मनोरंजन मीडिया

सम्पादकीय का महत्व

डॉ. नीरज भारद्वाज

हिन्दी समूचे भारत की अर्थात पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण की संपर्क भाषा है। स्वतंत्रता संग्राम के समय इसने राष्ट्रभाषा की भूमिका का निर्वाह किया है। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद इसका प्रयोग राजकाज, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, जनसंचार, वाणिज्य, व्यापार आदि सभी क्षेत्रों में होने लगा। इन सभी क्षेत्रों में हिन्दी प्रयोग के विभिन्न शैलीगत एवं प्रयुक्तिपरक रूप उभरकर सामने आए हैं। जहाँ तक प्रिंट मीडिया का प्रश्न है, इसमें हिन्दी का स्वरूप दिनों-दिन बदलता और संवरता रहा है। इस समय मीडिया सबसे शक्तिशाली तथा प्रभावशाली लोकतांत्रिक संस्था बनकर उभरा है। इसे लोकतंत्र का चौथा आधार स्तंभ भी कहा जाता है। मीडिया में समय की गति के साथ जो भाषायी परिवर्तन हुए हैं वे विचारणीय होते जा रहे हैं।

     आज मीडियाविहीन  जीवन या समाज की कल्पना नहीं की जा सकती और मीडिया भी तेजी आगे बढ़ रहा है। प्रिंट मीडिया में जिस प्रकार कि हिन्दी भाषा का प्रयोग और उसका विस्तार हो रहा है, उससे वह हिन्दी मनीषियों की चिंता का विषय बन गई है। अगर प्रारंभ से ही प्रिंट मीडिया के क्षेत्र में हिन्दी भाषा के प्रयोग पर गंभीरता से विचार किया जाता तो उसका विकास और लेखन उत्कृष्ट रूप में हो सकता था।जैसे-जैसे देश का विकास हुआ और स्वतंत्रता के बाद अंग्रेजी भाषा का प्रयोग प्रचलन में अधिक होने लगा तो प्रिंट मीडिया पर अंग्रेजी मिश्रित हिन्दी का प्रभाव दिखने लगा। इससे एक नई भाषा और सोच का जन्म हो गया। जब हम समाचारपत्र की बात करते हैं, तो उसमें छपे समाचारों को देखते-पढ़ते हैं। समाचार के छपने, प्रकाशित होने तक की पूरी प्रक्रिया में सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य सम्पादक का होता है।

समाचारपत्रों में सम्पादक का दायित्व बहुत व्यापक होता है। वह स्थिति के अनुसार समाचारों का चयन करता है, संवाददाता किस-किस स्थान पर नियुक्त किए गए हैं, किस पत्रकार द्वारा भेजा गया समाचार सर्वोत्कृष्ट और महत्त्वपूर्ण संवाद है,विश्व के किस कोने में कौन सी घटना घटी आदि गतिविधियों पर अपनी दूरदृष्टि लगाए रखना सम्पादक का दायित्व है। जनता के सामने कौन सी घटना या प्रश्न सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है, किस विषय पर अधिक सोचना और लिखना है, आदि सभी बातों को सम्पादक अपने दृष्टिकोण में रखता है। सम्पादक अपने साथी पत्रकारों द्वारा की गई किसी भी त्रुटि के लिए जिम्मेदार भी होता है। समाचारपत्र में लिखित सामग्री होती है और वह समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को नई जानकारी प्रदान करने के साथ-साथ उसका मार्गदर्शन करती है।

समाचारपत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण आलेख सम्पादकीय होता है। सम्पादकीय सामाजिक समस्याओं, घटनाओं, विचारों व उपलब्धियों को लेकर लिखा जाता है। सम्पादकीय लेख का आदर्श जनहित की भावनाओं की रक्षा करना तथा सामान्य व्यक्ति के हितों का रक्षक और मार्गदर्शक बनना होता है। सम्पादकीय समाचारपत्र की वह ताकत होती है, जिसे पढ़कर लोग अपनी राय बनाते हैं। इस दृष्टि से सम्पादकीय के द्वारा सम्पादक समाज में हो रहे यथार्थ को पाठक के समाने विश्लेषनात्मक तरीके से रखता है। सम्पादक अपनी व्यापक दृष्टि के चलते किसी भी घटना अर्थात् विषय को अतीत, वर्तमान और भविष्य से जोड़कर प्रस्तुत करता है। सम्पादक भविष्य दृष्टा के साथ-साथ वर्तमान का सजग प्रहरी होता है। सम्पादकीय लेख पाठक की जिज्ञासा शांत करने के साथ-साथ उसे वास्तविक स्थिति से अवगत करता है। समाचारपत्र में सम्पादकीय पृष्ठ की सबसे बड़ी पहचान एवं विशेषता यह भी है कि इसमें कोई विज्ञापन नहीं होता।

समाचारपत्र में सम्पादकीय बड़ा महत्त्वपूर्ण होता है। पाठक मुख्य समाचारों को पढ़कर सम्पादकीय को बड़े ध्यान से पढ़ता है। सम्पादकीय की भाषा समाचार के ‘इंट्रों’ की तरह प्रभावकारी या आकर्षित करने वाली नहीं होती है, बल्कि उसमें विषय की सार्थकता और ज्ञान संवर्धन होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो सम्पादकीय लोकसेवा परक पत्रकारिता का श्रेष्ठ साधन है। सम्पादकीय जन चेतना का प्रहरी अथवा प्रवक्ता होता है। सम्पादकीय में भाषा और शैली विषय के अनुरूप होनी चाहिए, जिससे की सामान्य पाठक से लेकर विशिष्ट बुद्धि वर्ग तक का पाठक सहजता से पढ़ और समझ सके। वास्तव में सम्पादकीय समाचारपत्र की आत्मा है।

सम्पादकीय बहुत ही उत्तरदायित्वपूर्ण कार्य है। यह समाचारपत्र की बौद्धिक क्षमता, उसकी तर्कशीलता दूरगामी सोच और निष्पक्षता का पर्याय होता है। सम्पादकीय सम्पादक की सर्जनात्मक शक्ति, बौद्धिक कौशल और संवेदनाओं की कसौटी है, जिस पर उसे खरा उतरना होता है। समाचारपत्र का सम्पादकीय निष्कर्ष परामर्श, सुझाव, चेतावनी, संघर्ष की प्रेरणा आदि रूप में होता है।

डॉ. नीरज भारद्वाज