-अशोक “प्रवृद्ध”
समकालीन वैश्विक परिदृश्य में बाजारवाद को कोई साधारण सामाजिक परिवर्तन नहीं, अपितु एक सुगठित आर्थिक साम्राज्यवाद के रूप में देखा जाना चाहिए। द्वितीय विश्वयुद्ध के पश्चात वैश्विक महाशक्तियों ने जिस पूंजीवादी व्यवस्था की नींव रखी, उसने धीरे-धीरे संपूर्ण विश्व को एक विशाल मंडी में बदलने का षड्यंत्र रचा। सन 1995 में गठित विश्व व्यापार संगठन और उसके अंतर्गत हुए गैट जैसे बहुपक्षीय समझौतों ने विकासशील देशों की संप्रभुता और उनकी स्थानीय संस्कृतियों पर अदृश्य किंतु अत्यंत गहरे आघात किए। प्राचीन भारतीय नीति ग्रंथ शुक्रनीतिसार में राजा और राष्ट्र के आर्थिक संरक्षण को लेकर स्पष्ट चेतावनी दी गई थी-
यस्य राष्ट्रस्य विप्रर्षे वाणिज्यं परहस्तगम्।
तस्य राष्ट्रस्य नाशाय न कालोऽपि प्रगल्भते।।
शुक्रनीति 4/2
अर्थात- जिस राष्ट्र का वाणिज्य और व्यापार विदेशी शक्तियों अथवा बाहरी तत्वों के हाथों में चला जाता है, उस राष्ट्र का पतन अवश्यम्भावी है; उसे नष्ट करने के लिए काल को भी पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता।
आज बहुराष्ट्रीय कंपनियों का वार्षिक टर्नओवर कई छोटे देशों की कुल सकल घरेलू उत्पाद से भी अधिक हो चुका है। आर्थिक आँकड़ों के वैश्विक विश्लेषण, जैसे वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ की रिपोर्ट से यह स्पष्ट होता है कि विकासशील देशों के लगभग 70 प्रतिशत उपभोक्ता उत्पाद अब केवल मुट्ठी भर पश्चिमी कॉरपोरेशन्स के नियंत्रण में हैं। यह नियंत्रण केवल व्यापार तक सीमित नहीं है, बल्कि गैट संधि के माध्यम से बौद्धिक संपदा अधिकारों और पेटेंट कानूनों को इस प्रकार मरोड़ा गया कि भारत के पारंपरिक ज्ञान, जैसे नीम, हल्दी और बासमती चावल तक को हथियाने के प्रयास किए गए। जब आर्थिक नीतियां किसी देश की मिट्टी से न उपजकर विदेशी कॉर्पोरेट हितों से तय होने लगें, तो वहां की स्वदेशी विनिर्माण क्षमता ध्वस्त हो जाती है। भारत के ग्रामीण अंचलों के पारंपरिक कुटीर उद्योग, जैसे बुनकर, शिल्पकार और कुम्हार, इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा की असंतुलित मार से हाशिए पर चले गए हैं। यह आर्थिक परावलंबन ही अंततः सांस्कृतिक गुलामी का मार्ग प्रशस्त करता है।
बाजारवाद का यह छद्म दर्शन कि वस्तुओं का संचय ही सुख का एकमात्र स्रोत है, 21वीं सदी के मनुष्य के लिए सबसे बड़ा अभिशाप सिद्ध हुआ है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के नवीनतम मनोवैज्ञानिक सर्वेक्षणों के अनुसार, वर्तमान युग में वैश्विक स्तर पर अवसाद और चिंता के मामलों में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है, और इसमें सबसे अधिक प्रभावित वह युवा वर्ग है जो इस उपभोक्तावादी चकाचौंध के सबसे निकट है। इस मानसिक विद्रूपीकरण की सटीक व्याख्या महर्षि वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत महापुराण के ययाति उपाख्यान में बहुत पहले ही कर दी थी। अपनी समस्त इच्छाओं को भोगने के बाद भी जब राजा ययाति को शांति नहीं मिली, तो उन्होंने संसार को जीवन का सबसे शाश्वत सत्य सौंपते हुए कहा था-
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते॥
-श्रीमद्भागवत पुराण 9/19/14
अर्थात- कामनाओं (भोगों) की तृप्ति कभी उनके उपभोग से नहीं हो सकती। जैसे अग्नि में घी डालने से वह शांत होने के बजाय और अधिक धधक उठती है, ठीक उसी प्रकार बाजार की वस्तुएं मनुष्य की पिपासा को शांत करने के बजाय उसे और अधिक भड़काती हैं।
बाजार कभी यह नहीं चाहता कि उपभोक्ता संतुष्ट हो। उसकी पूरी कार्यप्रणाली ही इस सिद्धांत पर टिकी है कि व्यक्ति के भीतर निरंतर एक अपूर्णता का बोध बना रहे। यदि आपके पास एक आधुनिक दूरभाष या वाहन है, तो छह महीने के भीतर बाजार उसका नया संस्करण लाकर आपके भीतर यह हीनभावना भर देगा कि आपका वर्तमान साधन अब पुराना और अनुपयोगी हो चुका है। इस अंतहीन अपग्रेडेशन की दौड़ ने मनुष्य को एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जहाँ वह अपनी बुनियादी शांति खोकर केवल क्रेडिट कार्ड के बिलों और ऋण (Loan) की किश्तों को चुकाने वाला एक आधुनिक दास बनकर रह गया है। अतएव, समग्र विश्लेषण के प्रकाश में यह अकाट्य सत्य उभरकर सामने आता है कि बाजारवाद केवल हमारी जेबों पर नहीं, बल्कि हमारी चेतना और भारतीयता के मूल प्राणों पर एक सुनियोजित प्रहार है। यदि इस आक्रामक संस्कृति को समय रहते वैचारिक और व्यावहारिक स्तर पर चुनौती नहीं दी गई, तो भारत अपनी वह आध्यात्मिक और सांस्कृतिक रीढ़ खो देगा जिसके बल पर वह हजारों वर्षों के विदेशी आक्रमणों के बाद भी जीवित रहा है। समाधान किसी हिंसक क्रांति में नहीं, बल्कि भारतीय मनीषियों द्वारा प्रतिपादित आत्म संयम और प्रज्ञा के पुनर्जागरण में है। मनुस्मृति में मन महर्ज कहते हैं-
सर्वं परवशं दुःखं सर्वमात्मवशं सुखम्।
एतद् विद्यात् समासेन लक्षणं सुखदुःखयोः।।
मनुस्मृति 4/160
महर्षि मनु कहते हैं कि जो कुछ भी दूसरों के वश में अर्थत बाहरी वस्तुओं या परिस्थितियों पर निर्भर है, वह दुःख है; और जो कुछ भी अपने वश में (आंतरिक संतोष और नियंत्रण में) है, वही वास्तविक सुख है। संक्षेप में सुख और दुःख का यही लक्षण है। हमें वैश्विक नागरिक रहते हुए भी अपनी वैचारिक संप्रभुता को बनाए रखना होगा। इसके लिए भाषाई स्वाभिमान, आर्थिक स्वदेशी और जीवन-शैली में सात्विकताजैसे कुछ व्यावहारिक कदम अनिवार्य हैं। नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा और संस्कृत साहित्य के गौरव से जोड़ना, ताकि वे पश्चिमी विज्ञापनों के भाषाई सम्मोहन से मुक्त हो सकें। स्थानीय उत्पादकों, शिल्पकारों और पारंपरिक उद्योगों को प्राथमिकता देना, जिससे देश का धन देश की ही धमनियों में प्रवाहित हो। उपभोग के स्थान पर योग और संग्रह के स्थान पर अपरिग्रह को जीवन का मूलमंत्र बनाना। जब तक हम अपनी थाली, अपनी भाषा, अपनी वेश-भूषा और अपने विचारों को बाजार के हाथों गिरवी रखने से नहीं बचाएंगे, तब तक विश्वगुरु भारत की कल्पना केवल एक दिवास्वप्न ही रहेगी। आइए, इस शाश्वत सत्य को आत्मसात करें कि हमारी संस्कृति कोई विक्रय योग्य कमोडिटी नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता को सन्मार्ग दिखाने वाली एक अमर चेतना है।