कि कोविड-19 महामारी और आर्थिक संकट के बाद यह संख्या और बढ़ी है, हालांकि इसके अद्यतन आंकड़े अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।

   भारत का संविधान बच्चों को विशेष संरक्षण प्रदान करता है। अनुच्छेद 21- 6 से 14 वर्ष तक के बच्चों को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार देता है। अनुच्छेद 24 चौदह वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों और कारखानों में काम कराने पर रोक लगाता है। वहीं अनुच्छेद 39 (ई) और (एफ) राज्य को यह सुनिश्चित करने का निर्देश देता है कि बच्चों का शोषण न हो तथा उनका स्वस्थ विकास हो सके। ऐसे में जब कोई बच्चा मजदूरी करता दिखाई देता है, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं बल्कि संविधान की मूल भावना पर भी प्रश्नचिह्न है।

   सबसे बड़ा सवाल यह है कि आजादी के लगभग आठ दशक बाद भी बच्चों को श्रम करने के लिए क्यों मजबूर होना पड़ रहा है? इसका प्रमुख कारण गरीबी और सामाजिक असमानता है। अनेक परिवारों की आय इतनी कम होती है कि वे बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप बच्चे स्कूल छोड़कर परिवार की आय बढ़ाने के लिए काम पर लग जाते हैं। कई बार बिचौलिए और नियोक्ता भी सस्ते श्रमिक के रूप में बच्चों का शोषण करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि कार्य और शहरी क्षेत्रों में घरेलू कामकाज, ढाबों तथा छोटे उद्योगों में बाल श्रम आज भी बड़ी चुनौती बना हुआ है।

   बाल श्रम का सबसे गंभीर प्रभाव शिक्षा पर पड़ता है। जब बच्चा विद्यालय से दूर होता है तो उसके भविष्य के अवसर भी सीमित हो जाते हैं। वह कम आय वाले कार्यों तक ही सीमित रह जाता है और गरीबी का दुष्चक्र अगली पीढ़ी तक चलता रहता है। यही कारण है कि बाल श्रम केवल बच्चों की समस्या नहीं, बल्कि देश के विकास की भी समस्या है। जिस देश के बच्चे शिक्षित नहीं होंगे, उसका भविष्य भी मजबूत नहीं हो सकता।

   सरकार ने बाल श्रम रोकने के लिए कई कानून बनाए हैं। बाल एवं किशोर श्रम (प्रतिषेध एवं विनियमन) अधिनियम, 1986 में संशोधन कर बाल श्रम पर कड़े प्रावधान किए गए हैं। शिक्षा के अधिकार कानून ने भी बच्चों को विद्यालय से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसके बावजूद जमीनी स्तर पर प्रभावी निगरानी और सख्त कार्रवाई की कमी दिखाई देती है। कई स्थानों पर बाल श्रम खुलेआम जारी है, जो प्रशासनिक तंत्र की चुनौतियों को उजागर करता है।

   इस समस्या के समाधान के लिए केवल सरकार ही नहीं, समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी। यदि हम किसी होटल, दुकान, फैक्ट्री या घर में बच्चे से काम करवाते हैं या ऐसा होते हुए देखकर भी चुप रहते हैं, तो हम अनजाने में इस अपराध को बढ़ावा दे रहे हैं। बाल श्रम के खिलाफ जागरूकता, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, गरीब परिवारों के लिए सामाजिक सुरक्षा और रोजगार के बेहतर अवसर ही इस समस्या का स्थायी समाधान हैं।

   विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर हमें यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी बच्चे का स्थान कार्यस्थल नहीं, बल्कि विद्यालय और खेल का मैदान है। बचपन मजदूरी के लिए नहीं, सीखने और सपने देखने के लिए होता है। जब तक देश का हर बच्चा शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार प्राप्त नहीं कर लेता, तब तक संविधान में निहित सामाजिक न्याय का सपना अधूरा रहेगा। मासूम हाथों में औजार नहींकिताबें होनी चाहिएक्योंकि बचपन किसी की मजबूरी नहींबल्कि उसका जन्मसिद्ध अधिकार है।

बाबूलाल नागा