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चेतना की भौतिकी और वेदांत का आकाश : टेस्ला, विवेकानंद और सनातन दृष्टि

Swami Vivekananda and Nikola Tesla
  • डॉ विभा नायक

उन्नीसवीं सदी का अंतिम दशक वैश्विक बौद्धिक इतिहास में एक संधिकाल था। एक तरफ यूरोप और अमरीका अपनी औद्योगिक क्रांति, यांत्रिक आविष्कारों और घोर पदार्थवादी प्रगति के मद में चूर थे, वहीं दूसरी तरफ पश्चिम का प्रबुद्ध समाज एक गहरे आत्मिक और वैचारिक संकट से गुजर रहा था। विज्ञान ने औद्योगिक प्रगति तो दी थी, लेकिन उसने जीवन के अर्थ को केवल हाड़-मांस के पुतले और रसायनों की प्रतिक्रिया तक सीमित कर दिया था। ठीक इसी समय, भारत की ज्ञान-भूमि से उठकर स्वामी विवेकानंद वैश्विक पटल पर अवतरित हुए। स्वामी जी ने पश्चिम के तार्किक और खोजी मस्तिष्क को यह सोचने पर विवश किया कि जिस सत्य की खोज वे अपनी बाह्य प्रयोगशालाओं में कर रहे हैं, उसे भारत के द्रष्टा ऋषियों ने हजारों वर्ष पहले अपनी चेतना की अंतःप्रयोगशाला में अनुभूत और संहिताबद्ध कर लिया था। इस वैचारिक महासंगम का सबसे प्रामाणिक, ऐतिहासिक और विस्मयकारी दस्तावेज आधुनिक युग के सबसे महान, रहस्यमयी और दूर द्रष्टा वैज्ञानिक निकोला टेस्ला और स्वामी विवेकानंद के बीच हुए संवादों में सुरक्षित है। यह मिलन मात्र दो असाधारण युग-पुरुषों की शिष्टाचार भेंट नहीं था बल्कि यह पश्चिम की प्रयोगधर्मी, गणितीय भौतिकी और भारत की अमूर्त, अतीन्द्रिय, चैतन्य-खोज के बीच हुआ एक ऐसा महासंवाद था जिसने आधुनिक विज्ञान की भावी दिशा को अदृश्य रूप से प्रभावित किया।

​निकोला टेस्ला अपने युग के अन्य सभी वैज्ञानिकों से बुनियादी तौर पर भिन्न थे। थॉमस एडिसन जैसे उनके समकालीन आविष्कारक जहाँ मुख्य रूप से व्यावहारिक, व्यावसायिक और बाजार-केंद्रित आविष्कारों में लगे थे, वहीं टेस्ला की रुचि ब्रह्मांड के रहस्यों, ऊर्जा के अंतर्निहित स्रोतों और प्रकृति के अदृश्य नियमों को डिकोड करने में थी। वे अल्टरनेटिंग करंट (AC), वायरलेस कम्युनिकेशन और टेस्ला कॉइल जैसे आविष्कारों के माध्यम से भौतिक जगत को बदल ही चुके थे, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य एक ऐसे सिद्धांत को खोजना था जो यह प्रमाणित कर सके कि जिसे हम ‘खाली स्थान’ शून्य या वैक्यूम समझते हैं, वह वास्तव में मृत या निष्क्रिय नहीं है, बल्कि अनंत ऊर्जा का एक महासागर है। वे एक ऐसे गणितीय और भौतिक सूत्र की तलाश में थे जो पदार्थ और ऊर्जा के शाश्वत संबंध को पूरी तरह अभिव्यक्त कर सके। इसी छटपटाहट के बीच, न्यूयॉर्क में उनकी मुलाकात स्वामी विवेकानंद से हुई। स्वामी जी ने जब टेस्ला के सामने सांख्य और वेदांत दर्शन के ‘आकाश’ और ‘प्राण’ के सिद्धांतों को रखा, तो टेस्ला को ऐसा लगा मानो उन्हें अपनी अधूरी वैज्ञानिक पहेली का सबसे महत्वपूर्ण वैचारिक टुकड़ा मिल गया हो।

​वेदांत की शब्दावली में ‘आकाश’ वह परम, सर्वव्यापी और अमूर्त तत्व है जिससे ब्रह्मांड के सभी दृश्य और अदृश्य पदार्थ निर्मित होते हैं, और ‘प्राण’ वह शक्ति या भौगोलिक ऊर्जा है जो इस आकाश को स्पंदित करती है, उसे विभिन्न रूपों में रूपांतरित करती है और संपूर्ण सृष्टि को क्रियाशील रखती है। टेस्ला इस बात को सुनकर स्तब्ध रह गए कि आधुनिक भौतिकी जिस द्वैत को सुलझाने में लगी है, भारत के दर्शन ने उसे एक ही परम सत्य के दो रूपों में कब का स्वीकार कर लिया है। टेस्ला ने यह गहराई से महसूस किया कि जिसे वे अपनी प्रयोगशाला के तारों, कॉइल्स और उच्च-आवृत्ति के चुम्बकीय क्षेत्रों में पकड़ने की कोशिश कर रहे थे, वह वेदांत का प्राण ही था। उन्होंने स्वामी जी के सामने यह स्वीकार किया कि वेदांत की यह ऊर्जा-शब्दावली इतनी सटीक और वैज्ञानिक है कि इसके माध्यम से आधुनिक भौतिकी के सिद्धांतों को कहीं अधिक स्पष्टता से समझा जा सकता है। स्वामी विवेकानंद ने स्वयं 13 फरवरी 1896 को अपने एक ऐतिहासिक पत्र में इस बात का प्रामाणिक साक्ष्य छोड़ा है (The Complete Works of Swami Vivekananda, Volume 5, Epistles – First Series)। स्वामी जी ने लिखा था कि मिस्टर टेस्ला वेदांत के प्राण, आकाश और कल्प के सिद्धांतों को सुनकर मंत्रमुग्ध हैं और उन्हें लगता है कि वे इन अमूर्त विचारों को आधुनिक विज्ञान के गणितीय समीकरणों और द्रव्यमान-ऊर्जा के संबंधों के माध्यम से भौतिक रूप से सिद्ध कर सकते हैं।

यद्यपि टेस्ला अपने जीवनकाल में उस गणितीय सूत्र को पूरी तरह दुनिया के सामने प्रकाशित नहीं कर सके, लेकिन उनके बाद के शोधों और लेखों में वेदांत की इस वैचारिक गूँज को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है (Nikola Tesla, “Man’s Greatest Achievement”, 1908), जो बाद में चलकर अल्बर्ट आइंस्टीन के द्रव्यमान-ऊर्जा समतुल्यता सिद्धांत में भी प्रतिध्वनित हुई।​

इस संवाद की गहराई को समझने के लिए हमें पश्चिम के उस वैचारिक संकट को समझना होगा जिससे स्वामी विवेकानंद ने उन्हें उबारा था। पश्चिम का विज्ञान सदियों से एक आत्मघाती अंतर्विरोध के साए में जी रहा था। यूरोप का धार्मिक इतिहास विज्ञान-विरोधी रहा था, जहाँ कोपरनिकस और गैलीलियो जैसे वैज्ञानिकों को केवल सत्य बोलने और प्रश्न करने के कारण चर्च के कोप का भाजन बनना पड़ा था। इस हिंसक टकराव का परिणाम यह हुआ कि जब पश्चिम में वैज्ञानिक चेतना का उदय हुआ, तो उसने धर्म, अध्यात्म और चेतना को पूरी तरह से खारिज कर दिया। पश्चिम ने ‘अनुभववाद’ (Empiricism) को अपना परम आदर्श बनाया, जिसका अर्थ था कि जो कुछ हमारी पंच-इंद्रियों से अनुभूत है, जिसे मापा जा सकता है और जिसका प्रयोगशाला में परीक्षण हो सकता है, केवल वही सत्य है। इसके अतिरिक्त जो कुछ भी है, वह अंधविश्वास या कोरी कल्पना है। विज्ञान की इस संकीर्ण परिभाषा ने मनुष्य को एक मशीन और ब्रह्मांड को पुर्जों का एक ढेर बना दिया था।

जब स्वामी विवेकानंद ने पश्चिम की धरती पर कदम रखा, तो उन्होंने धर्म की एक ऐसी परिभाषा दी, जिसने वहाँ के प्रबुद्ध और वैज्ञानिक वर्ग को हिलाकर रख दिया। स्वामी जी ने घोषणा की कि धर्म कोई संकीर्ण मत, विश्वास या रूढ़िवादी कर्मकांड नहीं है, बल्कि वह चेतना का सर्वोच्च विज्ञान है। उन्होंने तर्क दिया कि जैसे भौतिक विज्ञान बाह्य जगत का अध्ययन करता है, वैसे ही अध्यात्म अंतर्जगत का प्रामाणिक और प्रायोगिक अध्ययन है। उन्होंने पश्चिम को सिखाया कि सत्य केवल वह नहीं है जो सूक्ष्मदर्शी या दूरदर्शी से दिखाई दे, क्योंकि उन यंत्रों के पीछे देखने वाला जो द्रष्टा है, उसकी चेतना या अनुभूति के बिना किसी भी प्रयोग का कोई मूल्य नहीं है। इस विचार ने पश्चिम के बौद्धिक जगत को एक नया दृष्टिकोण दिया और उन्हें यह समझ आया कि भारत का वेदांत दर्शन संसार से पलायन का कोई रहस्यमयी मार्ग नहीं, बल्कि ब्रह्मांड को उसकी समग्रता और वैज्ञानिकता में समझने का सबसे आधुनिक और तार्किक राजमार्ग है।​अक्सर जब भारतीय संस्कृति की वैज्ञानिकता की बात आती है, तो बहुत से लोग एक बड़ी भूल कर बैठते हैं। वे इंटरनेट पर तैरने वाले घिसे-पिटे, अप्रामाणिक दावों या प्राचीन आविष्कारों की एक ऐसी यांत्रिक सूची गिनाने लगते हैं जिसकी प्रामाणिकता पर आधुनिक शोध उंगली उठा सकते हैं। ऐसी सतही कोशिशें न केवल अकादमिक रूप से कमजोर होती हैं, बल्कि वे बौद्धिक चोरी या अतिशयोक्ति के दायरे में आ जाती हैं। सनातन संस्कृति की वास्तविक वैज्ञानिकता और उसकी कालजयी आधुनिकता किसी काल-विशेष में किए गए भौतिक आविष्कारों की सूची में नहीं है, बल्कि उसके उस अंतर्निहित स्वभाव में है जिसे ‘संशय और प्रश्न करने की पूर्ण स्वतंत्रता’ कहा जाता है। दुनिया की अधिकांश प्राचीन सभ्यताएं और मजहब अपरिवर्तनीय आदेशों और डोग्मा (Dogma) पर टिके हैं जहाँ स्थापित मान्यताओं पर प्रश्न उठाना वर्जित माना गया है। इसके विपरीत, सनातन परंपरा की नींव ही प्रश्नों, शंकाओं और संवादों पर रखी गई है। हमारी परंपरा का सबसे श्रेष्ठ ग्रंथ, ‘श्रीमद्भगवद्गीता’, किसी दिव्य आदेश से नहीं, बल्कि अर्जुन के गहरे मानसिक अवसाद, तीव्र संशय और अत्यंत तीखे प्रश्नों से प्रारंभ होता है। भगवान कृष्ण अर्जुन पर कोई विचार थोपते नहीं हैं, बल्कि अठारह अध्यायों तक एक शिक्षक और वैज्ञानिक की भांति उसके हर संशय का तार्किक निवारण करते हैं और अंत में अपनी बुद्धि से विचार करने की स्वतंत्रता देते हैं।

उपनिषदों का तो शाब्दिक अर्थ ही है—गुरु के समीप बैठकर सत्य की खोज के लिए किया जाने वाला वैज्ञानिक संवाद। ऋग्वेद का सुप्रसिद्ध ‘नासदीय सूक्त’ तो ब्रह्मांड की उत्पत्ति पर विचार करते हुए संशय के उस चरम शिखर पर पहुँच जाता है जहाँ विज्ञान आज खड़ा है। उस सूक्त के अनुसार इस सृष्टि की उत्पत्ति से पहले न सत् था, न असत् था; न व्योम था, न आकाश था। और अंत में वह यहाँ तक कहता है कि इस सृष्टि का जो परम अध्यक्ष आकाश में है, शायद वह भी जानता हो कि यह सृष्टि कैसे बनी और शायद वह भी न जानता हो (ऋग्वेद, मंडल 10, सूक्त 129, ऋचा 6-7)। संशय और सत्य की खोज की इतनी अगाध स्वतंत्रता केवल उसी संस्कृति में संभव है जिसका स्वभाव मूलतः वैज्ञानिक हो। यहाँ सत्य को किसी के कहने पर ‘मानना’ नहीं सिखाया जाता, बल्कि सत्य को स्वयं की कसौटी पर ‘खोजना’ सिखाया जाता है। और यही तो आधुनिक विज्ञान का भी परम उद्देश्य है।​

यही कारण है कि जब बीसवीं सदी में क्वांटम भौतिकी (Quantum Physics) का उदय हुआ और वैज्ञानिकों ने परमाणु के भीतर झांका, तो उनके पैर उखड़ गए। उन्होंने देखा कि पदार्थ नाम की कोई ठोस वस्तु ब्रह्मांड में है ही नहीं। जिसे हम ठोस कण समझते हैं, वह वास्तव में केवल ऊर्जा की तरंगें हैं जो द्रष्टा की उपस्थिति से प्रभावित होती हैं। क्वांटम भौतिकी के इन क्रांतिकारी और विस्मयकारी सिद्धांतों को समझाने के लिए पश्चिमी शब्दावली और उनका पुराना दर्शन पूरी तरह बौना साबित हो रहा था। ऐसे में क्वांटम मैकेनिक्स के संस्थापकों को भारत के वेदांत दर्शन की शरण लेनी पड़ी। क्वांटम भौतिकी के जनक एरविन श्रोडिंगर ने स्वीकार किया कि उनके तरंग यांत्रिकी (Wave Mechanics) के सिद्धांतों की वैचारिक गूँज उपनिषदों के ‘अद्वैत’ दर्शन में समाहित है, जहाँ आत्मा और ब्रह्मांड की एकात्मकता की बात की गई है (Erwin Schrödinger, “My View of the World”, 1961)। इसी प्रकार, वर्नर हाइजेनबर्ग ने भी स्वीकार किया था कि भारतीय दर्शन के संपर्क में आने के बाद उन्हें क्वांटम भौतिकी के उन विचारों को स्वीकार करने में आसानी हुई जो पश्चिमी तर्कशास्त्र के अनुसार असंभव लग रहे थे (Werner Heisenberg, “Physics and Philosophy”, 1958)।

जब आधुनिक विज्ञान का शीर्ष नेतृत्व यह मानता है कि पदार्थ का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है बल्कि सब कुछ एक अंतर्संबंधित चैतन्य ऊर्जा का प्रसार है, तो वे अनजाने में आदि शंकराचार्य के ‘माया’ और ‘अद्वैत’ के सिद्धांतों की ही वैज्ञानिक और प्रामाणिक संपुष्टि कर रहे होते हैं। सनातन संस्कृति इसलिए आधुनिक नहीं है कि उसने आधुनिक यंत्र बनाए, बल्कि इसलिए आधुनिक है क्योंकि इसकी विचार-पद्धति कभी पुरानी हो ही नहीं सकती। यह समय की सीमाओं से परे हमेशा ‘नित्य नूतन’ और प्रासंगिक बनी रहती है।​

सैकड़ों वर्षों के विदेशी आक्रमणों और विशेष रूप से ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन ने भारत के मानस को बहुत गहरा नुकसान पहुँचाया। उन्होंने केवल हमारे संसाधनों को नहीं लूटा, बल्कि एक सोची-समझी नीति के तहत हमारी शिक्षा व्यवस्था को नष्ट करके हमारे भीतर एक आत्मघाती हीनभावना भर दी। हमें यह विश्वास दिला दिया गया कि जो कुछ भी तार्किक है, आधुनिक है, वैज्ञानिक है और प्रगतिशील है, वह केवल और केवल पश्चिम की देन है, और हमारी अपनी भाषा, हमारा महान दर्शन, हमारी ज्ञान-परंपराएं केवल कुछ रूढ़िवादी कर्मकांडों, अंधविश्वासों और पूजा-पाठ तक सीमित हैं।

इस हीनभावना का दुष्परिणाम यह हुआ कि हम अपनी ही अनमोल विरासतों को हीन दृष्टि से देखने लगे या फिर उनका झूठा और खोखला गौरवगान करने लगे। परंतु जब हम निकोला टेस्ला जैसे महावैज्ञानिक और आधुनिक युग के विधाता के मस्तिष्क पर स्वामी विवेकानंद और वेदांत के वास्तविक, ऐतिहासिक और प्रामाणिक प्रभाव का अध्ययन करते हैं, तो वह औपनिवेशिक हीनभावना ताश के पत्तों की तरह ढह जाती है। यह बोध वर्तमान पीढ़ी के लिए, विशेषकर युवा शोधकर्ताओं और वैज्ञानिकों के लिए, एक बहुत बड़ा संबल और गर्व का विषय होना चाहिए। लेकिन यहाँ एक अत्यंत महत्वपूर्ण चेतावनी को याद रखना आवश्यक है—यह गर्व कभी भी संकीर्ण अंध-अभिमान, अंध-राष्ट्रवाद या खोखले दावों में नहीं बदलना चाहिए। जो संस्कृति प्रश्न करने की स्वतंत्रता देती है, वह अंधभक्ति का समर्थन नहीं कर सकती। हमारा गर्व प्रामाणिक तथ्यों, गंभीर अध्ययन और निरंतर वैज्ञानिक खोज पर आधारित होना चाहिए। यह गर्व हमें इस बात के लिए प्रेरित करना चाहिए कि हम अपनी उस प्राचीन वैचारिक पद्धति को पुनः जाग्रत करें जो विज्ञान और अध्यात्म को दो परस्पर विरोधी खेमों में नहीं बांटती, बल्कि उन्हें एक ही परम सत्य को खोजने वाले दो पूरक मार्ग मानती है। सनातन दृष्टि मानती है कि विज्ञान यदि बिना अध्यात्म के चलेगा तो वह विनाशकारी परमाणु बम बना देगा, और अध्यात्म यदि बिना विज्ञान और तर्क के चलेगा तो वह संकीर्ण अंधविश्वास की खाई में गिर जाएगा। इन दोनों का समन्वय ही मानवता का भविष्य है। अब समय आ गया है कि हम अपनी इस समृद्ध, प्रामाणिक और वैज्ञानिक विरासत को पहचानें, बौद्धिक चोरी और सतही दावों से दूर रहकर इसका प्रामाणिक अध्ययन करें, और हीनभावना के कुहासे को चीरकर वैश्विक वैचारिक विमर्श में भारत की इस कालजयी चेतना को पुनः स्थापित करें।