कविता

राधा कृष्णा प्रेम रस

दोहा: प्रेम जगत का सार है जानि सका नहीं कोय ,
बिना प्रेम रीझू नहीं ज्ञानी कोई कितना भी होय।
प्यार का भूखा मैं सदा प्रेम से पुकारे जो मोय ,
ऐसे भक्त के दर्श को मोय बेचैनी होय।।

मु : कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो
प्रेम सागर में गोता लगाते रहो २
प्रेम सागर में गोता लगाते रहो २

अंत १: बरसाने की जो ये राधा रानी है
सच्चे प्यार की अदभुत निशानी है २
मि : ऐसा प्यार सदा इन से पाते रहो
कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो २

अंत २ :राधा राधा नाम जब रट जाएगा
मन प्रभु के चरणों में ही लगायेगा
मि : मन पुष्प को चरणों मे चढ़ा ते रहो २
कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो २

अंत ३: राधा से चलती प्रेम कहानी है
जानो होती क्या एक दीवानी है २
कृष्ण ही राधा है राधा ही कृष्ण है
मि : राधा राधा ही तुम गुनगुनाते रहो
कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो

अंत ४: ये तो बृषुभान की राज दुलारी है
श्री कृष्ण की प्रियतमा प्यारी है२
मि : इन के चरणों में शीश झुकाते रहो २
कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो २

अंत ५: नन्दो राधा राधा तू रट ले सदा
तेरी हो जायेगी सब बाधा बिदा
मि : राकेश कीर्तन मधुर सुनाते रहो
कृष्ण गोविंद गोपाल गाते रहो २