प्रियंका के चुनावी रूप

मिली कही तुलसी की माला |
लेकर उसे अपने गले में डाला ||
माथे पर चौड़ी बिंदी लगाई |
फिर सिन्दूर से मांग सजाई ||
बड़ी बाहू की ब्लाउज सिलवाया |
उससे अपना नग्न तन ढकाया ||
फिर एक सूती साडी मँगवाई |
उसको पहन चुनाव प्रचार में आई ||
पाश्चात्य वस्त्रो को उसने त्यागा |
कही उन्हें किसी गंदे नाले में फैका ||
माला उसने पुरुषो से पहनी |
है बहुत वह बड़ी ही सयानी ||
करती थी वह सोलह श्रंगार |
पर लगती वह थोड़ी सी बीमार ||
फिर भी चुनाव प्रचार है करती |
अपने भाई की सहायता करती ||
दिया है कांग्रेस को जिताने का भार |
इसलिए वह कर रही है मारम मार ||
कर रही है माताजी का भी प्रचार |
इसलिए जाती रायबरेली बार बार |
कभी कभी वह बाडरा को संग ले जाती
उसको दिखा उसकी छवि सुधरवाती ||
देखो ! वह कितनी परिश्रमी महिला |
जानती है चुनाव जीतने की लीला ||
कर रही है कांग्रेस का बेडा पार |
जब से लिया उसने सचिव प्रभार ||
खत्म हो जायेगा जब चुनाव प्रचार |
फिर से ले लेगी वह मौज बहार ||
ये सब है हमारे बहुरुपिया नेता |
समय के साथ रूप बदल लेता ||
इन पर न करना तुम विश्वास |
इनसे कभी न रखना कोई आस ||
जब ये किसी शहर में है जाते |
उस शहर के मंदिर में है जाते ||
इस तरह जनता को ये बहकाते |
अपने को बड़ा राम भक्त दर्शाते ||
सबकी भक्ति भावना को जगाते |
इस तरह वे जनता की धोखा दे पाते ||
समय के साथ ये बदल जाते |
गधे को भी ये बाप बना लेते ||
जब चुनाव खत्म हो जायेगे |
ये कही नजर नहीं आयेंगे ||
इनकी सीजनल मंडी है लगती |
कभी खुल जाती कभी बंद हो जाती ||

आर के रस्तोगी

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