लेख

भारत के इतिहास में रचा बसा है आमरण अनशन 

दुर्गेश्वर राय

देश के युवाओं के भविष्य से जुड़ी परीक्षा नीट की विसंगतियों और प्रशासनिक पारदर्शिता के सवालों को लेकर सोनम वांगचुक का दिल्ली के जंतर-मंतर के बाद सफदरजंग अस्पताल में  अनशन जारी है। आज के इस आधुनिक और तकनीकी युग में भी अपनी देह को दांव पर लगा देना नागरिक प्रतिरोध का प्रखर माध्यम है। सोनम वांगचुक का यह वर्तमान संघर्ष दरअसल भारत के ऐतिहासिक सिलसिले का एक नवीनतम कड़ी है। आमरण अनशन से सामान्य आशय है भोजन का परित्याग करना लेकिन भारत में आमरण अनशन का इतिहास, दमन और अन्याय के खिलाफ अपनी देह को ही प्रतिरोध का सबसे मारक हथियार बना देने की एक अनूठी गाथा है।

जब संवाद के सारे तार्किक रास्ते बंद हो जाते हैं और सत्ता बहरी हो जाती है, तब आत्मा की आवाज को बुलंद करने के लिए इस आत्म-पीड़न के मार्ग को चुना जाता है। भारतीय संस्कृति में रचे-बसे प्राचीन प्रायोपवेशन यानी अन्न-जल त्याग कर मृत्यु का वरण करने की आध्यात्मिक परंपरा को आधुनिक राजनीति में एक लोकतांत्रिक अस्त्र के रूप में बदलने का काम हमारे महापुरुषों ने किया। ब्रिटिश हुकूमत के दमनकारी दौर से लेकर स्वतंत्र भारत की चुनी हुई सरकारों तक, इस नैतिक हथियार ने बार-बार सत्ता के अहंकार को घुटने टेकने पर मजबूर किया है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें कोई रक्तपात नहीं होता, कोई शस्त्र नहीं उठता लेकिन फिर भी विरोधी का हृदय हिल उठता है।

इस विधा को एक राजनैतिक और नैतिक आंदोलन के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थापित करने का श्रेय राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को जाता है। गांधी जी ने अपने जीवन में कुल 17 बार उपवास या अनशन का सहारा लिया। उनका मानना था कि अनशन विरोधी के भीतर सोई हुई इंसानियत और संवेदना को जगाने का एक आध्यात्मिक प्रयास है। साल 1932 में यरवदा जेल में ब्रिटिश सरकार के सांप्रदायिक पंचाट के खिलाफ किया गया उनका आमरण अनशन इसका सबसे बड़ा उदाहरण था। गांधी जी के अनशनों की सबसे बड़ी रोचकता यह थी कि वे अपने प्राणों को दांव पर लगाकर विरोधी पक्ष के तर्कों को ही कुंद कर देते थे।

स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एक ऐसा मोड़ भी आया जब इस अहिंसक हथियार को क्रांतिकारियों ने जेल की काल कोठरियों में अपनी गरिमा की रक्षा के लिए अपनाया। लाहौर सेंट्रल जेल में बंद भारतीय कैदियों के साथ हो रहे अमानवीय व्यवहार के खिलाफ 13 जुलाई 1929 को भगत सिंह और उनके साथियों के साथ मिलकर महज 25 वर्ष के युवा जतिन दास ने भूख हड़ताल शुरू की। ब्रिटिश हुकूमत की क्रूरता का आलम यह था कि उन्होंने जतिन दास को जबरन खाना खिलाने (फोर्स-फीडिंग) की हर मुमकिन कोशिश की, यहाँ तक कि उनके पीने के पानी के घड़ों में दूध मिला दिया गया ताकि वे पानी पिएं तो उनका उपवास टूट जाए लेकिन जतिन दास ने पानी पीना ही छोड़ दिया। लगातार 63 दिनों तक अन्न-जल का एक कतरा भी न लेने के कारण 13 सितंबर 1929 को उन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। इस शहादत ने देश में क्रांति की ऐसी अग्नि भड़काई कि ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिल गई। इसी तरह उत्तराखंड के वीर सेनानी श्रीदेव सुमन ने टिहरी रियासत के सामंती राजा के अत्याचारों के खिलाफ जेल में 84 दिनों का ऐतिहासिक अनशन किया और 25 जुलाई 1944 को शहीद हो गए, जो यह साबित करता है कि अनशन केवल अंग्रेजों के खिलाफ नहीं, बल्कि आंतरिक तानाशाही के खिलाफ भी उतना ही असरदार था।

आजादी के बाद जब देश को लगा कि अब अनशनों का दौर बीत चुका है, तब स्वतंत्र भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने यह हथियार एक नए रूप में प्रकट हुआ। इसका सबसे बड़ा और निर्णायक मोड़ साल 1952 में आया, जब गांधीवादी नेता पोट्टी श्रीरामुलु ने तेलुगु भाषियों के लिए एक अलग आंध्र राज्य की मांग को लेकर अपनी ही चुनी हुई सरकार के खिलाफ आमरण अनशन शुरू कर दिया। 56 दिनों के कठिन अनशन के बाद जब उनका निधन हुआ तो पूरे दक्षिण भारत में जन-आक्रोश भड़क उठा जिसे संभालना सरकार के बस में नहीं रहा। तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को तुरंत झुकना पड़ा और भाषाई आधार पर देश के पहले राज्य आंध्र प्रदेश के गठन की घोषणा करनी पड़ी। यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की एक ऐसी रोचक और जटिल पहेली है, जिसने आगे चलकर पूरे देश के मानचित्र को बदलने यानी राज्यों के पुनर्गठन का आधार तैयार कर दिया।

समय बदला, तकनीक बदली और 21वीं सदी आते-आते आमरण अनशन का स्वरूप भी बेहद आधुनिक और व्यवस्था-परिवर्तनकारी हो गया। मणिपुर की आयरन लेडी इरोम चानू शर्मिला ने सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून  के खिलाफ साल 2000 में एक ऐसा अनशन शुरू किया जो दुनिया के इतिहास में सबसे लंबा, करीब 16 वर्षों तक चलने वाला प्रतिरोध बना। सरकार उन्हें जिंदा रखने के लिए नाक की नली से जबरन लिक्विड डाइट देती रही। वहीं दूसरी ओर, साल 2011 में भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे द्वारा दिल्ली के रामलीला मैदान में किया गया अनशन आधुनिक युग का सबसे बड़ा जन-उबाल था। इस अनशन की रोचकता यह थी कि इसने सोशल मीडिया और तकनीक के दौर में पूरे देश के युवाओं को सड़कों पर ला खड़ा किया, जिसके दबाव में संसद को जन लोकपाल कानून की दिशा में कदम बढ़ाना पड़ा। हाल के वर्षों में लद्दाख की संवेदनशील संस्कृति और पर्यावरण की रक्षा के लिए सोनम वांगचुक द्वारा कड़ाके की ठंड में किया गया 21 दिनों का जलवायु उपवास यह दिखाता है कि आज भी यह माध्यम उतना ही प्रासंगिक है।

इस ऐतिहासिक कड़ी में और भी ऐसे नाम हैं जिन्होंने अपनी न्यायसंगत मांगों के लिए सत्ता की हठधर्मिता के आगे झुकने से इंकार कर दिया। पंजाब और हरियाणा के बीच चंडीगढ़ को लेकर चले लंबे सीमा विवाद के दौरान सिख नेता दर्शन सिंह फेरुमान ने साल 1969 में अमृतसर में आमरण अनशन का रुख किया था और लगातार 74 दिनों तक अटूट संकल्प बनाए रखने के बाद अस्पताल में उनका प्राणोत्सर्ग हो गया। वहीं पर्यावरण संरक्षण और जीवनदायिनी मां गंगा की अविरल धारा को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए आईआईटी के पूर्व प्रोफेसर और विख्यात पर्यावरणविद् स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद (प्रोफेसर जी. डी. अग्रवाल) ने सरकारों की उदासीनता के खिलाफ कई बार उपवास किए। साल 2018 में गंगा नदी के लिए विशेष संरक्षण अधिनियम को पारित कराने की मांग को लेकर वे ऋषिकेश में अनशन पर बैठे और लगातार 111 दिनों के इस अभूतपूर्व तथा तपोमय संघर्ष के बाद उन्होंने अपनी देह त्याग दी, जिसने विकास और प्रकृति के अंतर्संबंधों पर एक गंभीर वैश्विक विमर्श को जन्म दिया। इन विभूतियों के आत्म-बलिदान के उदाहरण यह पुख्ता करते हैं कि चाहे क्षेत्रीय अस्मिता का प्रश्न हो या प्रकृति की रक्षा का, भारत की मिट्टी ने हमेशा ऐसे साधकों को जन्म दिया है जिन्होंने अपनी देह को ही प्रतिरोध की सर्वोच्च समिधा बना दिया।

आमरण अनशन का यह पूरा सफरनामा भारतीय लोकतंत्र की एक अद्भुत ताकत को बयां करता है। यह स्पष्ट करता है कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता की सामूहिक चेतना और उसके नैतिक संकल्प में होती है, न कि सत्ता के गलियारों में। जब-जब शासकों ने जनता की जायज मांगों को नजरअंदाज करने की भूल की, तब-तब किसी एक व्यक्ति के आत्म-बलिदान के संकल्प ने पूरी व्यवस्था की दिशा बदल दी। भारत का यह इतिहास हमें सिखाता है कि भौतिक हथियारों से लैस सेनाएं भले ही युद्ध जीत लें, लेकिन आत्मबल और सत्य के मार्ग पर अडिग एक भूखा इंसान इतिहास रच जाता है। सत्ता के खिलाफ अपनी देह को दांव पर लगाने की यह कला भारतीय लोकतंत्र की आत्मा को हमेशा सजीव और उत्तरदायी बनाए रखने का एक शाश्वत माध्यम है।

दुर्गेश्वर राय