– ज्ञान की देवी का वैश्विक स्वीकार्य
– डॉ. मयंक चतुर्वेदी
मध्यप्रदेश के धार स्थित भोजशाला को लेकर न्यायालय का जो निर्णय सामने आया है, वह उस सनातन सांस्कृतिक चेतना की पुनर्पुष्टि है, जिसने हजारों वर्षों से मानव सभ्यता को ज्ञान, शिक्षा, कला और संस्कृति का मार्ग दिखाया है। एक ओर भारत में भोजशाला को लेकर मां वाग्देवी (सरस्वती) की प्राचीन उपासना के प्रमाण पुनः चर्चा में हैं, वहीं दूसरी ओर दुनिया का सबसे बड़ा मुस्लिम बहुल देश इंडोनेशिया, अमेरिका की राजधानी वॉशिंगटन डीसी में मां सरस्वती की 16 फीट ऊंची भव्य प्रतिमा स्थापित कर पूरी दुनिया को यह संदेश दे चुका है कि ज्ञान की कोई सीमाएं नहीं होतीं।
व्हाइट हाउस से कुछ दूरी पर कमल पर विराजित वीणावादिनी मां सरस्वती की प्रतिमा सही मायनों में देखा जाए तो भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक प्रतिष्ठा का उद्घोष है। यह दृश्य उस भारत के लिए भी एक गहरा संदेश है, जो कभी नालंदा, तक्षशिला, विक्रमशिला और भोजशाला जैसी ज्ञान परंपराओं का केंद्र रहा है।
भोजशाला : सांस्कृतिक स्मृति का प्रश्न
धार की भोजशाला को लेकर इतिहासकारों, पुरातत्वविदों और स्थानीय परंपराओं का बड़ा वर्ग इसे परमार वंश के महान राजा भोज द्वारा स्थापित मां वाग्देवी के मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के रूप में स्वीकार करता आया है। राजा भोज पराक्रमी शासक होने के साथ ही भारतीय ज्ञान परंपरा के बड़े संरक्षक माने जाते हैं।
उनकी राजधानी धार उस समय विद्वानों, कवियों और दार्शनिकों का केंद्र थी। भोजशाला में विद्या की देवी मां सरस्वती की आराधना होती थी और यहां शास्त्रार्थ तथा विद्वत सभाएं आयोजित होती थीं। यही कारण है कि इसे “विद्या की तपोभूमि” कहा गया। यहां प्राप्त संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य शैली, कमल आकृतियां और मंदिर वास्तु के अवशेष इस ऐतिहासिक तथ्य को मजबूत करते हैं कि भोजशाला मूलतः एक ज्ञान मंदिर थी।
न्यायालयीन निर्णय और उभरते पुरातात्विक तथ्य
हाल के न्यायालयीन निर्णय और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्टों ने भोजशाला से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्यों को फिर सामने ला दिया है। सर्वेक्षण में मंदिर स्थापत्य शैली, देवी-देवताओं के प्रतीक, संस्कृत अभिलेख और हिंदू धार्मिक चिह्नों के प्रमाण मिले हैं। यह भी स्पष्ट हुआ कि संरचना के अनेक हिस्से मूल हिंदू मंदिर शैली पर आधारित हैं।
वर्षों तक भोजशाला को केवल विवादित स्थल के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश हुई, किंतु अब पुरातात्विक और ऐतिहासिक प्रमाण यह संकेत दे रहे हैं कि यह स्थान भारत की प्राचीन शिक्षा और सांस्कृतिक चेतना का केंद्र रहा है, इसलिए भोजशाला का प्रश्न भारत की सांस्कृतिक अस्मिता और ज्ञान परंपरा के पुनर्स्मरण का विषय बन चुका है।
मां सरस्वती : केवल देवी नहीं, ज्ञान की चेतना
सनातन परंपरा में मां सरस्वती केवल पूजा की देवी नहीं हैं, वे ज्ञान, विवेक, कला और संस्कार की चेतना हैं। उनके हाथों में वीणा कला और संगीत का प्रतीक है, पुस्तक ज्ञान का, अक्षमाला साधना और निरंतर सीखने की प्रक्रिया का संकेत देती है, जबकि श्वेत कमल पवित्रता और निर्मलता का प्रतीक माना गया है।
भारतीय संस्कृति ने हजारों वर्ष पहले यह स्वीकार कर लिया था कि शिक्षा रोजगार का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य को संस्कारित करने की प्रक्रिया है। यही कारण है कि भारत में बच्चे की पहली शिक्षा “ॐ” लिखवाकर शुरू होती है और विद्या प्राप्ति से पहले मां सरस्वती का स्मरण किया जाता है। आज जब दुनिया तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और आर्थिक प्रतिस्पर्धा की बात कर रही है, तब भारतीय दर्शन यह बताता है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब उसमें नैतिकता, संवेदना और संस्कृति भी शामिल हो।
मुस्लिम बहुल इंडोनेशिया ने दिया बड़ा संदेश
इंडोनेशिया की लगभग 88 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है, जबकि हिंदुओं की संख्या मात्र तीन प्रतिशत के आसपास है। इसके बावजूद वहां की सरकार द्वारा अमेरिका को मां सरस्वती की प्रतिमा भेंट करना यह सिद्ध करता है कि सभ्य समाज ज्ञान को किसी मजहबी सीमा में नहीं बांधता। इंडोनेशियाई दूतावास ने स्पष्ट रूप से कहा कि यह प्रतिमा शिक्षा, सांस्कृतिक संवाद और जन-संपर्क को मजबूत करने का माध्यम है। यह वही दृष्टि है जिसने बाली में हिंदू सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखा है।
प्रतिमा का निर्माण बाली के पांच मूर्तिकारों ने किया, जिनका नेतृत्व आई न्योमन सुदरवा ने किया था। प्रतिमा में देवी सरस्वती के चार हाथ दर्शाए गए हैं। एक हाथ में अक्षमाला है, जोकि निरंतर सीखने की प्रक्रिया का प्रतीक है। वीणा कला और संस्कृति का प्रतीक है, जबकि पांडुलिपि ज्ञान के स्रोत को दर्शाती है। यह संपूर्ण संरचना भारतीय दर्शन और बाली कला का अद्भुत संगम है।
वॉशिंगटन में खड़ी सरस्वती का सांस्कृतिक संदेश
वॉशिंगटन डीसी में भारतीय दूतावास और महात्मा गांधी की प्रतिमा के सामने स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा आज कहना चाहिए कि यह विश्व राजनीति और वैश्विक संस्कृति के केंद्र में भारतीय ज्ञान परंपरा की उपस्थिति का प्रतीक है। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति ने प्रतिमा के अनावरण के समय कहा था कि यह लोगों के दिल और दिमाग खोलने का काम करेगी तथा नफरत और गलतफहमियों को दूर करेगी। निश्चित ही यह कथन आज के समय में अत्यंत महत्वपूर्ण है, जब दुनिया धार्मिक कट्टरता, वैचारिक संघर्ष और सांस्कृतिक टकराव से जूझ रही है। वहीं, मां सरस्वती का संदेश संवाद, सह-अस्तित्व और ज्ञान का संदेश है। यही कारण है कि यह प्रतिमा अमेरिका जैसे आधुनिक राष्ट्र में भी आकर्षण का केंद्र बन रही है।
भारत से विश्व तक फैली सरस्वती परंपरा
यहां यह भी बताना उचित होगा कि मां सरस्वती की उपासना सिर्फ भारत तक सीमित नहीं रही है। नेपाल, म्यांमार, कंबोडिया, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान, चीन श्रीलंका, मारीशस, सूरीनाम, गुयाना, फिजी, त्रिनिदाद और टोबैगो, डोमिनिका, जमैका जैसे कुछ अन्य कैरेबियन देश और तिब्बत तक विभिन्न रूपों में विद्या देवी की परंपरा दिखाई देती है।कुछ विद्वान रोमन देवी “मिनर्वा” या यूनानी देवी “एथेना” को ज्ञान, कला व युक्ति की देवी के रूप में भारतीय सरस्वती से समीकृत करते हैं।
जापान में मां सरस्वती “बेंजाइतेन” के रूप में पूजी जाती हैं और उन्हें ज्ञान, कला तथा समृद्धि की देवी माना जाता है। थाईलैंड में कलाकार और संगीतज्ञ “सुरसवदी” के रूप में उनकी वंदना करते हैं। म्यांमार में “थुरथदी” के रूप में विद्या देवी का उल्लेख मिलता है। कंबोडिया के अंकोरवाट मंदिरों में भी सरस्वती से संबंधित प्रतिमाएं और रूपांकन मौजूद हैं। वस्तुत: यह तथ्य बताता है कि भारतीय संस्कृति की सीमाएं बहुत विस्तारित हैं, उसने विश्व सभ्यता को गहराई से प्रभावित किया है।
शिक्षा ही राष्ट्र की वास्तविक शक्ति
इतिहास साक्षी है कि जिन सभ्यताओं ने शिक्षा और संस्कृति को महत्व दिया, वही लंबे समय तक टिक सकीं। भारत ने दुनिया को नालंदा, तक्षशिला और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय दिए। भोजशाला उसी गौरवशाली परंपरा की एक महत्वपूर्ण कड़ी है। आज आवश्यकता इस बात की है कि भारत अपनी सांस्कृतिक धरोहरों को संकोच से नहीं, बल्कि आत्मविश्वास के साथ दुनिया के सामने रखे। भोजशाला का प्रश्न इसी आत्मविश्वास से जुड़ा है। यदि इंडोनेशिया जैसा मुस्लिम बहुल देश मां सरस्वती को वैश्विक ज्ञान की प्रतीक मान सकता है, तो भारत को भी अपनी जड़ों से जुड़ने में संकोच नहीं होना चाहिए।
सभ्यता का भविष्य ज्ञान से तय होगा
धार की भोजशाला और वॉशिंगटन में खड़ी मां सरस्वती की प्रतिमा मानो एक ही संदेश दे रही हैं और वह यह है कि सभ्यताओं का भविष्य हथियारों से नहीं, ज्ञान से तय होता है। आज दुनिया जिस सांस्कृतिक अस्थिरता और वैचारिक संघर्ष से गुजर रही है, उसमें भारतीय ज्ञान परंपरा का यह संदेश अत्यंत प्रासंगिक हो जाता है कि शिक्षा मनुष्य को बुद्धिमान बनाने के साथ ही विनम्र और संवेदनशील भी बनाती है।
वस्तुत: भारत की सनातन परंपरा ने सदियों पहले यह स्थापित कर दिया था कि “सा विद्या या विमुक्तये” अर्थात् वही विद्या है, जो मनुष्य को मुक्त करे। भोजशाला का ऐतिहासिक सत्य और वॉशिंगटन में स्थापित मां सरस्वती की प्रतिमा इसी सनातन ज्ञानधारा की कहना चाहिए कि आज वैश्विक गूंज हैं।