डा. विनोद बब्बर
भारत में अनेक भाषाएं एवं बोलियां हैं, उसके बावजूद लगभग हर शहर-क़स्बे में अंग्रेजी में लिखे बोर्ड गुलाम मानसिकता के अतिरिक्त क्या है? जिस देश के संविधान में हिंदी को राजभाषा घोषित किया गया हो और संपर्क भाषा के रूप में हिंदी की स्वीकार्यता हो वहां अंग्रेजी माध्यम स्कूल क्यों फल-फूल रहे हैं? सर्वथा अनजान भाषा के कारण छोटे-छोटे बच्चों के लिए शिक्षा मानसिकता विकास की बजाय बोझ बन गई है। हम जानबूझ कर अनजान बने हुए कि मातृभाषा में शिक्षा ग्रहण करने वाला बच्चा तेजी से आगे बढ़ता है। उसका ज्ञान वास्तविक होता है जबकि अंग्रेजी का झुनझुना बजाने वाले बच्चे ‘तोता रटन्ट’ करते हैं। ये बेबस बच्चे दोहरे बोझ से दबते हैं शिक्षा ग्रहण करना और पराई भाषा सीखना क्योंकि अंग्रेजी को अकारण वैश्विक भाषा बताने वाले समाज और व्यवस्था पर हावी है।
हम इस बात की चर्चा तो बहुत करते हैं कि स्वतंत्रता के बाद तुर्की के शासक कमाल अतातुर्क पाशा बिना कोई विलम्ब किये अगले दिन से ही सारा राजकाज तुर्की भाषा में करने का आदेश दे सकते हैं। इजराइल अपने गठन के तुरन्त बाद ‘हिब्रू’ को अपनी राजभाषा घोषित करता है जबकि उस समय नब्बे प्रतिशत यहूदी हिब्रू जानते ही नहीं थे। राष्ट्रीयता की प्रबल भावना को जागृत करने में अपनी भाषा के महत्व को स्वीकार करने वाले नेतृत्व की दृढ़ इच्छाशक्ति ने वहां का इतिहास बदल दिया। दूसरी ओर स्वतंत्रता के 79 वर्ष बाद जब इजराइल के विपरीत हमारे देश के अधिसंख्यक लोग हिंदी बोल, लिख अथवा समझ सकते हैं हम ‘किन्तु, परंन्तु’’ से मुक्त नहीं हो सके हैं। मात्र दो-ढाई प्रतिशत लोगों की भाषा अंग्रेजी का प्रशासन से शिक्षा और न्याय तक हावी होना राष्ट्रीय शर्म का विषय है। वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, व्यावसायिक जितनी पुस्तकें, पत्रिकाएँ अंग्रेज़ी में उपलब्ध होना इसी षड़यंत्र का परिणाम है। अंग्रेजी को विश्व भाषा बताने वाले समझने को तैयार नहीं है कि रूस ,जर्मनी, फ्रांस, जापान, चीन सहित विश्व के अनेक ऐसे देश हैं जिन्होंने अंग्रेजी के बिना उन्नति की है।
स्वतंत्रता आंदोलन में सभी नेता हिन्दी के महत्व को स्वीकारते रहे हैं। बंगाल के महान समाज सुधारक राजा राम-मोहन राय के बाद 1875 में बंगाल के ही केशव चन्द्र सेन ने हिन्दी की अनिवार्यता पर बल दिया था। 1850 में एक अंग्रेज विद्वान ने लिखा था कि गुजरात से इरावती तक तथा हिमालय से कन्याकुमारी तक लोग हिन्दुस्तानी समझते हैं। महान हिंदी भक्त फादर कामिल बुल्के के अनुसार, ‘अफगानिस्तान के हेरात’ प्रान्त में भी हिन्दी से काम चल सकता है।’ विचारणीय है कि आखिर भारतीय भाषाओं पर विदेशी भाषा क्यों हावी रहें?
1782 में, हैनरी ब्रुक ने कहा है, ‘जिस भाषा का व्यवहार भारत के प्रत्येक प्रांत के लोग करते हैं। जो पढ़े-लिखे तथा अनपढ़ दोनों की साधारण बोलचाल की भाषा है और जिसे प्रत्येक गांव में थोड़े बहुत पढ़े लिखे लोग समझते हैं, उसका नाम हिंदी है।’ समय-समय पर भारत को जानने जो विद्वान यहां आये, उन्होंने अपने अनुभवों में इस बात को स्वीकारा है कि जब दो भिन्न प्रान्तों, समुदायों और भाषा भाषी आपस में संवाद करते हैं तो हिंदी उनकी मदद करती है। इसलिए लोक भाषा, राष्ट्रभाषा और राजभाषा के रूप में प्रतिष्ठित हिन्दी केवल एक भाषा अथवा बोली नहीं अपितु एक सामाजिक भाषा परम्परा की संज्ञा है जिसका आकार-प्रकार विभिन्न उपभाषाओं और बोलियों के ताने-बाने द्वारा निर्मित हुआ है।
आश्चर्य है कि कुछ अज्ञानी लोग हिंदी के शब्दों का अर्थ स्पष्ट न होने की बात कहकर अंग्रेजी का समर्थन करते हैं। एक संगोष्ठी में इसका खंडन करते हुए ऐसे शब्द बताने की चुनौती प्रस्तुत की गई तो बहुत प्रयास के बाद भी वे असफल रहे तो मैंने उनसे अर्थ को बहुत स्पष्ट करने वाली तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय भाषा के कुछ शब्द प्रस्तुत किए तो उन्हें सांप सूंघ गया। वे Post शब्द का एक निश्चित अर्थ नहीं बता सके क्योंकि पुलिस पोस्ट, आर्मी पोस्ट, डाक, पद सहित अनेक जगह प्रचलित है। sleeper शब्द पर भी उनसे उत्तर देते न बना क्योंकि रेल की पटरियों को आपस में जोड़ने वाली लकड़ी स्लीपर है तो रेल के डिब्बे में शयन के लिए सीट स्लीपर है और उस पर सोने वाला भी स्लीपर। उसकी चप्पल भी स्लीपर हो सकती है। हिंदी में अनेकों पर्यायवाची मिलते हैं। यथा सूर्य के अनेक पर्यायवाची हैं लेकिन अंग्रेजी में Sun का कोई दूसरा शब्द नहीं मिलता। विशेष यह है कि हिंदी की देवनागरी लिपि सर्वाधिक वैज्ञानिक है जबकि अंग्रेजी की रोमन लिपि बहुत अस्पष्ट है। स्वयं अंग्रेजी के प्रख्यात विद्वान बर्नार्ड शाह ने इसे सुधारने की बात कही थी।
किसी भी भाषा के बढ़ने के कारकों में एक महत्वपूर्ण कारक है, क्या उस भाषा का प्रत्यक्ष लाभ जीविका मिलने में है। आज भारतीय भाषाओं को दरकिनार कर जीविका को अंग्रेजी भाषा का आश्रित बनाकर हमें मानसिक तौर पर गुलाम बना रहा है। यहां हमारा यह अभिप्राय हर्गिज नहीं कि अंग्रेजी का ज्ञान कतई नहीं होना चाहिए। लेकिन अपनी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा की कीमत पर हर्गिज नहीं। किसी भी भाषा का ज्ञान व्यक्ति के व्यक्तिगत विकास एवं योग्यता के लिए आवश्यक है लेकिन केवल भाषायी जानकारी ज्ञान का पर्यायवाची नहीं हो सकती। कोई भी जीवान्त समाज अपनी भाषा के बिना तऱक्क़ी नहीं कर सकता। आयातित सामान और स्वयं विकसित सुविधाओं के अंतर को समझकर ही हम भाषा के महत्च को समझ सकते हैं।
वैश्विक स्तर पर यह सिद्ध है कि हिंदी अपनी देवनागरी लिपि और ध्वन्यात्मकता (उच्चारण) के लिहाज से सबसे शुद्ध और विज्ञान सम्मत भाषा है। हमारे यहाँ एक अक्षर से एक ही ध्वनि निकलती है और एक बिंदु (अनुस्वार) का भी अपना महत्व है। दूसरी भाषाओं में यह वैज्ञानिकता नहीं पाई जाती। तथाकथित वैश्विक भाषा अंग्रेज़ी को ही देखें, वहाँ एक ही ध्वनि के लिए अनेक अक्षर उपयोग में लाए जाते हैं जिन्हें एक बच्चे के लिए याद रखना काफी कठिन हैं। इसके बावजूद हम अपने छोटे-छोटे बच्चों पर अवैज्ञानिक, अनियमित और अव्यवस्थित अंग्रेज़ी थोप रहे हैं। अंग्रेज़ी के बोझ तले दबे ये बच्चे अंग्रेजी सीख नहीं सकते और हिंदी उन्हें सीखने नहीं दी जाती। अंग्रेज़ी का रट्टा मार कर और वन टू टेन की गिनती दोहराने वाले हिंदी की गिनती भी नहीं समझ पाते जबकि हिंदी भाषा सीखने वाले किसी रूसी या जापानी छात्र को यह ज़रूर आती है। विज्ञान तथा तकनीकी विषय अपनी भाषाओं में क्यों नहीं पढ़ाए जाते हैं ? क्या वैज्ञानिक, प्रौद्योगिक, व्यावसायिक जितनी पुस्तकें, पत्रिकाएँ अंग्रेज़ी में ही उपलब्ध होना षड़यंत्र का परिणाम नहीं है? भारत में अंग्रेज़ी एक विदेशी भाषा के रूप में पढ़ाई जानी चाहिए न कि शिक्षा का माध्यम अंग्रेजी हो। शासन से न्याय तक अंग्रेजी हो। यदि भारत को उन्नत देशों की कतार में शामिल करना है तो अंग्रेज़ी को अतिथि माने, गृहस्वामिनी नहीं।
जरूरत है वोट मांगते हुए हिन्दी और संसद में जाकर अंग्रेजी का लबादा ओढने वाले दोगले नेताओ को सबक सिखाने का संकल्प लेना होगा। आखिर हिन्दी व अन्य भारतीय भाषाओं को प्रशासनिक सेवाओं के लिए महत्वहीन बनाने वाला एक भी व्यक्ति संसद में क्यों पहुंचे? यदि हम ऐसा कर सके तो ग्राम पंचायत से देश की सबसे बड़ी पंचायत तक हिन्दी और भारतीय भाषाओं के अपमान का दुस्साहस कोई न कर सकता।
14 सितम्बर को हिंदी दिवस या हिंदी पखवाड़ा मनाना पर्याप्त नहीं है। हिंदी को प्रशासन से लोक व्यवहार की भाषा बनाने के लिए सशक्त जन आंदोलन की आवश्यकता है। हमे अपने शासको से पूछना होगा कि यदि अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव पर्ची पर हिंदी हो सकती है तो भारत की राजधानी दिल्ली में ड्राईविंग लाइसेंस में एक भी शब्द हिंदी में क्यों नहीं? अधिसंख्यक सरकारी कामकाज अंग्रेजी में ही क्यों?
अंग्रेज़ी को श्रेष्ठ समझने वाली मानसिकता का बहिष्कार कर हम भारतीयों को आपस में हिंदी या भारतीय भाषा में बात करने की ओर बढ़ना होगा वरना अगली पीढ़ी अपनी मातृभाषा भूल जाएगी। आखिर आप, मै, वे, ये, सब जानते और मानते हैं कि अभ्यास से कोई भी व्यवहार मज़बूत होता है तो कम अभ्यास से वह कमज़ोर होता है। भाषा भी इसका अपवाद नहीं है। यदि आप हिंदी और भारतीय भाषाओं का हित चाहते हैं तो आओ संकल्प लें कि आज से किसी भी ऐसे कार्यक्रम में नहीं जाएगे जिसका निमंत्रण पत्र गुलामी की भाषा में होगा और न ही स्वयं ऐसा निमंत्रण पत्र छपवायेंगे! केवल बातें नहीं, कुछ असली करने की बेला है। यदि हम ऐसे संकल्प के लिए तैयार है तो हिंदी का भविष्य उज्ज्वल है। हमारी संस्कृति और राष्ट्रीयता को कोई खतरा नहीं। !’ जय हिंद! जय हिंदी!