मनोज कुमार श्रीवास्तव
ये मूर्ति मेट्रोपॉलिटेन म्यूजियम न्यूयार्क में थी। लूटी हुई वस्तुओं की श्रेणी में, माने यह मूर्ति चोरी होकर के गई थी। अब भारत को लौटाई गई है।
इस मूर्ति के मुख को जूम करके देखिए। होंठों के कोर, चिबुक, गालों के भराव के नीचे की ओर गहराती मुस्कान अपनी संपूर्णता में है परंतु इन्हें विरूपित करने वाले की मानसिकी और मनोवैज्ञानिकी क्या रही होगी? मूर्तिपूजा का विरोध इसे विरूपित करने का कारण नहीं हो सकता है क्योंकि कोई इस मूर्ति की पूजा नहीं कर रहा था। यह एक कलाकृति थी। आज भी मनुष्यता की विरासत का एक टुकड़ा है। मूर्तिपूजा-विरोध एक सुविधाजनक आख्यान है। इतिहास में जब तब भी किसी ने कला को, प्रतिमाओं को, ग्रंथों को नष्ट किया है, उसने सदैव कोई न कोई धार्मिक, राजनीतिक या वैचारिक आवरण ओढ़ा है। उदाहरण के लिए बामियान की बुद्ध-प्रतिमाएँ, अलेक्जेंड्रिया का पुस्तकालय, नालंदा का विश्वविद्यालय, लाइब्रेरी ऑफ कॉन्स्टेंटिनोपल – इन सबके विनाश में विचारधाराएँ तो थीं ही लेकिन विचारधाराओं के परत के नीचे कुछ और था। मलबे के नीचे लावे की पसरती आग सा।
मिशेल फूको ने ’’पावर/नॉलेज’’ में कहा था कि ज्ञान और शक्ति अविभाज्य हैं। जो ज्ञान को नियंत्रित करता है, वही शक्ति को भी नियंत्रित करता है। कला भी एक प्रकार का ज्ञान है। कला की अपनी भाषा है। कला बिन शब्दों, बिन बोल बताती है कि किसी काल में मनुष्य क्या था, क्या सोचता था, किसे दिव्य मानता था, कैसे देखता था।
इस मूर्ति की मुस्कान एक प्रकार का ज्ञान है। अज्ञानियों के लिए ज्ञान डरावना होता है उनके लिए जो भय सृजन कर जीवन को नियंत्रित करना चाहते हैं। इस डरावनेपन शब्द को लेकर यहाँ एक प्रश्न भी उभरता है कि क्या इस मूर्ति के काटने वाले के हाथ-पैर किसी ने काट दिये थे। या वह किसी अन्य गहन विकलांगता से ग्रसित था ? इस मूर्ति के अंग भंग करने वाला वह कौन था? एक आक्रमणकारी सैनिक? कोई एक धार्मिक उन्माद में डूबा हुआ ? एक उपेक्षित, अपमानित, हाशिये पर धकेला गया कोई जो पहली बार किसी ’’बड़ी’’ चीज़ के सामने ताकतवर महसूस करना चाहता था? या कोई ऐसा जिसे आदेश दिया गया था?
रेने गिरार ने ’’वायलेंस एंड द सेक्रेड’’ में बलि के बकरे की अवधारणा को विकसित किया था। यह अवधारणा कि समाज अपनी हिंसा को, अपने तनाव को, अपने अंतर्विरोधों को किसी एक पर केंद्रित करके शांत होता है। लेकिन जब कोई समाज इतना विघटित हो, इतना भयग्रस्त हो, इतना असुरक्षित हो कि उसे एक पत्थर की मूर्ति से भी भय लगे तो वह पत्थर को भी बलि का बकरा बना सकता है।
यह मूर्ति किसी की दुश्मन नहीं थी लेकिन मानसिक रूप से किसी के लिए यह मूर्ति एक शत्रु थी। मानसिक रूप से वह शत्रुता – वह शत्रुता उस व्यक्ति की अपनी आत्मा का प्रतिबिंब थी। जो व्यक्ति सौन्दर्य को देखकर क्रोधित होता है, वह सौन्दर्य से नहीं डरता अपितु वह उस रिक्तता से डरता है जो सौन्दर्य भाव उसकी भीतरी कुरूपता को या असौंदर्य को उजागर करता है। उसे अपनी खोखली हैसियत का पता चलता है। यही सूचना उसके लिए असह्य होती है। तब वह उस दर्पण को तोड़ देता है जिसमें उसे अपनी रिक्तता दिखती है।
वहाँ जो मुस्कान है, वह मुस्कान नहीं है – वह किसी शिल्पी की उंगलियों में बसे हुए उस सत्य का प्रकटीकरण है जो वह कहना चाहता था, जो वह कह नहीं सकता था, जो केवल पत्थर से ही कहा जा सकता था। गालों के नीचे जहाँ त्वचा खिंचती है, जहाँ मांसपेशियाँ आनंद की अनुभूति में सिकुड़ती हैं – वहाँ एक ऐसी गहराई है जो किसी जीवित मनुष्य के चेहरे पर भी दुर्लभ होती है।
यह मूर्ति पत्थर नहीं है। यह किसी की स्मृति है। किसी की प्रार्थना है। किसी के सौन्दर्य स्वप्न का संचित भार है जो पाषाण में उतर आया है। और इस सौन्दर्य भाव के किसी ने इसके हाथ पैर क्षतिग्रस्त कर दिए। जब हम किसी चीज़ को नष्ट करते हैं, तो वास्तव में हम क्या नष्ट करते हैं? यह एक बहुत ही सुंदर प्रश्न है। इस विषय में यहाँ ज्याँ बोद्रिया का उल्लेख करना समीचीन है। उसने ’’सिम्युलाक्रा और सिम्युलेशन’’ में एक विचित्र प्रस्ताव रखा था। इस प्रस्ताव के अनुसार, प्रतिमाएँ और प्रतीक धीरे-धीरे अपने मूल सत्य से अलग होकर स्वयं एक नई वास्तविकता बन जाते हैं। यह मूर्ति जब बनी होगी, किसी अप्सरा की, किसी नर्तकी की तत्समय उसका एक अर्थ था। लेकिन जब वह किसी संग्रहालय में पहुँची, तब वह केवल ’’उस युवती ’’ की प्रतिनिधि नहीं रही – वह मनुष्यता की उस पूरी काव्य-परंपरा की प्रतिनिधि बन गई जिसमें हम सौन्दर्य को, करुणा को, दिव्यता को आकार देने का साहस करते हैं।
जरा सोचें। कल्पना करें कि जब किसी ने इस मूर्ति का अंगभंग किया – उसने किसका विरोध किया? किस सत्ता से लड़ा? किस भय को जीता? फ्रायड ने कहा था कि विनाश एक आनंद है – डेथ ड्राइव या मृत्युवृत्ति। मनुष्य में सृजन की जितनी गहरी इच्छा है, उतनी ही गहरी, शायद उससे भी गहरी विध्वंस की इच्छा है। जो बना हो उसे मिटाना, जो पूर्ण हो उसे खंडित करना, जो सुंदर हो उसे विकृत करना। यह केवल क्रोध नहीं, यह एक प्रकार की आदिम ’’मैं हूँ’’ शक्ति का प्रमाण है।
’’मैं हूँ ’’- क्योंकि मैंने इसे बदल दिया। उत्तर-आधुनिक सौन्दर्यशास्त्री एलेन डे बॉटन ने एक जगह लिखा है कि सुंदरता हमें असहज करती है क्योंकि वह हमें हमारी न्यूनता याद दिलाती है। जब हम किसी ऐसी वस्तु के सामने खड़े होते हैं जो हमसे श्रेष्ठ है। जो हमारे जन्म से पहले थी और हमारी मृत्यु के बाद भी रहेगी। ऐसा देखकर एक अजीब सी पीड़ा उठती है।
इस मूर्ति को देखिए। यह किसी भी दर्शक से पुरानी है। इसके शिल्पी की हड्डियाँ भी मिट्टी बन चुकी हैं। लेकिन उसकी उंगलियों की कारीगरी इस पत्थर में उकरी हुई और वह बची हुई है। वह मुस्कान, वह बची हुई है। यह अमरता का एक प्रकार है और अमरता ईर्ष्या उत्पन्न करती है। दार्शनिक कांट ने क्रिटिक ऑफ़ जजमेंट में ’’उदात्त’’ की जो परिभाषा दी – कि कुछ चीजें इतनी विशाल या इतनी गहरी होती हैं कि हम उनके सामने अपनी लघुता को महसूस करते हैं – वह यहाँ प्रासंगिक है। इस मूर्ति के सामने खड़ा कोई भी साधारण मनुष्य एक क्षण के लिए अपनी तुच्छता को अनुभव करता है। और यह तुच्छता असह्य होती है। कुछ लोग इस असह्यता के सामने नत हो जाते हैं – नमन करते हैं, विनम्र होते हैं, सीखते हैं। और कुछ लोग हैं कि हथौड़ा उठा लेते हैं। क्योंकि जो व्यक्ति इस मूर्ति के हाथ पैर काट सकता है। जो इतनी कोमल, इतनी सूक्ष्म, इतनी जीवंत कारीगरी को क्षण भर में खंडित कर सकता है। उसके भीतर कुछ टूटा हुआ है। कुछ ऐसा जो शायद कभी पूरा था। और जो किसी हिंसा में, किसी अपमान में, किसी दमन में टूट गया।
हन्ना आरेंट ने द ओरिजिन्स ऑफ टोटलिटेरियनिज्म में एक बात कही जो यहाँ प्रासंगिक है कि जब मनुष्य को उसकी मनुष्यता से वंचित किया जाता है, जब उसे एक विचार में, एक भूमिका में, एक यंत्र में बदल दिया जाता है। तब वह भी दूसरों को वस्तु के रूप में देखने लगता है। उस सैनिक ने, उस विध्वंसक ने, उस व्यक्ति ने जिसने भी इस मूर्ति को विरूपित किया। शायद उस व्यक्ति ने बहुत पहले ही अपनी दृष्टि खो दी थी। वह दृष्टि जो किसी पत्थर में भी जीवन देख सके। और यही सबसे गहरी विकलांगता है। शारीरिक विकलांगता तो केवल देह की सीमा है लेकिन यह विकलांगता – सौन्दर्य को न देख पाने की, करुणा को न अनुभव कर पाने की, किसी दूसरे के सृजन में मनुष्यता को न पहचान पाने की – यह आत्मा की विकलांगता है। यह विकलांगता संक्रामक भी है। यह विकलांगता विचारधाराओं में फैलती है, आदेशों में फैलती है, पीढ़ियों में फैलती है। एक विकलांग दृष्टि एक पूरी सभ्यता को विकलांग कर सकती है।
यह मूर्ति, इस क्षति के बावजूद भी सुंदर है। शायद इस क्षति के कारण और भी सुंदर है। जापानी सौन्दर्यशास्त्र में ’’वाबी-साबी’’ की अवधारणा है कि अपूर्णता में, क्षणभंगुरता में, अधूरेपन में एक विशेष सौन्दर्य है। और ’’किन्त्सुगी’’ टूटे हुए मिट्टी के बर्तनों को सोने से जोड़ने की कला, जिसमें दरारें छिपाई नहीं जातीं बल्कि उजागर की जाती हैं, क्योंकि वे उस वस्तु के इतिहास का हिस्सा हैं। इस मूर्ति के खंडित अंग उसके इतिहास का हिस्सा हैं। यह बताती है कि इस सौन्दर्य को किसी ने असह्य पाया। यह बताती है कि यह इतनी शक्तिशाली थी कि किसी ने इसे नष्ट करने की आवश्यकता महसूस की। यह खंड, यह अनुपस्थिति, एक प्रकार की गवाही है। जैक देरिदा ने ’’ट्रेस’’ (अनुरेख) की अवधारणा में कहा था कि अर्थ केवल उपस्थिति में नहीं होता, अनुपस्थिति में भी होता है। जो नहीं है, वह भी अर्थ बनाता है। इस मूर्ति के कटे अंग एक अनुरेख हैं, उस हिंसा का, उस भय का, उस विकलांग दृष्टि का जो इसे खंडित करने आई थी और विचित्र रूप से वह हिंसा इस मूर्ति को और अधिक जीवंत बना गई।
आइए अब फिर उस मुस्कान पर लौटिए। होंठों के कोर पर, चिबुक पर, गालों के नीचे जहाँ वह गहराती है। यह मुस्कान नहीं बदली। हाथ पैर गये – मुस्कान रही। यह सब अकारण नहीं है। जिस शिल्पी ने इसे बनाया, उसका जो केंद्रीय भाव था – वह करुण, वह दिव्य, वह आनंदित भाव, उसे होंठों में, गालों में, पूरे मुखमंडल के वक्र में बसाया था। एक अंग की क्षति उस भाव को नष्ट नहीं कर सकती। यह एक बहुत गहरी समझ की बात है।
सौन्दर्य किसी एक बिंदु में नहीं होता। वह एक संपूर्ण व्यवस्था में होता है, एक आंतरिक संबंध में होता है, उन संबंधों के बीच होता है जो रूप के विभिन्न अंगों में विद्यमान हैं। इसीलिए जब कोई एक अंग नष्ट करता है, तो वह पूरे सौन्दर्य को नष्ट नहीं कर पाता।
विध्वंसक हमेशा हारता है। यह कोई भावुक कथन नहीं है। यह एक ऐतिहासिक सत्य है। अलेक्जेंड्रिया जला, लेकिन प्लेटो बचा। नालंदा जला, लेकिन नागार्जुन बचे। बाबर ने मस्जिद बनाई, लेकिन वाल्मीकि की रामायण बची। तालिबान ने बामियान को तोड़ा, लेकिन बुद्ध की करुणा का विचार पूरी दुनिया में और फैल गया।
यह मूर्ति एक अप्सरा, एक नर्तकी की है। उसके शरीर में जो वक्र हैं, जो लावण्य है, जो कोमलता है, वह मुखर है। वह अपनी शर्तों पर खड़ी है, वह किसी पुरुष-दृष्टि के लिए नहीं बनी है। वह अपनी दिव्यता में स्वयंभू है। और यह एक सौन्दर्य की प्रतिमूर्ति है। लाखों लोग इसे देखते हैं। उस विध्वंसक का नाम किसी को भी नहीं पता है लेकिन सौन्दर्य की यह मुस्कान, आज भी यहाँ है। यह मुस्कान, एक विशेष प्रकार की हिंसा को आमंत्रित करती है। सिमोन द बोवुआर ने ’’द सेकंड सेक्स’’ में ठीक ही कहा था कि स्त्री को ’’पुरुष-समाज’’ ने सदैव ’’अदर’’ या ’’अन्य’’ के रूप में परिभाषित किया है और जो ’’अन्य’’ है, उस पर नियंत्रण की इच्छा उतनी ही तीव्र है जितनी उसे नष्ट करने की होती है। एक स्वायत्त, सुंदर, दिव्य स्त्री-आकृति, किसी पुरुष की दया पर नहीं है। वह एक पितृसत्तात्मक मानसिकता को असहज करती है। शायद इस मूर्ति के विध्वंसक के मन में, चाहे सचेत हो या अचेत, यह भाव था कि इस अनियंत्रित, इस स्वायत्त, इस अदम्य सौन्दर्य को ’’अपमानित’’ करे लेकिन वह सफल नहीं हुआ। मुस्कान बची रही।
पोल रिकोयर ने ’’मेमोरी, हिस्ट्री, फॉरगेटिंग’’ में कहा था कि स्मृति और विस्मृति दोनों राजनीतिक क्रियाएँ हैं। जो याद किया जाता है और जो भुला दिया जाता है – यह निर्णय तटस्थ नहीं होता। इस मूर्ति को किसी ने खंडित किया – शायद इस उद्देश्य से कि जिस सभ्यता का यह प्रतिनिधित्व करती है, उसे मिटाया जाए, उसे अप्रासंगिक बनाया जाए, उसे विस्मृत कराया जाए। लेकिन हुआ उल्ट है। खंडित होने के कारण यह मूर्ति और अधिक यादगार हो गई। इसकी क्षति एक कहानी बन गई, ऐसी कहानी जो मैं अभी कह रहा हूँ जिसे आप अभी पढ़ रहे हैं।
बेंजामिन ने ’’थीसेज ऑन द फिलॉसफी ऑफ हिस्ट्री’’ में कहा था कि इतिहास विजेताओं की कहानी है। याद रहे, उन्होंने यह भी कहा कि प्रत्येक दस्तावेज़ जो सभ्यता का है, वह बर्बरता का भी दस्तावेज़ है। यह मूर्ति दोनों है। यह हमारी सभ्यता की उत्कृष्टता का दस्तावेज़, और उस हिंसा का दस्तावेज़ जो उस पर हुई। और इसीलिए यह और अधिक सत्य है। तो हम कहाँ हैं?
हम एक ऐसी मूर्ति के सामने हैं जो खंडित है लेकिन अमर है। हम एक ऐसे प्रश्न के सामने हैं जो सरल लगता है लेकिन असंख्य परतों से बना है। और हम एक ऐसे मनुष्य की कल्पना कर रहे हैं जिसने यह विनाश किया। मैं उस मनुष्य के लिए क्रोध महसूस करता हूँ। लेकिन मैं उसके लिए करुणा भी महसूस करता हूँ। क्योंकि जो व्यक्ति इस मुस्कान को देखकर हथौड़ा उठाए, वह कितना दुखी रहा होगा। उसके भीतर कितना अँधेरा रहा होगा। उसने अपने जीवन में कितनी कम सुंदरता देखी होगी। उसे, किसने, किस व्यवस्था ने, किस विचारधारा ने, किस डर ने इस अँधेरे में धकेला होगा। वह भी किसी का बच्चा था। किसी माँ ने उसे भी प्रेम से देखा होगा। किसी शाम, उसने भी किसी सुंदर चीज़ को देखकर एक पल रुककर उसे अनुभव किया होगा। कहीं न कहीं वह भी एक मनुष्य था। लेकिन उसके जीवन में कुछ घटा होगा। और वह कुछ, वही असली अपराध है। वह जो कुछ घटा था। वह विचारधारा, वह व्यवस्था, वह भय, वह दमन, जिसने एक मनुष्य को इस मूर्ति की नाक काटने वाले में बदल दिया, वह असली अपराधी है।
इस मूर्ति की मुस्कान कह रही है कि सौन्दर्य अजेय है। वह मुस्कान कह रही है कि जो एक बार सच्चे मन से बना, वह मिटाया नहीं जा सकता – न पत्थर से, न स्मृति से, न इतिहास से। वह मुस्कान कह रही है कि विनाश की प्रतिक्रिया विनाश नहीं है। वह करुणा है, वह सृजन है, वह उस सौन्दर्य को याद रखना है। और वह मुस्कान कह रही है – बड़े धैर्य से, बड़े शांत भाव से कि जो अंग काटने आया था, वह चला गया। लेकिन यह मुस्कान यहाँ है। यहाँ। अभी। आपके और मेरे सामने। ऐसी प्रतिमा लौटे तो लगता है हमारी मुस्कान, हमारा सौंदर्य का अंश लौट आया है।
जब कोई चीज़ जो छीनी गई थी, लौटती है तो वह केवल एक वस्तु नहीं लौटती। एक गरिमा लौटती है। एक स्मृति लौटती है। एक ऐसा अधूरापन भरता है जिसका नाम भी हमें ठीक से नहीं पता था।
मनोज कुमार श्रीवास्तव