राजनीति

भागवत की नजरों में जेन-जी आंदोलन का दृष्टिकोण

-ः ललित गर्ग:-

जंतर-मंतर से उठी हाल की युवा आवाजों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई नए प्रश्न खड़े किए हैं। आंदोलन को लेकर समाज में दो मत हो सकते हैं, आंदोलन की शैली, नेतृत्व और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर भी बहस हो सकती है, लेकिन एक बुनियादी सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति व्यक्त करने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने का अधिकार है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का युवाओं और विशेषकर जेन-जी को लेकर दिया गया दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि नई पीढ़ी सवाल करती है, तर्कसंगत उत्तर चाहती है, उसे केवल आदेश देकर नहीं समझाया जा सकता। उनके अनुसार आज जरूरत ‘डिक्टेशन’ की नहीं, ‘डिस्कशन’ की और आदेश की नहीं, सहमति की है। भागवत ने हाल में इससे भी आगे बढ़कर कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन संवाद का एक वैध माध्यम है और जेन-जी के आंदोलन में उठाई गई शिकायतें जायज हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध करने वालों को राष्ट्रविरोधी कह देना उचित नहीं है। उनका मानना है कि आंदोलन का उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि सहमति और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत और छात्रों की नाराजगी के बीच संबंध की ओर भी उन्होंने संकेत किया।
भागवत के इस दृष्टिकोण की सराहना इसलिए भी की जानी चाहिए कि यह केवल किसी एक आंदोलन या किसी एक सरकार का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की उस मूल आत्मा को स्पर्श करता है, जिसमें सत्ता जनता से शक्ति प्राप्त करती है और जनता की आवाज सुनना उसकी संवैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है। विरोध को हमेशा विद्रोह मान लेना लोकतंत्र की समझ को संकुचित करना है। असहमति को राष्ट्रविरोध समझना उससे भी बड़ी भूल है। राष्ट्र सरकार से बड़ा है और लोकतंत्र सत्ता से बड़ा। जो नागरिक देश के भविष्य को लेकर सवाल करता है, वह जरूरी नहीं कि देश का विरोध कर रहा हो, कई बार वह देश को बेहतर बनाने की बेचैनी व्यक्त कर रहा होता है। आजादी की वर्षगांठ के अवसर पर जब हम स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों का उत्सव मनाते हैं, तब हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमारी आजादी का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या आजादी केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने तक सीमित है? या इसका अर्थ यह भी है कि देश का युवा अपने भविष्य को लेकर सवाल कर सके, व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित कर सके और अपनी बात बिना भय के रख सके? यदि हम सचमुच विकसित भारत, समृद्ध भारत और शक्तिशाली भारत का सपना देखते हैं तो हमें भारत के युवाओं के सपनों को सुनना ही होगा।
भारत के महान चिंतकों ने युवाशक्ति को राष्ट्रनिर्माण का आधार माना है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को जागने, अपनी शक्ति पहचानने और लक्ष्य की ओर बढ़ने का आह्वान किया था। उनके चिंतन का मूल संदेश यही था कि युवा केवल राष्ट्र का भविष्य नहीं, वर्तमान की सक्रिय शक्ति भी हैं। महात्मा गांधी का विश्वास था कि परिवर्तन केवल सत्ता के गलियारों से नहीं आता, वह जागरूक नागरिकों की चेतना से आता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने बार-बार युवाओं के सपनों को भारत के भविष्य से जोड़ा। उनके लिए सपना वह नहीं था जो सोते समय दिखाई देता है, बल्कि वह था जो व्यक्ति को सोने नहीं देता। आज के युवाओं की बेचैनी को इसी दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। नई पीढ़ी और पिछली पीढ़ी के बीच अंतर स्वाभाविक है। पहले परिवार, विद्यालय और समाज में ‘क्यों’ पूछने की गुंजाइश कम थी, बड़े जो कहते थे, उसे मान लेना संस्कार समझा जाता था। आज का युवा प्रश्न करता है-क्यों, कैसे और किसलिए? वह केवल परंपरा के नाम पर किसी बात को स्वीकार नहीं करता। वह प्रमाण चाहता है, तर्क चाहता है और परिणाम देखना चाहता है। यह बदलाव चुनौती भी है और अवसर भी। यदि हम इस प्रश्नाकुलता को दबाएंगे तो कुंठा पैदा होगी, यदि इसे सही दिशा देंगे तो यही प्रश्न नवाचार, अनुसंधान और राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बनेंगे।
विचारों के टकराव से घबराने की जरूरत नहीं है। भारतीय संस्कृति स्वयं ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’ की संवाद परंपरा से विकसित हुई है। उपनिषदों में प्रश्न हैं, उत्तर हैं, पुनः प्रश्न हैं। भगवान महावीर की अनेकांत दृष्टि हमें सिखाती है कि सत्य को एकांगी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। एक ही विषय के अनेक पक्ष हो सकते हैं। इसलिए बहस लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी बौद्धिक ताकत है। समस्या बहस में नहीं, बहस के हिंसक हो जाने में है, समस्या असहमति में नहीं, असहमति के नाम पर अराजकता में है। इसीलिए भागवत की बात का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है-विरोध संविधान की मर्यादा में हो, शांतिपूर्ण हो और उसका लक्ष्य व्यक्ति को अपमानित करना नहीं, व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाना हो। आंदोलन लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन लोकतांत्रिक अनुशासन के साथ। सरकार की आलोचना लोकतंत्र है, हिंसा लोकतंत्र नहीं। प्रश्न करना स्वतंत्रता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना स्वतंत्रता नहीं। इसलिए सरकार और आंदोलनकारी-दोनों की जिम्मेदारियां हैं। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी अधिक बड़ी है, क्योंकि उसके पास सत्ता, प्रशासन और संस्थागत शक्ति होती है। किसी छात्र की आवाज को लाठी से दबाया जा सकता है, लेकिन उसकी आशंका को लाठी से समाप्त नहीं किया जा सकता। किसी आंदोलनकारी को राष्ट्रविरोधी कह देने से उसका प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता। यदि उसकी मांग गलत है तो तथ्य और तर्क से उसे गलत सिद्ध किया जाए। यदि मांग सही है तो उसे स्वीकार करने में संकोच क्यों? लोकतंत्र में सरकार का सबसे प्रभावी हथियार पुलिस नहीं, संवाद है।
यहां मोहन भागवत की भूमिका एक मार्गदर्शक की तरह दिखाई देती है। उन्होंने अनेक अवसरों पर केवल प्रशंसा करने के बजाय व्यापक सामाजिक हित के प्रश्न उठाए हैं। जब सत्ता या व्यवस्था किसी दिशा में आवश्यकता से अधिक आगे बढ़ती दिखाई देती है, तब एक जिम्मेदार मार्गदर्शक का दायित्व होता है कि वह उसे आत्ममंथन की ओर ले जाए। भागवत की यह भूमिका हमें महाभारत के भीष्म पितामह की याद दिलाती है-ऐसे व्यक्ति की, जो सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी समय-समय पर धर्म, मर्यादा और व्यापक हित की याद दिलाता है। यह तुलना व्यक्ति-पूजा के लिए नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका की व्याख्या के लिए है। सरकारें जब जनता की आवाज समय पर सुनती हैं तो आंदोलन समस्या बनने से पहले समाधान बन सकता है। लेकिन जब शिकायतें महीनों और वर्षों तक फाइलों में पड़ी रहती हैं, जब संवाद के रास्ते बंद होते जाते हैं और जब नागरिक को लगता है कि उसकी सुनवाई नहीं होगी, तब असंतोष सड़क पर आता है। फिर वही आंदोलन राजनीतिक दलों, अवसरवादी तत्वों और निहित स्वार्थों के लिए मैदान बन जाता है। परिणामतः मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और आंदोलन का चरित्र बदलने लगता है। यही वह स्थिति है जिससे लोकतंत्र को बचाना है।
नीट और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों ने भी यही संदेश दिया है कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में सरकार और संस्थाओं को असाधारण संवेदनशीलता दिखानी होगी। परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होती, वह लाखों परिवारों के वर्षों के परिश्रम, सपनों और आर्थिक-सामाजिक आकांक्षाओं से जुड़ी होती है। यदि किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसकी मेहनत निष्पक्ष व्यवस्था में नहीं आंकी गई, तो उसका आक्रोश स्वाभाविक है। हाल के छात्र आंदोलनों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। इस संदर्भ में पुलिस की भूमिका भी पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। हर प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं होता और हर नारा राष्ट्रविरोधी नहीं होता। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का प्रशिक्षण भी मिलना चाहिए। राष्ट्रविरोधी गतिविधि और जायज नागरिक असहमति के बीच अंतर करना लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था की पहली कसौटी है। इसलिए मोहन भागवत की बात को केवल जेन-जी आंदोलन के संदर्भ में देखने की बजाय उसे भारत की लोकतांत्रिक यात्रा के व्यापक संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकारें आएंगी-जाएंगी, राजनीतिक दल बदलेंगे, आंदोलनों के स्वरूप बदलेंगे, लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता नहीं बदलेगी, जनता को सुनना होगा।