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    Homeसाहित्‍यकविताअंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !!

    अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !!

    मन को करें प्रकाशमय, भर दें ऐसा प्यार !
    हर पल, हर दिन ही रहे, दीपों का त्यौहार !!
    दीपों की कतार से, सीख बात ले नेक !
    अँधियारा तब हारता, होते दीपक एक !!
    फीके-फीके हो गए, त्योहारों के रंग !
    दीप दिवाली के बुझे, होली है बेरंग !!
    दीये से बात्ती रुठी, बन बैठी है सौत !
    देख रहा मैं आजकल, आशाओं की मौत !!
    बदल गए इतिहास के, पहले से अहसास !
    पूत राज अब भोगते, पिता चले वनवास !!
    रुठी दीप से बात्तियाँ, हो कैसे प्रकाश !
    बैठा मन को बांधकर, अंधियारे का पाश !!
    पहले से त्यौहार कहाँ, और कहाँ परिवेश !
    अंधियारे उर में भरे, मन में हुए कलेश !!
    मैंने उनको भेंट की, दिवाली और ईद !
    जान देश के नाम जो, करके हुए शहीद !!
    — डॉo सत्यवान सौरभ,

    डॉ. सत्यवान सौरभ
    डॉ. सत्यवान सौरभ
    रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, दिल्ली यूनिवर्सिटी, कवि,स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार

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