-ललित गर्ग-
15 अगस्त भारत के राष्ट्रीय जीवन का वह गौरवपूर्ण दिन है, जब हमारी धरती ने पराधीनता की लंबी रात के बाद स्वतंत्रता का सूर्य देखा था। 2026 में हम स्वतंत्रता का 80वां दिवस मना रहे हैं। यह केवल अतीत के गौरव को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि जिन सपनों के लिए असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उन सपनों को हमने कितना साकार किया और अब 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को कैसा बनाना है। 1947 ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी थी, लेकिन 2047 का लक्ष्य हमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सामरिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत बनाने का है।
स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता तब सार्थक होगी, जब प्रत्येक नागरिक भय, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी, भेदभाव और अवसरों की असमानता से मुक्त हो। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जब लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने की प्रक्रिया न रहकर जनकल्याण का माध्यम बने, जब राजनीति में सेवा, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और समाज में संवेदना प्रतिष्ठित हो। आजादी की पहली पीढ़ी ने देश को गुलामी से मुक्त किया था; आज की पीढ़ी को देश को निर्भरता, पिछड़ेपन और आत्महीनता से मुक्त करना है। पिछले वर्षों में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बार-बार देश को आत्मनिर्भरता, नवाचार और युवाशक्ति का मंत्र दिया है। 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रतिभाशाली युवाओं और शोधकर्ताओं का आह्वान करते हुए पूछा कि भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन स्वयं क्यों नहीं बना सकता। उन्होंने सेमीकंडक्टर से लेकर अंतरिक्ष, जैव-प्रौद्योगिकी और रक्षा तक भारतीय प्रतिभा को अपनी क्षमता के बल पर आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने युवाओं के विचारों को रोकने के बजाय उन्हें अवसर देने और उनके नवाचार को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलने वाली प्रतिभाएं स्टार्टअप, अंतरिक्ष, खेल, विज्ञान, डिजिटल तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। प्रधानमंत्री ने लाल किले से यह भी रेखांकित किया है कि भारत के युवाओं ने देश को दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में स्थान दिलाया है और अनेक छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के युवा नई तकनीकी संभावनाओं को जन्म दे रहे हैं।
आत्मनिर्भर भारत इसी बदलती मानसिकता का परिणाम है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ बराबरी से खड़े होकर अपने सामर्थ्य के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना है। भारत अब केवल आयात करने वाला विशाल बाजार नहीं रहना चाहता; वह निर्माण करने, नवाचार करने और दुनिया को निर्यात करने वाला देश बन रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, रक्षा उपकरण, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल सेवाओं में भारत की क्षमता लगातार बढ़ी है। गैर-पेट्रोलियम वस्तुओं के निर्यात ने भी नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जबकि सेवाओं के क्षेत्र में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति लगातार मजबूत हुई है। आत्मनिर्भरता की सबसे प्रभावशाली तस्वीर रक्षा क्षेत्र में दिखाई देती है। कभी भारत विश्व के बड़े हथियार आयातकों में गिना जाता था, लेकिन अब स्वदेशी उत्पादन और रक्षा निर्यात दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने 38,424 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्तर हासिल किया, जो पिछले वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये से 62.66 प्रतिशत अधिक है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि विश्व के देशों को रक्षा सामग्री उपलब्ध कराने की क्षमता भी अर्जित कर रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने गोला-बारूद, हथियार, उप-प्रणालियां, प्रणालियां और महत्वपूर्ण पुर्जे लगभग 80 देशों तक पहुंचाए हैं। 2013-14 में रक्षा निर्यात महज 686 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाकृअर्थात एक दशक में लगभग 34 गुना वृद्धि। यह ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा का सशक्त प्रमाण है।
लेकिन आत्मनिर्भर भारत की असली परीक्षा केवल अर्थव्यवस्था और तकनीक में नहीं है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आत्मनिर्भर होने के साथ आत्मसंयमी भी हो, शक्तिशाली होने के साथ संवेदनशील भी हो और आधुनिक होने के साथ अपनी संस्कृति एवं नैतिक जड़ों से जुड़ा भी हो। महात्मा गांधी, भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने हमें बताया था कि विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य की गरिमा और समाज में शांति है। यदि तकनीक बढ़ती जाए लेकिन मनुष्यता घटती जाए, यदि संपन्नता बढ़े लेकिन संवेदना कम हो जाए, यदि अधिकारों की मांग बढ़े लेकिन कर्तव्यबोध समाप्त हो जाए तो स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। हमारे सामने आज भी गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, भ्रष्टाचार, सामाजिक तनाव, हिंसा, पर्यावरण संकट और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां हैं। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प भी है। हमें ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें सत्य, शुचिता, सहिष्णुता, अनुशासन, परस्पर सम्मान और राष्ट्रहित सर्वाेपरि हों। लोकतंत्र की मजबूती केवल संसद या सरकार से नहीं होती; वह नागरिक के चरित्र से होती है। लोकतंत्र को मजबूत संसद के साथ मजबूत समाज और जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए।
आज का भारत विश्व की युवा शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मूलतः युवाओं का लक्ष्य है, क्योंकि आज का युवा ही 2047 के भारत का नेतृत्व करेगा। प्रधानमंत्री ने ‘विकसित भारत/2047 रू वॉइस ऑफ यूथ’ पहल के माध्यम से युवाओं को केवल भविष्य के लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन के एजेंट के रूप में सामने रखा है। इसीलिए 2026 के स्वतंत्रता दिवस अभियान का केंद्र भी युवाओं को एक मजबूत, आत्मनिर्भर, नवाचारी और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण से जोड़ना है। सरकारी ‘माय भारत’ पहल में युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। 2047 की यात्रा में हमें युवाओं से केवल नौकरी पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए; उन्हें रोजगार देने वाला, समस्या का समाधान खोजने वाला, नवाचार करने वाला और समाज का नेतृत्व करने वाला बनाना होगा। शिक्षा को डिग्री से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से उद्यमिता की ओर ले जाना होगा। गांव का युवा भी अंतरिक्ष में अवसर देखे, छोटे शहर की बेटी भी विज्ञान और तकनीक में विश्वस्तरीय पहचान बनाए, किसान का बेटा भी एग्रीटेक उद्यमी बने और सामान्य परिवार का युवा भी स्टार्टअप के माध्यम से हजारों लोगों के लिए रोजगार पैदा करेकृयही नए भारत की तस्वीर है।
आजादी की पहली लड़ाई में युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को स्वतंत्र बनाया था। 2047 के भारत की लड़ाई में युवाओं को ज्ञान, नवाचार, चरित्र, परिश्रम और राष्ट्रभावना को अपना हथियार बनाना होगा। यदि 1947 की पीढ़ी ने पूछा थाकृ‘भारत को आजाद कैसे कराएं?’, तो आज की पीढ़ी को पूछना होगा-‘भारत को दुनिया का विकसित, समर्थ, शांतिपूर्ण और नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र कैसे बनाएं?’स्वतंत्रता की सार्थकता इसी प्रश्न के उत्तर में छिपी है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां विकास की चमक के साथ मानवीयता की रोशनी भी हो; जहां विज्ञान आगे बढ़े तो संस्कार भी साथ चलें; जहां अर्थव्यवस्था मजबूत हो तो समाज भी समरस हो; जहां भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर न हो और विश्व की शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।
आज जब तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर लहराएगा, तब हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि भारत स्वतंत्र है, बल्कि यह संकल्प भी लेना चाहिए कि हम इस स्वतंत्रता को अधिक सार्थक, अधिक जिम्मेदार और अधिक जनकल्याणकारी बनाएंगे। 2047 का विकसित भारत सरकार का अकेला सपना नहीं, 140 करोड़ भारतीयों का सामूहिक संकल्प होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी 2047 को नागरिकों के सपनों और संकल्पों से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि विकसित भारत का निर्माण प्रत्येक भारतीय की भागीदारी से होगा। आजादी के अमृत से लेकर स्वतंत्रता के 80वें पड़ाव तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है। अब अगला पड़ाव केवल आर्थिक शक्ति बनना नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक, विज्ञान, संस्कार और सामर्थ्य से सम्पन्न भारत बनना है। शहीदों ने हमें स्वतंत्र भारत सौंपा था; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा भारत सौंपें जिस पर उसे गर्व हो। ’यही स्वतंत्रता का नया आयाम है, यही 2047 की ओर बढ़ते भारत का संकल्प है और यही हमारे तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।’