उमेश कुमार साहू
अंधेरा बाहर पसरा हो या भीतर, मनुष्य का आदिम स्वभाव सदा से रोशनी की तलाश का रहा है। हजारों वर्ष पूर्व जब घनी रातों के सन्नाटे में आदिमानव ने दो पत्थरों को टकराकर पहली चिंगारी सुलगाई होगी, तब सभ्यता ने प्रकाश का पहला उत्सव मनाया था। ऋग्वेद के ऋषियों ने प्रार्थना की – ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ (हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो)। यह केवल कोई पूजा-मंत्र नहीं, बल्कि प्रकृति और काल के अंधेरे से जूझते मनुष्य का अमर संकल्प था।
आज हम जिस दीपोत्सव को बिजली की जगमगाती लड़ियों, पटाखों के शोर, सोने-चांदी के सिक्कों और चमचमाते गिफ़्ट हैंपर्स के रूप में देखते हैं, क्या वह ढाई हजार साल पहले भी ऐसा ही था? इतिहास, साहित्य और पुरातत्व के पन्ने गवाही देते हैं कि आज की दीपावली एक दिन में नहीं बनी; यह 25 सदियों के सामाजिक, आर्थिक और आध्यात्मिक मंथन की जीती-जागती गाथा है।
पाटलिपुत्र के गंगा तट से कश्मीर की घाटियों तक : प्राचीन ग्रंथों की गवाही
समय के पहिये को पीछे घुमाएं, तो दीपोत्सव के अलग-अलग रूप विस्मय में डाल देते हैं :
मौर्य काल का कौमुदी महोत्सव (लगभग 300 ईसा पूर्व): मगध की राजधानी पाटलिपुत्र में चाणक्य और चंद्रगुप्त मौर्य के दौर में शरद पूर्णिमा से लेकर कार्तिक की रातों तक ‘कौमुदी महोत्सव’ सजता था। गंगा और सोन नदी के संगम पर रात के समय हजारों दीप तैरती नौकाओं पर सजाए जाते थे। जल की सतह पर थिरकते ये दीये बताते हैं कि आज बनारस और हरिद्वार की जो ‘देव-दीपावली’ दुनिया को लुभाती है, उसकी जड़ें मौर्य साम्राज्य के जल-दीपदान में ही थीं।
कामसूत्र की ‘यक्षरात्रि’ (तीसरी-चौथी सदी):
वात्स्यायन ने अपने ग्रंथ में कार्तिक की इस स्याह रात को ‘यक्षरात्रि’ और ‘सुखरात्रिका’ कहा है। यह केवल पूजा का विधान नहीं, बल्कि नागर जीवन का एक लोकोत्सव था। लोग अपने घरों के चौबारों पर मिट्टी के दीपक जलाते, सामूहिक नृत्य-संगीत में मगन होते और पांसे (द्यूतक्रीड़ा) के खेल से रात भर जागकर उत्सव मनाते थे।
नीलमत पुराण का बर्फीला उजाला (छठी सदी):
कश्मीर के सामाजिक इतिहास के प्रमाण ‘नीलमत पुराण’ के अनुसार, हिमालय की इन घाटियों में लोग कार्तिक की अमावस्या पर नए परिधान और आभूषण पहनकर मंदिरों व अपने आशियानों को दीपों से आलोकित करते थे। साथ ही, पितरों के मार्ग-दर्शन के लिए ‘उल्का-भ्रमण’ (मशालें जलाकर घुमाना) की परंपरा निभाई जाती थी।
सम्राट हर्ष और उपहारों का बाजार (सातवीं सदी):
नाटक ‘नागानन्द’ में सम्राट हर्षवर्धन ने इसे ‘दीप-प्रतिपदा’ कहा है। वे लिखते हैं कि राजमहलों से लेकर आम बस्तियों तक दीप जलते थे और नवविवाहित जोड़ों को नए वस्त्र व उपहार दिए जाते थे। आज कॉर्पोरेट जगत में जो अरबों रुपये का गिफ़्ट-मार्केट दीवाली पर खड़ा दिखता है, उसका औपचारिक बीज सातवीं सदी में ही बो दिया गया था।
सफेदी और स्वच्छता का नियम (दसवीं सदी) :
जैन आचार्य सोमदेव सूरि ने ‘यशस्तिलकचम्पू’ में उल्लेख किया है कि चौमासा (बरसात के चार महीने) बीतते ही लोग घरों की सीलन मिटाने के लिए चूने से पोताई करते थे, मुंडेरों को सजाते थे और संध्या होते ही छतों पर दीपमालाएं धरते थे। यानी वर्षा ऋतु के कीट-पतंगों को नष्ट करने और घर को स्वच्छ बनाने का यह व्यावहारिक विज्ञान सदियों पुराना है।
अलबरूनी की आँखें (ग्यारहवीं सदी) :
विदेशी यात्री अलबरूनी ने ‘किताब-उल-हिंद’ में हैरान होकर दर्ज किया – “कार्तिक मास की जब सबसे घनी काली रात आती है, तो भारत के लोग अपने घरों, दीवारों और देवालयों को दीपों से यूं पाट देते हैं कि धरती पर तारों की चादर बिछी जान पड़ती है।” उसने यह भी लिखा कि लोग गरीबों को भोजन और वस्त्र बांटने में असीम आनंद पाते थे।
आसमान में बारूदी रोशनी (पंद्रहवीं सदी):
आतिशबाजी का चलन सल्तनत और विजयनगर काल के दौरान व्यापक हुआ। विजयनगर आए इतालवी मुसाफिर निकोलो कोंटी (1420 ई.) ने लिखा कि लोग रात भर तेल के दीये जलाते थे और रंग-बिरंगी आतिशी लपटों से आसमान को चकाचौंध कर देते थे।
इतिहास के युगांतरकारी मोड़ :
जब रोशनी विचार बन गई
दीपावली केवल ऋतु-परिवर्तन का उत्सव नहीं, बल्कि इस उपमहाद्वीप के महानतम विचारों और स्मृतियों का संगम है:
- मर्यादा का राज्याभिषेक: 14 वर्ष के वनवास और रावण पर विजय के बाद जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, तो अवध की प्रजा ने अमावस्या की घोर कालिमा को घी के दीयों से धोकर पूर्णिमा में बदल दिया। यह विजय सत्ता की नहीं, सत्य और मर्यादा की थी।
- सद्ज्ञान का अमर निर्वाण (527 ईसा पूर्व):
पावापुरी की धरती पर जब चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर ने कार्तिक कृष्ण अमावस्या को निर्वाण प्राप्त किया, तब काशी और कोशल के गणराज्यों के सोलह राजाओं ने एकत्र होकर कहा था—”सद्ज्ञान का चेतना-सूर्य अस्त हो गया है, आओ हम माटी के दीये जलाकर उस आंतरिक आलोक को अमर कर दें।”
- दाता बंदी छोड़ का आगमन (1619 ई.): सिख परंपरा में यह दिन आत्मिक स्वतंत्रता का प्रतीक है। जब छठे गुरु, गुरु हरगोविंद साहिब जी ने ग्वालियर के किले से 52 हिंदू राजाओं को मुग़ल कैद से छुड़ाकर श्री हरमंदिर साहिब (अमृतसर) की पवित्र भूमि पर कदम रखा, तो संगतों ने दीपमाला कर ‘बंदी छोड़ दिवस’ मनाया।
- नवजागरण के संवाहक:
आधुनिक भारत में अंधविश्वास और कुरीतियों के विरुद्ध शंखनाद करने वाले महर्षि दयानंद सरस्वती और युवाओं को अध्यात्म का नया क्षितिज देने वाले स्वामी रामतीर्थ—दोनों ने अपने नश्वर शरीर को त्यागकर इसी दिन महासमाधि ली थी।
लाल किले का ‘जश्न-ए-चिरागां’ : हमारी साझी तहज़ीब
मुग़ल दौर में दीपोत्सव मजहबी सीमाओं को लांघकर हिंदुस्तान की साझी तहज़ीब का आईना बन गया। अबुल फज़ल ने ‘आईन-ए-अकबरी’ में लिखा है कि बादशाह अकबर दीवाली की शाम महल के सामने 40 गज ऊंचे मजबूत बांस पर एक विशाल ‘आकाशदीप’ टंगवाते थे, जो कई मील दूर से चमकता था।
जहांगीर, शाह आलम और अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के समय लाल किले में इसे आधिकारिक रूप से ‘जश्न-ए-चिरागां’ (दीपों का उत्सव) कहा जाता था। यमुना किनारे स्थित इस किले की प्राचीरें हजारों दीयों और कंदीलों से जगमगाती थीं, शाही नौबतखाने से शहनाइयां बजती थीं, और मुग़ल बेगमें हिंदू रानियों के साथ मिलकर महलों में दीये रखती थीं। रोशनी ने कभी किसी की इबादतगाह का पता नहीं पूछा।
यह सांस्कृतिक चेतना भारत की सीमाओं तक भी सीमित नहीं रही। इंडोनेशिया के 9वीं सदी के प्रम्बानान मंदिर के पत्थरों पर उकेरी रामायण हो, थाईलैंड का ‘रामाकिएन’ और दीप-पर्व ‘लोय क्राथॉन्ग’ हो, या कंबोडिया का ‘रामकेर’ – यह दीपोत्सव बताता है कि अंधेरे पर उजाले की विजय की मानवीय ललक पूरे एशिया के दिल में एक समान धड़कती रही है।
‘धन’ के उन्माद से ‘धान्य’ के कल्याण तक
आज जब हमारा यह पावन पर्व हजारों करोड़ के कॉर्पोरेट बाज़ार, प्लास्टिक के दिखावटी कबाड़, स्टेटस सिंबल और जहरीले धुएं के दमघोंटू जाल में उलझता जा रहा है, तब हमें इसके मूल मर्म की ओर लौटना होगा।
प्राचीन भारतीय मनीषा ने जिस लक्ष्मी की आराधना की थी, वह तिजोरियों में बंद बेजान ‘धनलक्ष्मी’ नहीं, बल्कि खेतों में लहलहाती, हर पेट को भरने वाली ‘धान्यलक्ष्मी’ थीं। वह श्रम का सम्मान थीं।
संस्कृत का एक कालजयी श्लोक कहता है:
दीपहर्ता भवेद्बन्ध्या तमोगति असुप्रभः।
दीपप्रद स्वर्गलोके दीपमालि विराजते॥
(अर्थात: जो दूसरों के जीवन से उजाला छीनता है, वह घोर अंधकार में भटकता है; और जो दूसरों की अंधेरी राहों में रोशनी भरता है, वही अमरत्व और दिव्यता को प्राप्त होता है।)
दीपावली का असली अर्थ किसी कुम्हार के चाक पर घूमती मिट्टी के दीये को खरीदकर, उसकी कुटिया में भी दो जून की रोटी का प्रबंध करने में है। जब तक समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के घर में चूल्हा और दीया दोनों एक साथ न जलें, तब तक रोशनी का कोई भी उत्सव सम्पूर्ण नहीं हो सकता।
इस बार जब अपनी मुंडेरों पर दीये रखें, तो तेल और बाती के साथ मन में जमे अविश्वास, नफ़रत, संकीर्णता और निराशा के अंधेरे को भी होम कर दें। मिट्टी के उस नन्हे दीये की विनम्र लौ से बड़ा कोई साम्राज्य नहीं, जो खुद जलकर पूरी दुनिया को भरोसा दिलाता है कि रात चाहे कितनी भी घनी क्यों न हो, वह सुबह को रोक नहीं सकती।
उमेश कुमार साहू