राजनीति

हो सकता है सीजेपी का राजनीतिक दौर शुरू : किसे होगा सबसे अधिक खतरा

राजेश श्रीवास्तव

कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी यह नाम एक मजाक था और सीजेपी सूर्यकांत के ‘तिलचट्टे’ वाले बयान का जवाब. अब यह मजाक भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा सवाल बन गया है. जिसे कभी ‘तिलचट्टे’ कहकर नकारा गया, वही आज ‘कॉकरोच’ बनकर इतना फैल गया कि उसे नजरअंदाज करना मुश्किल है. अब हर किसी के मन में एक ही सवाल है कि अगर यह सीजेपी असली राजनीतिक पार्टी बन गई तो किसका बेस खा जाएगी और ऐसा होने की कितनी संभावना है। अगर सीजेपी राजनीति में आई तो किसका वोट काटेगी? दरअसल सीजेपी के राजनीति में आने के बाद उसके निशाने पर 3 बड़े टारगेट हो सकते हैं।

लेकिन क्या सीजेपी के राजनीतिक पार्टी बनने की कोई संभावना है? इतिहास गवाह है आंदोलन पार्टी बनते है। 1974 के जयप्रकाश नारायण आंदोलन ने 1977 में जनता पार्टी को जन्म दिया, जिसने कांग्रेस को हराया. 2०11 के अन्ना आंदोलन ने आप को जन्म दिया. दोनों ही आंदोलन सत्ता विरोधी थे, दोनों ने नई पार्टियों को जन्म दिया. सीजेपी भी एक सत्ता विरोधी आंदोलन है. आंदोलन से पार्टी बनने का फॉर्मूला भारत में पहले भी काम कर चुका है और सीजेपी के साथ भी हो सकता है.

सीजेपी ने 29.6 मिलियन इंस्टाग्राम फॉलोअर्स बटोर लिए हैं. यह संख्या किसी भी भारतीय राजनीतिक दल से कम नहीं है. सोशल मीडिया पर इसका दबदबा है. इतनी बड़ी डिजिटल मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. भारत में कोई भी नागरिक समूह चुनाव आयोग में आवेदन करके राजनीतिक पार्टी रजिस्टर कर सकता है. हरियाणा के एक वकील ने पहले ही सीजेपी को रजिस्टर्ड करने की मांग कर दी है. कानूनी तौर पर सीजेपी के पार्टी बनने में कोई रोड़ा नहीं है.

हालांकि सीजेपीके राजनीतिक पार्टी न बनने के बड़े तर्क हैं। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने 16 जून 2०26 को नागपुर में प्रदर्शन के बाद साफ कह दिया कि सीजेपी चुनाव नहीं लड़ेगी. अभी तक सीजेपी का कोई भी आधिकारिक बयान इससे अलग नहीं आया है. जब तक सीजेपी का नेतृत्व अपना फैसला नहीं बदलता, पार्टी बनने की संभावना कम है.

राजनीतिक पार्टी बनने के लिए सिर्फ सोशल मीडिया फॉलोअर्स काफी नहीं होते. चाहे बीजेपी हो, कांग्रेस हो या आप, सभी के पास बूथ-लेवल वर्कर्स, स्पष्ट पार्टी संरचना, फंडिग, उम्मीदवारों का चयन मानदंड और जमीनी संगठन होता है. सीजेपी के पास अभी इनमें से कुछ भी नहीं है. सोशल मीडिया की ताकत को जमीनी ताकत में बदलना आसान नहीं है.

सीजेपी का एजेंडा अभी सिर्फ नीट पेपर लीक और शिक्षा मंत्री के इस्तीफ़े तक सीमित है. राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए अर्थव्यवस्था, राष्ट्रीय सुरक्षा, रोजगार, किसान और क्षेत्रीय मुद्दों पर स्पष्ट नीतियां चाहिए. सीजेपी के पास अभी यह नहीं है.

सीजेपी को ‘आप-लाइट’ कहा जा रहा है. आप ने 2०11 के अन्ना आंदोलन से जन्म लिया लेकिन उसे राष्ट्रीय स्तर पर सफलता हासिल करने में सालों लग गए. सीजेपी के सामने भी यही चुनौती है कि क्या यह सिर्फ एक डिजिटल घटना बनकर रह जाएगी या असली राजनीतिक ताकत बनेगी?

पहला आम आदमी पार्टी – यानि ‘सेम एंटी-एस्टैब्लिशमेंट, न्यू जनरेशन’। सीजेपी की तुलना सबसे पहले आप से हो रही है. यह तुलना बेमानी नहीं है. सीजेपी का जन्म 2०11 में अन्ना हजारे के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से हुआ था. उसका नारा था, ‘सिस्टम बदलो’. सीजेपी का जन्म 2०26 में नीट पेपर लीक और सीजेआई के ‘तिलचट्टे’ वाले बयान से हुआ. इसका भी नारा है, ‘सिस्टम बदलो.’ आप ने पिछले एक दशक में जो किया, वो सीजेपी ने कुछ हफ्तों में कर दिखाया. इंस्टाग्राम पर 25.9 मिलियन से ज्यादा फॉलोअर्स हासिल कर लिए. यह संख्या बीजेपी के आधिकारिक इंस्टाग्राम अकाउंट से भी ज्यादा है. एक इलेक्शन स्ट्रैटेजिस्ट ने तो एक्स पर पोस्ट कर दिया, ‘आप ने दिल्ली और पंजाब में कांग्रेस को खत्म किया. अब देखते हैं सीजेपी आप को कहां खत्म करती है.’

सीजेपी का ‘एंटी-एस्टैब्लिशमेंट’ वाला एंगल, उसका युवा चेहरा और डिजिटल नेटवर्क आप के कोर वोटर को लुभाने के लिए काफी है. आप का बेस शहरी मध्यम वर्ग और युवा है और यही सीजेपी का सबसे मजबूत बेस है. अगर सीजेपी चुनावी मैदान में उतरी, तो सबसे पहला नुकसान आप को ही होगा.

दूसरे नंबर पर कांग्रेस है. जो आवाज नहीं बन पाई, वही आवाज खा जाएगी। और यहां दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस के अंदर ही दो राय हैं.एक तरफ कांग्रेस सीजेपी के मुद्दों के खुलेतौर पर सपोर्ट कर रही है. राहुल गांधी ने तीन मांगें रखी हैं और सीजेपी के साथ खड़े नजर आ रहे हैं. दूसरी तरफ, कांग्रेस को अंदर ही अंदर यह डर भी सता रहा होगा कि कहीं सीजेपी उनका ही वोट न काट ले. सीजेपी की लोकप्रियता दिखाती है कि युवाओं के मन में कितनी छटपटाहट है. इसका मतलब यह भी है कि लोगों को विपक्ष में कोई उम्मीद नहीं दिखती.

एक्सपर्ट्स का कहना है कि सीजेपी की ताकत कांग्रेस की कमजोरी है. कांग्रेस के पास वो युवा चेहरा, वो डिजिटल कनेक्ट और वो ‘बदलाव’ वाला नारा नहीं है जो सीजेपी के पास है. अगर सीजेपी चुनाव लड़ी, तो कांग्रेस का ‘युवा और शहरी’ वोटर सीधे सीजेपी के पास जा सकता है.

तीसरे नंबर पर भाजपा है। यहां एक उल्टा गणित है. अगर सीजेपी ने कांग्रेस को खा लिया और आप का भी वोट काट लिया तो वोटों का बंटवारा होगा. इससे बीजेपी को सीधा फायदा पहुंचेगा. लेकिन सीजेपी सिर्फ विपक्ष का वोट नहीं काटेगी. सीजेपी का नारा ‘सिस्टम बदलो’ है, यानी सीधे सरकार पर निशाना है. सीजेपी नीट पेपर लीक, बेरोजगारी और शिक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों पर लड़ रही है. ये वही मुद्दे हैं जिन पर बीजेपी की छवि खराब हो रही है.

तो असल में सीजेपी का सबसे बड़ा निशाना बीजेपी भी बन सकती है. अगर सीजेपी विपक्ष का वोट काटकर बीजेपी को फायदा पहुंचाती है तो यह सीजेपी के लिए आत्मघाती होगा. इस वजह से सीजेपी को अपनी रणनीति बहुत सोच-समझकर बनानी होगी.