डा. विनोद बब्बर
भारतीय संस्कृति में गुरु की बहुत महत्ता है। गुरु ज्ञान का स्रोत है। यह सत्य है की मां प्रथम गुरु हैऔर शिक्षक सांसारिक ज्ञान देने वाले गुरु है। जीवन के अलग -अलग सोपान पर परिस्थितियों के अनुसार अनेक प्रकार की जानकारी की आवश्यकता होती है तो नया सीखने के लिए प्रशिक्षण भी प्राप्त करना पड़ता है। किसी भी रूप में ज्ञान देने वाले हमारे गुरु हैं लेकिन जो हमें सदमार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हुए अध्यात्म से जोड़ता है, वह जीवन का उद्धारक है। इसीलिए जन-जन में लोकप्रिय संत कवि कबीर ने गुरु की महिमा का बखान करते हुए कहा है –
गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागू पाँय।
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय॥
एक अन्य स्थान पर कबीर साहेब कहते हैं –
ज्ञान प्रकाशा गुरु मिल्या, सो मिल्या जिण बीसरि जाइ।
जब गोविंद कृपा करी, तब गुरु मिल्या आई॥
गुरु की अनंत महिमा के कारण उन्हें साक्षात परब्रह्मस्वरूप भी कहा गया है –
गुरुर्ब्रह्मा गुरूर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः।।
शास्त्रों का कथन है-
निवर्तयत्यन्यजनं प्रमादतः स्वयं च निष्पापपथे प्रवर्तते।
गुणाति तत्त्वं हितमिच्छुरंगिनाम् शिवार्थिनां यः स गुरु र्निगद्यते।
अर्थात् जो दूसरों को प्रमाद करने से रोकते हैं, स्वयं निष्पाप रास्ते से चलते हैं, हित और कल्याण की कामना रखनेवाले को तत्त्वबोध करते हैं, उन्हें गुरु कहा जाता हैं।
शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है – अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ किया गया है – उसका निरोधक। अंधकार को हटाकर प्रकाश की ओर ले जाने वाले को गुरु कहा जाता है। यह सर्वज्ञात है कि वर्ष में 12 मास और हर माह पूर्णिमा होती है। परंतु अनेक लोगों के मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा ही गुरु पूर्णिमा क्यों? शरद पूर्णिमा की बहुत महिमा है तो फिर हमारे मनीषी ऋषियों ने उसे क्यों नहीं चुना गया? आषाढ़ पूर्णिमा ही क्यों? वे जरूर इसके माध्यम से कोई संदेश देना चाहते होंगे।
गुरु सदैव पूर्णिमा जैसा तो शिष्य आषाढ़ जैसा होता है। शरद पूर्णिमा का चांद निश्चित सुंदर होता है, क्योंकि आकाश खाली है। वहां शिष्य है ही नहीं, पर प्रकाश फैलाने वाला गुरु अकेला है। जबकि आषाढ़ पूर्णिमा ऐसी जैसे गुरु बादलों रूपी शिष्यों से घिरा हो।
यह भी स्मरणीय है कि गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरंभ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, ऐसे ही गुरु शरण में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शांति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। इस दिन महाभारत ग्रन्थ के रचयिता महर्षि वेदव्यास जी का जन्मदिन भी है। उन्होंने चारो वेदों की रचना की थी। इसी कारण उनका नाम वेद व्यास पड़ा, उन्हें आदि गुरु भी कहा जाता है। उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है।
प्रश्न तो यह भी उठ सकता है कि चंद्रमा में शीतलता है। चंदमा की बजाय यदि सूर्य को चुनते तो क्या ज्यादा उचित नहीं होता? यह भी स्मरणीय है कि चंदमा के पास अपना प्रकाश नहीं है। उसकी रोशनी तो उधार की है। जैसे दीये को दर्पण के समक्ष रखने पर उसमें जो प्रकाश उजास प्रकट होता है वह वास्तव में दीये के प्रकाश का परावर्तन है। इसी तरह चंदमा भी दर्पण है, प्रकाश तो सूरज का है। गुरु के पास भी परमात्मा की कृपा से प्राप्त ज्ञान है। वह भी प्रतिफलन है। दर्पण है। जैसे सूर्य की तरफ सीधे देखना मुश्किल है, ठीक उसी तरह प्रभु के विराट स्वरूप को देखना -समझना असंभव है। कुरुक्षेत्र के मैदान में जब भगवान श्री कृष्ण ने अपना विराट स्वरूप दिखाया तो सदा उनके साथ रहने वाला धनुर्धर अर्जुन भी घबरा गया था। ऐसे ही असाधारण तेज के समक्ष टिकना शिष्य की सामर्थ्य के बिल्कुल बाहर है। इसलिए हमारे ऋषियों ने अपने ही बीच रहने वाले सहज व्यक्तित्व को गुरु के रूप में स्वीकारा है। गुरु रूपी यह दर्पण ज्ञान रूपी प्रकाश का गुणधर्म बदल देता है। सूर्य जितना प्रखर है, चंद्रमा उतना ही शीतल है। इसीलिए तो संत शिरोमणि कबीर कहते हैं –
गुरु गोविंद दोऊ खड़े काके लागूं पांय।
बलिहारी गुरु आपकी, जो गोविंद दियो बताय।
महर्षि दत्तात्रेय ने समस्त जगत में मौजूद हर वनस्पति, प्राणियों, ग्रह-नक्षत्रों को अपना गुरु माना। इनमें प्रमुख रुप से पृथ्वी, आकाश, वायु, जल, सूर्य, चंद्र, कबूतर, मधुमक्खी, हाथी, अजगर, पतंगा, हिरण, मछली, गरुड़, मकड़ी, बालक, वैश्या, कन्या, बाण प्रमुख थे। जिनसे उन्होंने कोई गुरु मंत्र और शिक्षा नहीं ली। मात्र इनकी गति, प्रकृति, गुणों को देखकर अपनी दृष्टि और विचार से शिक्षा पाई और आत्म ज्ञान पा लिया। इससे ही श्री दत्तात्रेय जगद्गुरु बन गए। उन्होंने जगत को बताया कि मात्र देहधारी कोई मनुष्य या देवता ही गुरु नहीं होता। बल्कि पूरे जगत की हर रचना में गुरु मौजूद है। यहां तक कि हमारे स्वयं के अंदर भी।
भारत जगद्गुरु रहा है फिर भी न जाने क्यों कुछ लोग सवाल उठाते हैं कि जब गीता में माता-पिता की सेवा का कोई स्पष्टतः उल्लेख नहीं हैं तो संत माता पिता की सेवा, संत सेवा, राष्ट्र सेवा, समाज सेवा की चर्चा क्यों करते हैं? ऐसे सवाल उठाने वालों को समझना चाहिए कि भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद् भागवत गीता के माध्यम से गृहस्थ जीवन का त्याग करने की बजाय उसे निभाने की बात कही है। माता पिता भी तो गृहस्थी का ही भाग हैं, न कि भिन्न। उनके बिना हमारा कोई अस्तित्व हो ही कैसे होता है। हम उनकी गृहस्थी का विस्तार हैं तो वह हमारी गृहस्थी शीर्ष हैं। इसी प्रकार समाज भी तो हमारा वृहद परिवार है। जो व्यक्ति गृहस्थ धर्म का पालन करता है वह अपनी परिवार (गृहस्थी) में शामिल हर सदस्य के प्रति अपना कर्तव्य निभाता है। इस संसार में कोई भी मनुष्य अपने कर्म से विमुख नहीं हो सकता तो गुरुपूजा, अर्थात गुरु के प्रति समर्पण को उपेक्षित नहीं किया जा सकता। परिवार, समाज और राष्ट्र गुरुता की कसौटी है। जो हमें हमारे कर्तव्य बोध से परिचित कराये, वह हमारा गुरु होने के नाते से वंदनीय है। गुरु पूर्णिमा की सभी को हार्दिक शुभकामनाएं। उन्हें विशेष जिन्हें सच्चा गुरु मिला। बटोरने वाले तो बहुत है, बांटने वाले कितने हैं यह शोध का विषय है। सच्चा गुरु वह जो पहले अपने सच्चे शिष्यों का हितचिंतन करे।
अपने वक्तव्य को विराम देने से पूर्व ज्ञान के प्रसार में लगे सभी गुरुजनों को नमन करता हूं ।
किमत्र बहुनोक्तेन शास्त्रकोटि शतेन च।
दुर्लभा चित्त विश्रान्तिः विना गुरुकृपां परम्।।
(बहुत कहने से क्या ? करोडों शास्त्रों से भी क्या ? चित्त की परम् शांति, गुरु के बिना मिलना दुर्लभ है)