समाज

बिहार में बालिका शिक्षा का बदलता माहौल

डॉली कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार

बिहार के ग्रामीण इलाकों में बालिका शिक्षा में पिछले कुछ वर्षों में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि समय, संघर्ष और जागरूकता के छोटे-छोटे बीजों से उगकर एक बड़े पेड़ में बदल रहा है। आंकड़े भी इस बदलाव की गवाही देते हैं। साल 2001 में जहां बिहार में बालिका शिक्षा का स्तर मात्र 33.12 प्रतिशत था, वहीं 2021 तक यह बढ़कर 61.9 प्रतिशत तक पहुँच गया। यह सिर्फ एक संख्या नहीं, बल्कि लाखों लड़कियों के सपनों की उड़ान का प्रमाण है।

अगर देश स्तर पर देखा जाए, तो भारत में महिला साक्षरता दर 2001 में लगभग 53.7 प्रतिशत थी, जो 2021 तक बढ़कर करीब 70 प्रतिशत के आसपास पहुंच गई है। बिहार जैसे राज्य, जो कभी शिक्षा के मामले में पीछे माने जाते थे, वहाँ यह बदलाव और भी महत्वपूर्ण हो जाता है। बिहार में कुल साक्षरता दर 2021 के आसपास 70 प्रतिशत के करीब है, जबकि महिला साक्षरता भी तेजी से बढ़ रही है। मुजफ्फरपुर जिले की बात करें, तो यहां भी शिक्षा के प्रति लोगों की सोच में बदलाव देखने को मिला है, खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में। मुसहरी ब्लॉक के सितुआरा गांव में यह बदलाव साफ दिखाई देता है, जहाँ अब लड़कियाँ सिर्फ घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि स्कूल और कॉलेज की ओर भी कदम बढ़ा रही हैं।

सितुआरा गांव की 20 वर्षीय चंदा इसकी जीती-जागती तस्वीर है। वह बीए की पढ़ाई कर रही है और साथ ही प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी जुटी हुई है। उसकी आँखों में एक अलग ही आत्मविश्वास झलकता है, जैसे वह अपने साथ-साथ पूरे गांव की सोच को बदलने का सपना देख रही हो। चंदा बताती है कि पहले गांव में लड़कियों की पढ़ाई को इतना महत्व नहीं दिया जाता था, लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। वह अपनी किताबों को सिर्फ पढ़ाई का साधन नहीं, बल्कि अपनी आज़ादी की चाबी मानती है। उसके लिए शिक्षा सिर्फ डिग्री नहीं, बल्कि खुद के पैरों पर खड़े होने का रास्ता है।

इस बदलाव के पीछे बिहार सरकार की “मुख्यमंत्री कन्या उत्थान योजना” ने एक अहम भूमिका निभाई है। इस योजना के तहत लड़कियों को जन्म से लेकर स्नातक तक विभिन्न चरणों में आर्थिक सहायता दी जाती है, जिससे उनके परिवारों को शिक्षा का खर्च उठाने में मदद मिलती है। इससे न सिर्फ स्कूल में नामांकन बढ़ा है, बल्कि ड्रॉपआउट दर में भी कमी आई है। सितुआरा गांव में कई परिवारों ने इस योजना का लाभ उठाकर अपनी बेटियों को आगे पढ़ने के लिए प्रेरित किया है।

लेकिन इस चमकती तस्वीर के पीछे कुछ कमियाँ भी हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। इसी गांव की 13 वर्षीय चंदा की कहानी इस सच्चाई को उजागर करती है। उसने 9वीं कक्षा के बाद स्कूल छोड़ दिया, क्योंकि उसके परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं थी कि वह पढ़ाई जारी रख सके। उसके पिता का सैलून का एक छोटा सा रोजगार है, जिससे घर का खर्च मुश्किल से चलता है। पांच बच्चों के पालन-पोषण के लिए उसकी माँ भी दूसरों के खेतों में काम करने जाती है। ऐसे में घर की जिम्मेदारी संभालने के लिए चंदा को अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ी। लेकिन उसके अंदर पढ़ने का जुनून आज भी जिंदा है। जब वह दूसरों को स्कूल जाते देखती है, तो उसकी आँखों में एक अधूरा सपना तैर जाता है।

आर्थिक तंगी के साथ-साथ सामाजिक सोच भी एक बड़ी बाधा है। सितुआरा गांव में आज भी कुछ परिवार ऐसे हैं, जहाँ लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर दी जाती है। शादी के बाद उनकी पढ़ाई लगभग खत्म हो जाती है, और उनके सपने धीरे-धीरे जिम्मेदारियों के बोझ तले दब जाते हैं। यह स्थिति बताती है कि सिर्फ योजनाओं और आंकड़ों से बदलाव पूरा नहीं होता, बल्कि समाज की सोच में बदलाव भी उतना ही जरूरी है। अब सवाल यह है कि इस गैप को कैसे पूरा किया जाए? इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को और अधिक सहायता दी जाए, ताकि कोई भी लड़की सिर्फ पैसों की कमी के कारण अपनी पढ़ाई न छोड़े। साथ ही, गांव स्तर पर जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए, जिससे लोगों को यह समझाया जा सके कि कम उम्र में शादी करने से लड़कियों का भविष्य प्रभावित होता है। स्कूलों की पहुंच और गुणवत्ता में सुधार भी जरूरी है, ताकि पढ़ाई का माहौल बेहतर हो सके।

फिर भी, यह कहना गलत नहीं होगा कि बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में लड़कियों की शिक्षा को लेकर एक नई जागरूकता पैदा हुई है। अब माता-पिता यह समझने लगे हैं कि बेटी को पढ़ाना सिर्फ उसका हक नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज के विकास का रास्ता है। स्कूलों में बढ़ती संख्या, कॉलेज जाती लड़कियां, और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करती युवतियाँ इस बदलाव की मजबूत नींव हैं। इसके अलावा, स्थानीय स्तर पर ऐसी पहल की जानी चाहिए, जहां पढ़ाई छोड़ चुकी लड़कियों को दोबारा शिक्षा से जोड़ा जा सके।

डिजिटल शिक्षा और स्किल ट्रेनिंग को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि लड़कियाँ अपने लिए नए अवसर तलाश सकें। सबसे अहम बात, समाज को यह समझना होगा कि हर लड़की के सपने उतने ही कीमती हैं, जितने किसी लड़के के। ऐसे में केवल संसाधनों की कमी से किसी लड़की को शिक्षा से वंचित करना उसके सपनों की उड़ान में रुकावट की तरह है। जिसे दूर करना सरकार, प्रशासन, नीति निर्धारकों और जनप्रतिनिधियों के साथ साथ स्वयं समाज की भी प्राथमिकता होनी चाहिए।