अभिव्यक्ति का सवाल और एक दिन मीडिया का

 मनोज कुमार

एक बार फिर पूरी दुनिया कहेगी कि बोल कि तेरे लब आजाद हैं लेकिन हकीकत इसके खिलाफ है. औपचारिकता के लिए दुनिया ने 3 मई की तारीख तय कर मुनादी कर दी है कि यह दिन विश्व पे्रस की स्वतंत्रता का दिन होगा. यह बात सच है कि जब यह कोशिश हुई थी तब प्रेस और पत्रकारिता के लब आजाद थे लेकिन आज की तारीख में दुनिया का कोई देश दावे के साथ नहीं कह सकता कि प्रेस के लब आज भी आजाद हैं. तिस पर तुर्रा यह कि मीडिया की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दो. ठोक दो कि मीडिया अब दिल से नहीं, दलों से चल रही है. यह कहना आसान है लेकिन यह सच पूरा नहीं है. इसके आगे और पीछे की भी कहानी है जो डराती नहीं, धमकाती है और कहती है कि तेरे लब आजाद नहीं हैं. सनद रहे कि तीन मई का दिन दुनियाभर में प्रेस की आजादी के दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रेस स्वतंत्रता के बुनियादी सिद्धांतों, मूल्यों और प्रेस की स्वतंत्रता पर हो रहे हमले का बचाव करने और अपने पेशे को जिम्मेदारी और ईमानदारी से निभाते हुए जान गंवाने वाले पत्रकारों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए हर साल यह दिन मनाया जाता है। भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मौत के लिए साल 1975 का आपातकाल को बार बार याद किया जाता है लेकिन यह भूल जाते हैं कि 2019 आते आते तक हम जाने कितनी बार अघोषित आपातकाल को झेल चुके हैं. जो लोग मीडिया की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हैं, वो लोग यह भूल जाते हैं कि लगातार भयवाह होती स्थितियों में भी पत्रकारों ने कदम नहीं खींचे. जान दी लेकिन सच को समाज के सामने लेकर आए. हरियाणा के उस जाबांज पत्रकार को सलाम करना चाहिए जिसकी कलम ने दोषियों को सलाखों के पीछे धकेल दिया. यह अकेला उदाहरण नहीं है. भारत में प्रेस को समाज का चौथा स्तंभ कहा गया है लेकिन यह चौथा स्तंभ लगातार जर्जर होता जा रहा है. भारतीय राजनीति के कद्दावर नेता लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल के बाद प्रेस के लिए फरमाया था कि ‘सरकार ने कहा घुटनों पर चलो, और वह रेंगने लगे’. क्या आडवाणीजी 2019 में प्रेस की हिमायत में कुछ कहना चाहेंगे? हमें इस बात पर गर्व है कि साम्प्रदायिक दंगे ने हमारे प्रणेता गणेशशंकर विद्यार्थी की जान ले ली. विद्यार्थीजी की मृत्यु पर महात्मा गांधी ने कहा था कि काश, मुझे भी ऐसी मौत मिल सकती. विद्यार्थी जी एक मिसाल हैं भारतीय पत्रकारिता से लेकिन तब से लेकर अब तक पत्रकारिता की विश्वसनीयता के लिए जान देने वाले साहसी लोगों की सूची लंबी है. रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स की नई रिपोर्ट विश्व प्रेस की आजादी की पोल खोलती है. बीते साल पूरे दुनिया भर में 80 पत्रकारों की हत्या या उनके पेशे की वजह से मौत हुई है. पूरी दुनिया में भारत पत्रकारों के लिए पांचवां सबसे बुरा देश साबित हुआ है. वहीं, अफगानिस्तान पत्रकारों के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक देश है. लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है। भारत में 1992 से लेकर अब तक 19 जाबाज पत्रकारों की जुबान को भ्रष्टाचार और अन्याय के विरुद्ध लड़ते वक्त हमेशा-हमेशा के लिए बंद कर दी गईं। बिहार में 25 मार्च को दो पत्रकारों की एसयूवी से कुचलकर हत्या कर दी गई. इसमें गांव के मुखिया पर हत्या का आरोप लगा था, उसी दिन मध्य प्रदेश रेत माफिया पर स्टोरी कर रहे एक पत्रकार की ट्रक से कुचलकर मौत हो गई. इसमें भी शक की सूई रेत माफिया पर गई.इस रिपोर्ट से साफ हुआ है कि पूरी दुनिया में पत्रकारों की हत्या बढ़ी है. रिपोर्ट में बताया गया है कि इन 80 पत्रकारों में से 63 पेशेवर पत्रकार थे. इसके अलावा इस साल 348 पत्रकारों के हिरासत में लिया गया था और 60 पत्रकारों का अपहरण हुआ, वहीं तीन लापता हैं. मारे गए 80 पत्रकारों में से 49 की हत्या इसलिए हुई क्योंकि उनकी रिपोर्टिंग की वजह से ऊंची आर्थिक, राजनीतिक, धार्मिक ताकत रखने वाले या अपराधी संगठन को नुकसान पहुंच रहा था. टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक, मारे गए पत्रकारों की संख्या सबसे ज्यादा अफगानिस्तान में रही है. 2018 में अफगानिस्तान में इस साल 15 पत्रकार मारे गए हैं. सीरिया में 11, मैक्सिको में नौ, यमन में आठ और भारत और अमेरिका में छह-छह पत्रकार मारे गए हैं.हालांकि, इराक इस लिस्ट से बाहर है. इराक में गुजरे साल एक भी पत्रकार नहीं मारा गया है. ऐसा 2003 के युद्ध के बाद से पहली बार हुआ है. इस रिपोर्ट में ये भी साफ किया गया है, इनमें से कई देश हैं, जिनमें युद्ध नहीं हो रहा और पत्रकारों को युद्ध से खतरा नहीं है. ये उस देश के खराब हालातों के वजह से हो रहा है. बीते साल 348 पत्रकारों को हिरासत में लिया गया. इनमें से 60 चीन में, 38 मिश्र में, 33 तुर्की में और 28-28 सऊदी अरब और ईरान में हिरासत में लिए गए. चीन दुनिया में पत्रकारों और ब्लॉगरों के लिए सबसे बड़ी जेल है। किसी भी न्यूज कवरेज के पसंद न आने पर शासन संबंधित पक्ष के विरुद्ध कड़े कदम उठाता है। विदेशी पत्रकारों पर भी भारी दबाव है और कई बार उन्हें इंटरव्यू देने वाले चीनी लोगों को भी जेल में बंद कर दिया जाता है। सीरिया में अब तक ऐसे कई पत्रकारों को मौत की सजा दी जा चुकी है, जो असद शासन के खिलाफ हुई बगावत के समय सक्रिय थे। रिपोर्ट्स विदाउट बॉर्डर्स ने सीरिया को कई सालों से प्रेस की आजादी का शत्रु घोषित किया हुआ है। वहां असद शासन के खिलाफ संघर्ष करने वाला अल-नुसरा फ्रंट और आईएस ने बदले की कार्रवाई में सीरिया के सरकारी मीडिया संस्थान के रिपोर्टरों पर हमले किए और कईयों को सार्वजनिक रूप से मौत के घाट उतारा। ऊपर जो हालात बया किया गया है, वह ऐसी एजेंसी की रिपोर्ट है जिसकी विश्वसनीयता दुनियाभर में कायम है. यह सच है कि प्रेस की चुनौतियां लगातार बढ़ती ही जा रही है। प्रेस को आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। इनमें आंतरिक संघर्ष अधिक गंभीर है। प्रेस सरकार और जनता के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अपनी महती भूमिका का निर्वहन करता है किन्तु यह सच कहीं टूटता नजर आ रहा है. इसमें सबसे अहम भूमिका बाजार की मानी जाती है. बाजार के दबाव में प्रेस को बताया जा रहा है लेकिन बाजार से लडऩे की ताकत भी प्रेस देता है, इस बात का कहीं जिक्र नहीं मिलता है. आधुनिकीकरण व सूचना प्रौद्योगिकी के विस्तार के फलस्वरूप मीडिया की आचार नीति और चुनौतियों के स्वरूप में परिवर्तन आया है। डिजिटल युग में सोशल मीडिया पर कई चैनलों का प्रसार हुआ है। विस्तार के कारण कुछ समस्या भी आई है लेकिन पत्रकारिता ही एकमात्र कार्य है जो अपने ध्येय से भटका नहीं है. जितना सच यह है कि अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला बोला जा रहा है, उससे बड़ा सच यह है कि यह हमला डर में बोला जा रहा है. एक पत्रकार होने के नाते मुझे यह अच्छा लगता है कि जब समाज कहता है कि पत्रकारिता अविश्वसनीय हो गया है क्योंकि समाज किसी और प्रोफेशन के बारे में इतनी गंभीरता से नहीं सोचता है. विश्वास उसका ही टूटता है, जिस पर विश्वास होता है और हम मानकर चलते हैं कि समाज का विश्वास हम पर बना है. समाज की आलोचना हमारी ताकत है. पत्रकारिता किसी सेलिब्रेटी की नहीं है बल्कि वह कबीर परम्परा की है. पत्रकारिता में आज भी महात्मा गांधी और प्रेमचंद जिंदा हैं. पत्रकारिता की ओज पंडित माखनलाल चतुर्वेदी से है, गणेशशंकर विद्यार्थी से है और पराडक़र साहब से है. पत्रकारिता के ये वो खलीफा हैं जिन्होंने बताया था कि प्रेस की जवाबदारी समाज के प्रति क्या है? एक सच यह भी है कि पत्रकारिता की औपचारिक शिक्षा ने भी पत्रकारिता को नुकसान पहुंचाया है. इस विधा में आने वाली नयी पीढ़ी रोजगार के भाव से आती है, सरोकार के भाव से नहीं. पत्रकारिता के लिए कोई टेक्रालॉजी काम नहीं करती है और जो टेक्रालॉजी काम करती है उसे कहते हैं दिल से महसूस करना. एक आम आदमी की पीड़ा को महसूस करना लेकिन पेज-थ्री की पत्रकारिता ने सुख की चादर में सच के ताप को ढकने की कोशिश की है. कस्बाई पत्रकारिता में आज भी पत्रकारिता का ओज कायम है. महानगर आते आते पत्रकारिता दम तोडऩे लगती है. एक सच यह भी है कि बाजार का हमला केवल हम पर ही नहीं है और प्रेस पर लगाम लगाने की कोशिश केवल हमारे शासक-प्रशासक ही नहीं करत हैं बल्कि पूरी दुनिया का चरित्र ऐसा हो गया है. हम इस बात से खुश हो सकते हैं कि दुनिया में हमारे लिए एक दिन महफूज है लेकिन क्या दिवस मना लेने से हमारी आजादी कायम रह पाएगी? सवाल छोटा सा है लेकिन जवाब तलाशने के लिए शायद सदियां लग जाएं लेकिन जवाब तो हमें भी चाहिए क्योंकि समाज हर सवाल का जवाब प्रेस से मांगता है तो एक सवाल समाज का प्रेस है कि आप हमारी स्वतंत्रता को कायम रखने के लिए कब साथ देंगे? 

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