समाज

संस्कार विहीनता के बोझ तले किशोर पीढ़ी

डा. विनोद बब्बर 

मोबाइल फोन को लेकर पिता से हुए मामूली विवाद के कारण महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर के 18 वर्षीय छात्र कुणाल के  पहाड़ी पर पहुंचने और उसे बचाने की कोशिश में तीनों की असमय मृत्यु का समाचार अत्यंत कष्टकारी है। कुणाल करीब तीन घंटे तक पहाड़ की चोटी के बिल्कुल किनारे पर खड़ा रहा। मां रो-रोकर उसकी मिन्नतें करती रही तो पुलिसकर्मी ने भी उसे लगातार उसे समझने का प्रयास किया। गांव के लोगों की उपस्थिति में सरपंच ने उसे नया आईफोन दिलाने का वचन दिया पर उस हठी ने उनके शब्दों का भी सम्मान नहीं दिया। इसी बीच पिता किसी तरीके से उसके पास तक पहुंच गए और उसे पकड़ने की कोशिश में दोनों का संतुलन बिगड़ गया। पिता-पुत्र को गहरी खाई में गिरता देख मां भी पहाड़ी से नीचे गिर गई।

आखिर क्या हो गया है आज के युवा को? वह इतना हठी और उदंड कैसे हो गया? दिनभर मेहनत करके अपने बच्चे के लिए सब कुछ जुटाने का प्रयास करने वाले पिता की विवशता उसे समझ क्यों नहीं आती? बिना जरूरत, मित्रों के बीच अपना प्रभाव दिखाने के लिए महंगे गैजेट्स या मोबाइल के लिए इतना पागलपन क्यों? आखिर क्यों आज के बच्चों की भाषा और व्यवहार असामान्य हो रही है? 

यह सत्य है कि आज के बच्चों में बहुत ऊर्जा है परंतु उस ऊर्जा को सकारात्मक दिशा देने का दायित्व किसका? ये बच्चें हमारा भविष्य है। कल वे इस राष्ट्र के कर्णधार बनेगे इसलिए उन्हें केवल भौतिक संसाधन उपलब्ध करा अपने कर्तव्य की इतिश्री मानने वाली मानसिकता भी ठीक नहीं। उन्हें बाल काल से ही संस्कारित अनुशासित श्रमशील बनाने का दायित्व भ परिवार और समाज का है।

आज विज्ञापन के दौर मे अनावश्यक रूप से भौतिक वस्तुओं की आवश्यकता उत्पन्न की जा रही है। बार-बार सामने आने वाले विज्ञापन मन में भ्रम उत्पन्न कर नकली मांग पैदा करते है तो दूसरी ओर परिवार की अभेद्य सुरक्षा और अगली पीढी के लिए श्रेष्ठ संस्कार सुनिश्चित करने वाली संयुक्त परिवार परंपरा को बोझ, गुलामी बताने वाली फिल्मों और दूरदर्शन धारावाहिकों की बाढ़ आई हुई है। दादा-दादी, नाना-नानी से नाता टूटने का अर्थ है, अनुभव सिद्धार्थ जीवन जीने की कला, संस्कार और परम्परा से वंचित हो आत्मकेंद्रित, हठी, स्वच्छंद पीढ़ी ही है। यह गलतफहमी है कि किसी भी तरीके से कमाए धन से आधुनिकतम  मोबाइल, महंगी गाड़ियां, हवा की गति से दौड़ने नहीं, उड़ने वाली बाइक या ब्रांडेड कपड़े आदि बच्चों के जीवन में श्रद्धा और संस्कार की रिक्तता को दूर कर सकते हैं। आज के नए वातावरण में पले  किसी बच्चे को किसी गलती के लिए टोकने का अर्थ, हितैषी होने की बजाय शत्रु होने लगा है। एक पुरानी कहावत है, ‘अगर समय पर भोजन नहीं मिले तो भी बच्चा पल जाता है परंतु समय पर संस्कार न मिले तो बच्चा जीवन भर भटकन का शिकार हो आत्महंता भी हो सकता हैं।’

यह सत्य है कि संसाधनों का प्रभाव होता है लेकिन संस्कारों के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता। पिछली पीढ़ी ने न्यूनतम संसाधनों के बावजूद उच्चतम शिखरों को स्पर्श किया क्योंकि उनके पास श्रद्धा, संवेदना, सहयोग, संवाद की शक्ति थी। धैर्य, अनुशासन, श्रमशीलता, श्रद्धा से प्रत्यक्ष साक्षात्कार की स्थायी छाप था लेकिन आज….  आज हमने अपने भविष्य के भाग्य विधाताओं को संभावित चुनौतियों के लिए तैयार करने का दायित्व अनियंत्रित यंत्रों को सौंप दिया है। 

परिवार के बाद बच्चे पर सर्वाधिक प्रभाव शिक्षक का हो सकता है पर उसकी वर्तमान दशा किसी से भूली नहीं है। गलती करने पर दंड तो दूर, वह डांट भी नहीं सकता। वोट बनाने, उनकी जांच करने से मतदान की लंबी प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलने वाला शिक्षक लोकतंत्र की गाड़ी को ढो रहा है परन्तु उसे भविष्य निर्माण के उसके वास्तविक दायित्व से अधिकतम दूर रखा जा रहा है। जब उसे शिक्षा देने का दायित्व ही ठीक से नहीं निभाने दिया जा रहा तो वह संस्कार भी दे तो आखिर कैसे?

क्या यह सही नहीं कि ममता, स्नेह, प्रेम’ वात्सल्य की तरह हमारे मन के किसी कोने में नकारात्मक ऊर्जा भी हो सकती है। प्रकृति के सान्निध, खेल कूद और बच्चों के आपसी विवाद जिन्हें स्वयं सहायता से सुलझा लेते है, भी भूमिका होती है। लेकिन आज ‘हम दो-हमारा एक’ के बाद ‘डिंक’ DINK (Double income No kid) के नारे की तरफ बढ़ रहे हैं। माता-पिता दोनों कामकाजी हैं तो अकेले बच्चें हठी होकर  तोड़फोड़ और अशिष्ट भाषी हो सकते है। 

कुणाल नामकरण करते हुए माता-पिता ने कुणाल नामक सुंदर नेत्रों वाले पक्षी के बारे में शायद न जाना हो परंतु उसके संस्कृत अर्थ ‘हर वस्तु में सुंदरता देखने वाला’ को अवश्य जाना होगा। परंतु हमारे आज के कुणाल माता-पिता की भावनाओं को समझने के लिए तैयार नहीं तो वे इस संसार में चहुं ओर व्याप्त सुंदरता को आखिर क्यों नहीं देख पा रहे हैं? श्रीकृष्ण जन्माष्टमी दस्तक दे रही है इसलिए प्रत्येक सनातनी को विचार करना चाहिए – नटखट नंद लाल का भारत आखिर कहां जा रहा है?