राजेश श्रीवास्तव
मोदी सरकार ने 2० जुलाई से शुरू हो रहे संसद के मानसून सत्र का एजेंडा बता दिया। कुल 7 विधेयकों की सूची में 2 पुराने और 5 नए विधेयक हैं। इसमें ‘परिसीमन विधेयक’ का जिक्र नहीं है, जिसके लिए जरूरी दो-तिहाई सांसदों का समर्थन जुटाने के लिए सरकार ने एड़ी-चोटी का जोर लगा रखा है। क्या दर्जनों विपक्षी सांसद तोड़ने के बावजूद नंबर्स नहीं जुटा पाई सरकार या संसद सत्र के बीच अचानक चौंका देगी।
तो क्या मानसून सत्र में परिसीमन विधेयक नहीं आएगा?
संविधान के आर्टिकल 368 के तहत संविधान संशोधन विधेयक पेश करने के लिए राष्ट्रपति की अनुमति नहीं लेनी होती। इसे सरकार का कोई मंत्री या सांसद निजी तौर पर भी संसद सत्र के दौरान पेश कर सकता है। ऐसा भी कोई नियम नहीं है कि सत्र के एजेंडे में बिल के बारे में बताना जरूरी हो। इतिहास में भी कई संविधान संशोधन बिल अचानक लाए जा चुके हैं।
कई संकेत हैं कि सरकार सत्र के बीच किसी दिन परिसीमन बिल ला सकती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार दोबारा बिल पर समर्थन जुटाने के लिए बीजेपी के नेता डीएमके चीफ और तमिलनाडु के पूर्व सीएम एमके स्टालिन के संपर्क में हैं। ‘वन नेशन-वन इलेक्शन बिल’ पर भी डीएमके समर्थन दे, इसकए बीजेपी ने इसमें कुछ बदलाव का प्रस्ताव रखा है।
आंध्र प्रदेश सीएम चंद्रबाबू नायडू ने 15 जून को दावा किया था कि केंद्र सरकार जल्द ही परिसीमन बिल फिर से लाएगी। महिला आरक्षण और परिसीमन साथ-साथ आगे बढ़ेंगे। सूत्रों की मानें तो परिसीमन बिल मानसून सत्र में दोबारा जरूर लाया जाएगा और उसी के लिए सांसदों के समर्थन का आंकड़ा बढ़ाने की कवायद की गई है।’ लोकसभा के पूर्व महासचिव और संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य भी कहते हैं कि सरकार पिछले सेशन में गिरा बिल इस सेशन में लाना चाहती है। एनडीए दो-तिहाई बहुमत जुटाने की कोशिश कर रहा है। सरकार को लग रहा है कि सत्र से पहले वो समर्थन जुटा लेगी।
16 जुलाई को महाराष्ट्र की डिप्टी सीएम और अजित गुट की नेता सुनेत्रा पवार ने कहा, ‘महिला आरक्षण बिल बहुत जरूरी है। महिलाओं को राजनीति में उनका हक मिलना चाहिए। हम परिसीमन का भी समर्थन करते हैं। यह राष्ट्रीय हित में है।’
बिल पारित कराने के लिए सरकार के पास और क्या रास्ते हैं?
फिलहाल सरकार लोकसभा में दो-तिहाई के आंकड़े से 41 सीट और राज्यसभा में 11 सीट दूर है। ये कमी कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों से पूरी हो सकती है।
लोकसभा में शरद पवार की एनसीपी, डीएमके और जेएमम के सांसदों पर दांव : लोकसभा में फिलहाल एनसीपी (शरद) के 8, डीएमके के 22 और जेएमएम के 3 सांसद हैं। अगर तीनों पार्टियों के सांसद सरकार का समर्थन कर दें, तो एनडीए का आंकड़ा 351 तक पहुंच जाएगा, जो दो-तिहाई बहुमत से 9 कम होगा।
एनसीपी (शरद पवार गुट) की कार्यकारी अध्यक्ष सुप्रिया सुले ने कहा है कि अगर सरकार हर राज्य की आधी सीटें बढ़ाती है, तो हम परिसीमन बिल पर समर्थन कर सकते हैं। खबरें हैं कि स्टालिन और बीजेपी लीडरशिप के बीच बातचीत हुई है और उन्होंने इंढिडया ब्लॉक से दूरी बना ली है। वहीं जेएमएम सांसद भी बीजेपी के संपर्क में हैं।
चर्चा है कि समाजवादी पार्टी के 37 में से कुछ सांसद भी बीजेपी के संपर्क में हैं। अगर इनमें से कुछ या अन्य विपक्षी सांसद वोटिग के दौरान लोकसभा में अनुपस्थित रहे, तो दो-तिहाई का आंकड़ा कम हो जाएगा और सरकार को जरुरी समर्थन जुटाने में आसानी होगी। अप्रैल में हुई वोटिग में 12 सांसद लोकसभा नहीं पहुंचे थे। डीएमके भी बीजेपी सरकार को मुद्दों के आधार पर समर्थन दे सकती है। इन 22 सांसदों का समर्थन भले न मिले, लेकिन सरकार इन्हें वोटिग से दूर रहने के लिए मना सकती है।
राज्यसभा में भी डीएमके के 8 सांसद हैं, ये वोटिग न करें, तो दो-तिहाई बहुमत के लिए 156 वोट चाहिए होंगे, यानी एनडीए को 4 और सांसदों का समर्थन जुटाना होगा। इसके लिए सरकार की नजर वाईएसआर कांग्रेस और बीजू जनता दल यानी बीजद जैसी छोटी पार्टियों पर रहेगी, जो न तो एनडीए में हैं और न इंडिया ब्लॉक में। वाईएसआर कांग्रेस के 4 और बीजद के 5 सांसद हैं। अगर इनमें से कुछ सांसद एनडीए को समर्थन दे दें, तो सरकार 11 सीटों का फासला पाटने के करीब पहुंच सकती है।
हालांकि नवंबर में एनडीए का गणित दोबारा कुछ बिगड़ सकता है, क्योंकि तब उत्तर प्रदेश से 1० राज्यसभा सांसदों का कार्यकाल खत्म हो रहा है। विधानसभा में बेहतर स्थिति के चलते समाजवादी पार्टी उपचुनाव में कुछ ज्यादा सीटें जीत सकती है।
आम बोलचाल में जिसे हम परिसीमन विधेयक कह रहे, वो दो विधेयकों का पैकेज है। जिसमें लोकसभा की अधिकतम सीटें 55० से बढ़ाकर 85० करने और लोकसभा क्षेत्रों का आकार दोबारा तय करने (परिसीमन) के प्रावधान हैं।
मोदी सरकार ने 16 से 18 अप्रैल 2०26 को संसद का विशेष सत्र बुलाकर ये विधेयक पेश किए। तर्क दिया कि 2०29 चुनाव तक महिला आरक्षण कानून लागू करने के लिए इन्हें पारित होना जरूरी है।
विपक्षी पार्टियां इसके विरोध में एकजुट हो गईं। उनका तर्क था कि महिला आरक्षण की आड़ में बीजेपी अपना एजेंडा पूरा करना चाहती है। परिसीमन विधेयक से ज्यादा जनसंख्या वाले हिन्दी भाषी राज्यों को फायदा मिलेगा, जहां बीजेपी का गढ़ है। जबकि जनसंख्या वृद्धि रोकने वाले राज्यों को नुकसान होगा।
संविधान संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत जरूरी होता है। यानी वोटिग में आधे से ज्यादा सदस्य सदन में मौजूद हों और जितने सदस्य मौजूद हैं, उनमें से कम से कम दो-तिहाई सांसद इसके पक्ष में वोट दें।
मान लीजिए लोकसभा में सभी 543 सांसद मौजूद हों और बिल पर वोटिग करें, तो बिल पास होने के लिए इसके दो-तिहाई यानी 362 सांसदों का समर्थन जरूरी है। अप्रैल में वोटिग के दौरान लोकसभा में 528 सांसद मौजूद थे। इसके दो-तिहाई के हिसाब से बिल को पास कराने के लिए 352 वोट चाहिए थे।
वोटिग हुई, तो बिल के समर्थन में 298 वोट और विरोध में 23० वोट पड़े। इससे संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 54 वोटों से गिर गया। अप्रैल में ये बिल गिरने के बाद पीएम मोदी ने कहा था, ‘कल हमारे पास पर्याप्त संख्या नहीं थी लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम हार गए हैं। भविष्य में हमें और अवसर मिलेंगे।’
अप्रैल के मुकाबले दोनों सदनों में सरकार का समर्थन बढ़ा है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत से अब भी पीछे है। 2०24 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी 24० सीटों पर जीती थी। एनडीए में चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी के 16, नीतीश कुमार की पार्टी जदयू के 12, शिवसेना (शिदे गुट) के 7, एलजेपी (राम विलास) के 5 और अन्य दलों के 13 सांसद भी शामिल थे। ये आंकड़ा बहुमत से 2० ज्यादा यानी 292 होता है।
14 जून 2०26 को टीएमसी नेता काकोली घोष दस्तीदार समेत लोकसभा 2० सांसद एनडीए समर्थित नेशनलिस्ट सिटिजन पार्टी से जुड़ गए, जिससे लोकसभा में एनडीए का नंबर 292 से बढ़कर 312 हो गया।
जून में ही महाराष्ट्र में शिवसेना उद्धव गुट के 9 में से 6 सांसद भी एनडीए के सहयोगी दल शिवसेना (शिदे गुट) में शामिल हो गए। इनके आने से लोकसभा में एनडीए का आंकड़ा 318 पहुंच गया है।
फिलहाल 3 लोकसभा सीटें खाली हैं- असम की नागांव, पश्चिम बंगाल की बसीरहाट और मेघालय की शिलॉन्ग। यानी बिल पर लोकसभा में वोटिग हो, तो अधिकतम 54० सांसद होंगे। इस हिसाब से दो-तिहाई के 36० के आंकड़े से एनडीए अभी 42 वोट पीछे हैं।
अप्रैल 2०26 में पंजाब से आप के 7 राज्यसभा सांसदों के बीजेपी जॉइन करने और जून में राज्यसभा चुनाव होने के बाद एनडीए के पास 149 सांसद हैं। इसमें से बीजेपी के 114 हैं, यानी 245 सीटों वाली राज्यसभा में एनडीए के पास सामान्य बहुमत से 27 सीटें ज्यादा हैं।
टीएमसी के 3 राज्यसभा सांसद- सुखेंदु शेखर रे, सुष्मिता देव और प्रकाश चिक बरैक ने पार्टी छोड़कर 9 जुलाई को बीजेपी जॉइन की। 17 जुलाई को निर्विरोध राज्यसभा सांसद चुन लिए गए। इससे राज्यसभा में एनडीए का नंबर बढ़कर 152 हो गया।
16 जुलाई को टीएमसी की सांसद कोयल मलिक ने भी इस्तीफा दे दिया है। उनके बीजेपी में शामिल होने की अटकलें हैं। राज्यसभा में दो-तिहाई बहुमत के लिए 163 का आंकड़ा चाहिए। यानी एनडीए इससे सिर्फ 11 वोट पीछे है।
आखिर परिसीमन बिल पारित होने से क्या हो जाएगा, बीजेपी इतना जोर क्यों लगा रही?
नए परिसीमन के बाद लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में 5०% सीटें बढ़ेंगी। गृहमंत्री अमित शाह ने इसका फॉर्मूला बताते हुए कहा था, ‘मान लीजिए कि 1०० सीटें हैं, जिसमें 33% आरक्षण देना है, तो इसमें 5० सीटें बढ़ाएंगे। इस हिसाब से 15० सीट होती हैं। लोकसभा में ये राउंड ऑफ फिगर 85० है।’
सरकार का कहना था कि सारे राज्यों में सीटें ‘आनुपातिक रूप से’ बढ़ेंगी। यानी, अगर 543 सीटों की लोकसभा में तमिलनाडु के पास 7.18% हिस्सेदारी, यानी 39 सीटें हैं, तो 85० सीटों की लोकसभा में भी 7.18% हिस्सेदारी यानी 61 सीटें होंगी।
हालांकि परिसीमन विधेयक में सीटें ‘आनुपातिक रूप से बढ़ाने’ की गारंटी देने वाला कोई प्रावधान नहीं है। इसके उलट संविधान का अनुच्छेद 81(2)(ए) कहता है कि सीटें जनसंख्या के अनुपात में मिलेंगी, न कि सभी राज्यों में बराबर प्रतिशत की बढ़ोत्तरी होगी। इसमें भी सरकार ने कोई बदलाव नहीं किया। यानी 2०11 की जनगणना के आधार पर जनसंख्या के अनुपात से ही परिसीमन हो सकता है। ऐसे में ज्यादा जनसंख्या वाले राज्यों को ज्यादा सीटें और कम जनसंख्या वाले राज्यों को कम सीटें मिलेंगी।
इससे यूपी, बिहार, राजस्थान, दिल्ली और मध्य प्रदेश सबसे ज्यादा फायदा में होंगे। ये सभी हिदी बेल्ट के राज्य हैं, जहां बीजेपी का स्ट्रॉन्ग होल्ड है। इससे बीजेपी के पिछले तीन चुनावों के आंकड़ों के आधार पर उसके लिए अच्छे और बुरे दोनों सिनैरियो में फायदा है।
बीजेपी के लिए बेस्ट केस सिनैरियो : अगर 2०19 का प्रदर्शन दोहराती है
परिसीमन के बाद लोकसभा में 85० सीटें हुईं, तो बहुमत का आंकड़ा 426 होगा। 2०19 में भाजपा को कुल 3०3 सीटें मिली थीं। इनमें 168 सीटें हिदी भाषी राज्यों (काउ बेल्ट) से थीं यानी करीब 55% सीटें। अगर 2०29 में भाजपा 2०19 का ही प्रदर्शन दोहराती है, तो उसे काउ बेल्ट में ही 299 सीटें मिलेंगी यानी बहुमत के लिए जरूरी सीटों में से करीब 7०% सीटें भाजपा 8 राज्यों से ही हासिल कर लेगी।
भाजपा ने 2०19 में गैर-हिदी भाषी राज्य गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल और कर्नाटक में जबरदस्त प्रदर्शन किया था। अगर वहीं प्रदर्शन भाजपा, परिसीमन के बाद भी दोहराती है, तो गुजरात में 43, पश्चिम बंगाल में 27, कर्नाटक में 37 और महाराष्ट्र में 37 सीटें मिलेंगी। इस तरह बीजेपी इन 12 राज्यों से ही बहुमत का आंकड़ा पार कर लेगी।
बीजेपी के वस्र्ट केस सिनैरियो : अगर 2०24 का प्रदर्शन दोहराती है
2०24 में भाजपा को 24० सीटें मिली थीं। गठजोड़ से सरकार बनानी पड़ी। बीजेपी की 24० में से 118 सीटें हिदी भाषी राज्यों (काउ बेल्ट) से थीं। यानी करीब 49% सीटें। परिसीमन के बाद अगर भाजपा 2०24 का ही प्रदर्शन दोहराए तो काउ बेल्ट में 21० सीटें मिलेंगी यानी बहुमत के लिए जरूरी सीटों में से करीब 5०% सीटें भाजपा इन आठ राज्यों से ही हासिल कर लेगी।
राजेश श्रीवास्तव