राजनीति

अंग्रेजो के जमाने की मुस्लिम लीग बनाम स्वतंत्र भारत की मुस्लिम लीग

वीरेन्द्र सिंह परिहार

          इन दिनों बंदे बंकिम चंद्र चट्टोपध्याय द्वारा रचित राष्ट्र गीत ‘वंदेमातरम्’ पूरे देश के माहौल को गर्म किये हुये है। यह स्थिति तब आ रही है, जब देश की संसद में पारित होकर यह कानून बन गया है कि वंदेमातरम् को पूरा गाया जायेगा. यदि उसे आधा-अधूरा गाया गया तो यह अपराध की श्रेणी में माना जायेगा। यद्यपि जब 26 फरवरी 2026 को संसद से यह कानून पारित हुआ तो इसे लेकर कांग्रेस समेत विपक्ष ने विरोध में कोई हो हल्ला नहीं मचाया। इससे ऐसा लगा कि चूँकि यह राष्ट्रभक्ति से जुड़ा मामला है और संसद से पारित होकर कानून बना है। इसलिये यह विपक्ष की वोट-बैंक की राजनीति के अनुकूल भले न हो पर बेमन से ही सही विपक्ष इसे मानने को तैयार है।

          पर इस सम्बन्ध में असलियत 15 अगस्त को सामने आ गई जब कांग्रेस मुख्यालय नई दिल्ली में वंदे मातरम के दो पद गाने के बाद श्रीमती सोनिया गांधी असहज हो गई और वह आगे गाने से रोकने के लिये हाथों से इशारे करने लगीं यद्यपि पहले इसे छुपाने का प्रयास किया गया। कहा गया कि वह कांग्रेसाध्यक्ष खड़गे के लिये कुर्सी लाने का इशारा कर रही थीं पर कुछ ही दिनों में पूरी सच्चाई तब सामने आ गई, जब पूरी कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने प्रस्ताव पारित करके कह दिया कि वह पूर्व से निर्धारित दो पदों (छंदो) को ही गायेंगी। उसका तर्क है कि दो पद गाने के लिये ही वर्ष 1937 में महात्मा गांधी सुभाषचन्द्र बोस, सरदार पटेल और पण्डित नेहरू ने तय किया था और चूँकि इन महान नेताओं ने ऐसा तय किया था तो कांग्रेस पार्टी उसी रास्ते पर चलेगी।

कांग्रेस पार्टी के कुछ मुस्लिम नेताओं जैसे इमरान मसूद ने तो यहाँ तक कह दिया कि वह वंदे मातरम को किसी भी रूप में नहीं गायेंगे। अब दूसरी तरफ जो ‘वंदेमातरम’ को पूरी तरह गाए जाने के पक्षधर हैं- खास तौर पर संसद द्वारा कानून बना दिये जाने के बाद उनका कहना है कि 1892 से लेकर 1927 तक कांग्रेस के अधिवेशनों में वंदेमातरम् पूरा ही गाया जाता था, उसमें कोई कांट-छांट नहीं होती थी। यहाँ तक कि उस दौर में कांग्रेस पार्टी के चार अध्यक्ष मुस्लिम बने और उनके दौर में भी कांग्रेस पार्टी के सम्मेलनों में पूरा वंदेमातरम् ही गाया जाता रहा। समस्या तब उत्पन्न हुई जब वर्ष 1937 में मोहम्मद अली जिन्ना ने इसका विरोध करना शुरू कर दिया कि इसमें देवी की स्तुति है, जो इस्लामिक प्रथाओं और मूल्यों के खिलाफ है यद्यपि इस पर भी तब पण्डित नेहरू ने इसे साम्प्रदायिक सोच बताया था। सुभाष चन्द्र बोस ने तो साथ शब्दों में कहा था कि कुछ मुसलमान अलगाववाद प्रवृत्ति के हैं और वह कोई-न-कोई ऐसा विभाजनकारी मुद्दा उठाते ही रहते हैं, कभी ‘वंदेमातरम्’ को लेकर तो कभी मुस्लिमों की ज्यादा सरकारी नौकरियों को लेकर लेकिन आखिरकार मुस्लिम लीग के दबाव के चलते अक्टूबर 1937 में कांग्रेस पार्टी ने ‘वंदेमातरम्’ के दो ही पद गाना स्वीकार कर लिया। शायद कांग्रेस पार्टी को उस वक्त ऐसा लगा हो कि इस तरह से वह तुष्टिकरण कर मुस्लिम लीग को अपने साथ रख सकेगी और उसे विभाजनवादी रास्ते से विरत कर सकेगी लेकिन आगे की सच्चाई सभी को पता है। मुस्लिम लीग और जिन्ना पर इसका कोई सकारात्मक असर पड़ना तो दूर बल्कि आग में घी का काम किया। मुस्लिम लीग और जिन्ना साफ-साफ यह कहने लगे कि हिन्दू और मुसलमान दो अलग-अलग जातियाँ हैं, जिनकी राष्ट्रीयता बिल्कुल अलग-अलग है, इसलिये देश का विभाजन हिन्दू भारत और मुस्लिम पाकिस्तान के मध्य होना चाहिए और आगे चलकर ऐसा हुआ भी। क्या इससे इस बात में दम नहीं कि कांग्रेस पार्टी द्वारा 1937 में वंदे मातरम के दो टुकड़े करने का अंजाम देश के दो टुकड़े बतौर हुआ।

          अब जो लोग महात्मा गांधी की दुहाई देकर यह कह रहे हैं कि ‘वंदेमातरम्’ के दो पद गाने की सहमति महात्मा गांधी ने दी थी तो क्या वह यह बतायेंगे कि महात्मा गांधी तो देश की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस पार्टी का विसर्जन कर उसे लोक सेवक संघ बनाना चाहते थे, फिर इस मामले में कांग्रेस पार्टी ने महात्मा गांधी की इच्छा का सम्मान क्यों नहीं किया ? संविधान निर्माताओं ने तय किया था कि आरक्षण मात्र दस वर्ष के लिये लागू होगा, फिर वह अभी तक लागू कैसे है ? सबसे बड़ी बात कि उसमें यदि किसी समीक्षा या चर्चा की बात की जाती है, तो उसमें भी हंगामा मनाया जाता है। गांधी जी तो स्वदेशी और ग्राम स्वराज के पक्षधर थे, फिर देश में भारी उद्योगो और पश्चिमीकरण को प्राथमिकता क्यों ?

          एक बार ऐसा भी माना जा सकता है कि देश की पराधीनता के समक्ष जो परिस्थितियाँ थीं, उसमें ‘वंदेमातरम्’ को लेकर समझौता करना पड़ा पर जब मुस्लिम लीग और जिन्ना पाकिस्तान लेकर चले गये तो अब कांग्रेस पार्टी के सामने ऐसी कौन-सी मजबूरी है। वस्तुतः कांग्रेस पार्टी के एजेन्डे में देश नहीं मात्र येन-केन-प्रकारेण सत्ता है और इस दृष्टि से उसका ध्यान सदैव मुसलमानों के थोक वोट पर रहता है। यूपीए सरकार के दौर में मनमोहन सिंह ने कहा था- ‘संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यकों का है’ यानी मुसलमानों का है। सोनिया गांधी की दुष्टि में मुस्लिम वोट धर्मनिरपेक्ष वोट है। राहुल गांधी भी कांग्रेस पार्टी को मुसलमानों की पार्टी बता चुके हैं। यह इससे भी समझा जा सकता है कि असम जैसे राज्य में कांग्रेस पार्टी के 19 में 18 विधायक मुसलमान हैं।

          यह सब बाते तो हैं ही, सबसे बड़ी बात यह कि यह संसद द्वारा बनाया गया कानून है। तो क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी जो आये दिन संविधान की दुहाई देते हैं, संविधान की किताब लेकर घूमते हैं, वह निरा दिखावा है क्या ? अगर कांग्रेस पार्टी इस कानून को गलत मानती है तो आखिरकार उसने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती क्यों नहीं दी ? कुल मिलाकर यही कहा जा सकता है कि कमोबेश कांग्रेस पार्टी स्वतंत्र भारत में मुस्लिम लीग की भूमिका निभा रही है। बड़ा सवाल यह कि क्या कांग्रेस कार्यसमिति का प्रस्ताव देश की संसद के बनाये गये कानून से ऊपर हो सकता है ? सबसे बड़ी बात यह कि 2014 में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद राष्ट्र अपनी अस्मिता ही नहीं तलाश रहा, बल्कि उस दिशा में तेजी से भी कार्य कर रहा है।

जहाँ तक ‘वंदेमातरम्’ में धार्मिक प्रतीको या देवियों के उल्लेख का सवाल है, तो भारत को उसकी परम्पराओं और संस्कृति से काट कर कैसे देखा जा सकता है ? आखिर में बंगाल के क्रान्तिकारी कवि नजरूल इस्लाम ने भी हिन्दू प्रतीको और अख्यानों का उपयोग किया है, पर वह किसी भी स्तर पर इस्लाम विरोधी नहीं माने गये। लोगो को यह पता होना चाहिए कि तबकी यूपीए की चेयर पर्सन सोनिया गांधी ने 7 सितम्बर 2006 को इस राष्ट्रगीत के सताब्दी समारोह में भाग नहीं लिया था। स्पष्ट है कि इनकी प्रतिबद्धता राष्ट्र के प्रति नहीं, बल्कि तुष्टिकरण एवं वोट बैंक में है।