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भारत के निवासियों का संबोधन ‘आर्य ‘ हो

भारतीय संविधान की उद्देशिका

संविधान की उद्देशिका में स्पष्ट किया गया है कि भारत का संविधान किन आदर्शों को लेकर निर्मित किया गया है ? देश के संविधान की उद्देशिका में ‘ हम भारत के लोग’ का अर्थ क्या है ? उद्देशिका में प्रस्तुत किए गए शब्द प्रभुत्वसंपन्न, लोकतंत्रात्मक गणराज्य , समाजवादी लोकतंत्र और समाजवाद, पंथनिरपेक्षता, न्याय, स्वतंत्रता, समता, बंधुता जैसे शब्दों की गरिमा क्या है और उन्हें क्यों इस संविधान में स्थापित किया गया है ? यद्यपि भारतीय संविधान की उद्देशिका में इन शब्दों को स्थान दे दिया गया है, परंतु उनके अनुसार समाज बनाने की किसी संकल्पना को पूरे संविधान में कहीं स्पष्ट नहीं किया गया। इन शब्दों को पढ़ने से हल्की सी झलक इस बात की दिखाई देती है कि जैसे संविधान निर्मात्री सभा भारत के प्राचीन सांस्कृतिक गौरव के प्रति कहीं गंभीर थी ? परंतु दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि मनु महाराज की मनुस्मृति के अनुसार वह इन शब्दों को व्यावहारिक रूप से मानव के मन मस्तिष्क में स्थापित करने के लिए कोई व्यवहारिक कार्य योजना अर्थात’ रोडमैप ‘ नहीं दे पाई।

भारत के लोगों का संबोधन ‘ आर्य ‘ हो

भारतीय संविधान में संघ का राज्य क्षेत्र और राज्यों का निर्माण विषय को भी स्पष्ट किया गया है। नागरिकता के बिंदु को भी स्पष्ट किया गया है। नागरिकों के मौलिक अधिकार भी स्पष्ट किए गए हैं। भारतीय संविधान केवल एक नागरिकता देने की बात करता है,नागरिकता की समाप्ति किस प्रकार हो जाएगी ? इसको भी स्पष्ट करता है। परंतु यह स्पष्ट नहीं करता कि भारत के नागरिकों का एक सामूहिक अथवा कॉमन संबोधन क्या होगा ? जैसे प्राचीन काल में भारत के लोग एक दूसरे को ‘ आर्य ‘ कहकर संबोधित करते थे। भारत के संविधान के निर्माताओं को इस विषय पर विशेष विचार करना चाहिए था कि भारत के लोगों का एक सामूहिक संबोधन ‘ आर्य ‘ रखा जाए।
भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों को समाविष्ट किया गया है। जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मानव के लिए मौलिक अधिकार ऐसे अधिकार हैं, जिनका अपहरण नहीं हो सकता। इसमें बंदी प्रत्यक्षीकरण को भी स्पष्ट किया गया है। मूल अधिकार किन परिस्थितियों में निलंबित हो जाएंगे ? – इस पर भी स्पष्ट व्यवस्था की गई है। मौलिक अधिकारों का वर्गीकरण भी किया गया है। ये ऐसे मौलिक अधिकार हैं जिनके बारे में संविधान स्पष्ट करता है कि इन्हें जाति, संप्रदाय, लिंग के भेद के बिना सबको समान रूप से उपलब्ध कराया जाएगा। कई विद्वानों ने मौलिक अधिकारों को नागरिकों के लिए मर्यादाओं के रूप में भी स्थापित करने का प्रयास किया है। वास्तव में देश के नागरिकों को मौलिक अधिकार तो मिलने ही चाहिए, यह आज के समाज की और आज के विश्व की आवश्यकता है। क्योंकि आज बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है, यह आदर्श मानकर लोग भौतिक जगत की आपाधापी में जुटे हुए हैं। जिसमें किसी भी दुर्बल वर्ग के अधिकारों का हनन और शोषण हो जाना स्वाभाविक है। इसलिए राज्य को ऐसी व्यवस्था करनी ही चाहिए, जिसमें कोई भी वर्ग अपने आप को उपेक्षित न अनुभव करे।

मौलिक अधिकार बनाम कर्तव्यवाद

इस सबके उपरांत भी अधिकारों से पहले कर्तव्यशील मानव समाज का निर्माण किया जाना आवश्यक है। यह मानवीय दृष्टिकोण भी है और प्राकृतिक न्याय के अनुकूल भी है। प्रकृति में ‘ ले ‘ और ‘ दे ‘ के आधार पर सारा कार्य व्यवहार चल रहा है। मूर्ख और अज्ञानी लोग प्रकृति में उन हिंसक जानवरों का उदाहरण देते हैं, जो दूसरे प्राणियों को खाकर अपना गुजारा करते हैं। वह यह नहीं देखते कि ये हिंसक जानवर मानव नहीं हैं तो मानव को किसी जानवर का अनुगमन क्यों करना चाहिए ? मानव को मानव बनाना प्रकृति के साथ उसका समन्वय स्थापित करना है। भगवान की व्यवस्था के प्रति मानव का पूर्ण समर्पण कर देना है। उसे यह बताना है कि तुझे ईश्वरीय व्यवस्था में कहीं बाधक नहीं बनना है अपितु इसमें सहायक बनकर जीवन जीना है। मानव प्रकृति का मित्र बन जाए और प्रकृति उसकी मित्र बन जाए। दोनों मिलकर जिस संगीत की उत्पत्ति करें वही मानवता होगी। इस संगीत की स्वर लहरियों को उत्पन्न करने के लिए संविधान में कोई व्यवस्था नहीं है। जिन लोगों ने संविधान के लचीलेपन का लाभ उठाते हुए अपने विशिष्ट पर्वों पर पशु हत्या करने को अपना अधिकार घोषित कराने का प्रयास किया है यदि उस पर संविधान लचीला है अथवा मौन होने का संकेत देता है तो भारतीय संविधान की यह प्रचलित व्यवस्था कभी भी मानवतावाद विकसित नहीं कर पाएगी।

राज्य के नीति निदेशक तत्व और संविधान

संविधान में राज्य के नीति निर्देशक तत्वों को भी स्थान दिया गया है। इन्हें भारतीय संविधान में आयरलैंड के संविधान से लिया गया है । जहां पर राज्य के मार्गदर्शन के लिए सामाजिक नीति के सिद्धांतों को स्थान दिया गया है। किंतु कोई भी न्यायालय उनका संज्ञान नहीं ले सकता।
आप बच्चों के सामने कुछ ऐसी वस्तुओं को रखने का प्रयास करें जो उसे खाने में स्वादिष्ट लगती हैं, परंतु स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं । उन्हीं वस्तुओं के साथ कुछ ऐसी वस्तुओं को भी रखें जो खाने में तो स्वादिष्ट नहीं हैं परंतु स्वास्थ्य के लिए हितकारी हैं।
अब बच्चों से आप कहें कि आप इनमें से केवल उन वस्तुओं का खाने के लिए चयन करें जो खाने में तो स्वादिष्ट नहीं हैं, परंतु स्वास्थ्य के लिए हितकारी हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट कर दें कि यदि आप इन्हें नहीं खाते हैं तो आपके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं होगी। तब उन बच्चों से आप यह अपेक्षा नहीं कर सकते कि वह आपके इस नीति निदेशक तत्व का पालन करेगा ? वह उसी को खाएगा जो उसे अच्छा लगता है। उसका परिणाम चाहे उसके विपरीत आए – इस बात का उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। बस, यही स्थिति राज्य के नीति निर्देशक तत्वों की है। यदि इनको लागू करने के लिए न्यायालय के पास कोई शक्ति नहीं है तो संविधान में उनके बने रहने का कोई लाभ नहीं है। यही कारण है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्वों पर देश के नागरिकों का भी उदासीन दृष्टिकोण देखा जाता है। इनका प्रावधान केवल ‘ शो पीस ‘ बनकर रह गया है। ऐसी स्थिति में कहा जा सकता है कि राज्य के नीति निर्देशक तत्व संविधान को बोझ मारने के लिए ही स्थापित कर दिए गए हैं।
इसी प्रकार संविधान में मूल कर्तव्यों को स्थान दिया गया है। ये भी प्रवर्तनीय नहीं हैं, किंतु इन्हें भी उत्तम मार्गदर्शक के रूप में मान्यता दी गई है। मूल कर्तव्यों को अनिवार्य रूप से लागू करने के लिए वैदिक शिक्षा के अनुकूल शैक्षणिक संस्थाओं की स्थापना करना राज्य अनिवार्य करेगा, ऐसी व्यवस्था संविधान में होनी अपेक्षित थी। इस प्रकार की व्यवस्था से हम कर्तव्य परायण मानव समाज का निर्माण करने में सफल होते।
संविधान में संघ की कार्यपालिका के लिए भी प्रावधान किया गया है। जिसमें स्पष्ट किया गया है कि कार्यपालिका की शक्ति राष्ट्रपति में निहित है। शक्तियों का पृथक्करण भी किया गया है। देश में संसदीय शासन प्रणाली को मान्यता प्रदान की गई है। भारत का राष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री परिषद राष्ट्रपति की अर्हताएं, राष्ट्रपति का निर्वाचन, राष्ट्रपति के निर्वाचन की रीति,उसके मत का मूल्य, पद के लिए शर्तें, पद की अवधि, राष्ट्रपति पर महाभियोग आदि प्राविधानों को भी स्पष्ट किया गया है। इसके अतिरिक्त देश के राष्ट्रपति की सैनिक शक्तियां, राजनीतिक शक्तियां, वीटो और इसका प्रयोजन, राज्यों के विधान के बारे में शक्ति, अध्यादेश निकालने की शक्ति, क्षमादान की शक्ति, राज्यपाल की क्षमादान की शक्ति, मंत्री परिषद , देश के प्रधानमंत्री की स्थिति, प्रधानमंत्री के कृत्य , देश के उपराष्ट्रपति के संबंध में प्राविधान, राष्ट्रपति और मंत्री परिषद, उपराष्ट्रपति का निर्वाचन, भारत का महान्यायवादी, संसद में भाग लेने का अधिकार आदि को भी प्राविधानित किया गया है।

डॉ राकेश कुमार आर्य