राजनीति

महंगाई नहीं, असली संकट उपलब्धता का है, जानें उपाय

पंकज जायसवाल

आज का युग ऊर्जा युग है यदि वैश्विक युद्ध, समुद्री मार्गों में तनाव, प्रतिबंध या भू-राजनीतिक संकट उत्पन्न होते हैं तो ऊर्जा संकट बड़ा हो जाता है. हाल में पेट्रोल डीजल गैस और दूध के दाम बढे हैं. कई लोग इस वृद्धि को ही संकट मान रहें हैं जबकि असली संकट यह नहीं, असली संकट बढे दाम के बाद भी पेट्रोल डीजल गैस की उपलब्धता का है.

 जिस देश में पेट्रोल डीजल गैस अगर ८८ फीसदी से अधिक आयात पर निर्भर हो और वह आयात जिस गलियारे से आता  हो और उस गलियारे पर डबल नाकाबंदी हो गई हो तो इतनी जल्दी आप कैसे वैकल्पिक मार्ग, स्रोत , आपूर्तिकर्ता ढूंढ पाएंगे? और जो हम नए आपूर्तिकर्ता ढूढेंगे, वह पूरी दुनिया में आ पड़ी इस आपूर्ति संकट के बीच नियमित मूल्य पर तो ये तीनों चीजें शायद ही देंगे। हमारे ८८ फीसदी आयात में से लगभग ४० से ४५ फीसदी ऊर्जा आयात इसी  गलियारे से है और अगर संकट का समाधान नहीं हुआ तो मतलब ४५ फीसदी हमारी उपलब्धता कम होने की संभावना है. हम बातचीत से कुछ टैंकर मंगवा भी लें  और कुछ वैकल्पिक स्रोत   से लें लें तो भी यह गैप इतना बड़ा है  कि  १ महीने में नहीं भरेगा और इसमें कुछ महीने लग सकते हैं. इन कुछ महीनों में लाख जतन से भी हम २० से २५ फीसदी ही वैकल्पिक व्यवस्था कर सकते हैं, मतलब उपलब्धता में २० फीसदी की कमी कुछ महीनों तक रहने की संभावना है. इससे मांग बढ़ने, आपूर्ति घटने, आयात महंगा, डॉलर मजबूत,  रुपया कमजोर और महंगाई फिर से और बढ़ने का संकट है ।

 अगर कुछ महीनों तक इस ऊर्जा की कमी २० फीसदी तक रहती है तो इनसे चलने वाले सारे काम जैसे ट्रासंपोर्ट, इंफ़्रास्ट्रक्चर, कंस्ट्रक्शन, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, किचन सब इतने फीसदी से मंद हो सकते हैं। होर्मुज की नाकाबंदी सेवा एवं गुड्स के उत्पादन की गति को मंद कर सकती और जब मंद करेगी तो मंदी आएगी और जब मंदी आएगी तो महंगाई आएगी, महंगाई आएगी तो बैंक रेट बढ़ेगा, बैंक रेट बढ़ेगा तो ईएमआई बढ़ेगी, ईएमआई बढ़ेगी तो खरीद कम होगी और यह एक तरह से दुष्चक्र में फंसने जैसा होगा। जब यह मंदी पूरी दुनिया के स्तर पर फैलेगी तो अमेरिका का फ़ेडरल बैंक भी रेट कट रोकेगा, रेट बढ़ा भी सकता है. इस कदम से डॉलर असेट की वैल्यू बढ़ जायेगी और दुनिया भर के निवेशक अन्य निवेशों से पैसे निकाल डॉलर असेट में निवेश करने लग सकते हैं. इससे शेयर बाजार में उथल पुथल मचने की संभावना हमेशा बनती रहेगी।।

अगले कुछ महीनों में मेटा इकोनॉमिक्स इफ़ेक्ट के नियमों के तहत तरंग की तरह इसका प्रभाव पूरी दुनिया में फैलकर विश्वव्यापी मंदी का संकट ला रहा है। ऐसे में भारत सरकार और भारतीय सबको सज्ज रहना पड़ेगा . यह युद्ध और इस युद्ध से उपजी परिस्थितियां दोनों अपने वश में नहीं है. अपने पास है तो अपना समय, संयम और नीतियां। सरकार और जनता दोनों को मिलकर काम करना पड़ेगा।

 सरकार अपने संयम और नीतियों के व्यवहार में बदलाव करते हुए जहां संभव हो रहा है, वहां वर्क फ्रॉम होम को प्रमोट कर रही है . सरकार की चुनौती डॉलर और आयात बिल का भागता हुआ मूल्य है. इसके लिए सरकार सोने के आयात पर ड्यूटी लगा रही है ताकि सोने का आयात कम हो जिससे सोने का आयात बिल कम हो. इन सबके अलावा पेट्रोलियम पदार्थों का निर्यात भी सरकार रोके तो यह एक अच्छा कदम हो सकता है। संकट बना रहा तो सरकार अगले मौद्रिक समीक्षा में बैंक रेट भी बढ़ा सकती है क्यूंकि थोक और खुदरा दोनों महंगाई दर बढे हुए हैं लेकिन इस प्रयास में ईएमआई बढ़ जाएगी।

ऐसे में जनता के स्तर से भी इस युद्ध को लड़ना पड़ेगा। चूंकि २० फीसदी तक आपूर्ति प्रभावित हो सकती है. ऐसे में हम अपनी खपत को भी इसके आसपास कम कर लें तो इस झटके को हम सह सकते। चूंकि भारत कृषि प्रचुर देश है तो इस खपत मैनेजमेंट और कृषि संमृद्धि के होने से हमें वैसे संकटों का सामना नहीं करना पड़ेगा जैसा अन्य देश करेंगे।

 पहले बात करते हैं कि गाड़ियों के ईंधन में १० से २० फीसदी कैसे कम कर सकते हैं. मैं तात्कालिक सलाह कि आप कुछ दिन कार पूलिंग करें, पब्लिक ट्रांसपोर्ट से चलें, जैसे सलाह नहीं दूंगा क्यूंकि ये कुछ ही दिनों के लिए और प्रतीकात्मक ही हो सकते हैं. टिकाऊ सलाह वह हैं जिन्हे आप वाकई में अपनी उत्पादकता में कमी किये बिना लागू कर सकते हैं और वह भी आसानी से. जैसे आप ईवी खरीद सकते हैं और अगर नहीं तो निम्न व्यवहार परिवर्तन कर सकते हैं । जैसे वाहन में ईंधन की खपत कम करने के लिए वाहन के टायर की हवा चेक करते रहें और सही हवा रखें। गाड़ियों की मरम्मत अप टू डेट रखें और खटारा गाडी से न चलें। गाडी कभी बहुत तेज तो कभी बहुत धीमें ना चलाएं. नियमित गति से उचित रेंज में गाडी चलाएं। गाडी के शीशे बंद कर गाडी चलाएं ताकि उलटी  हवा के दबाब से गाडी के इंजन पर दबाब ना पड़े.

मीटिंग की संख्या कम करते हुए जो काम फोन से या व्हाट्सप्प कांफ्रेंस से या ऑनलाइन हो जाए उसे कुछ दिन ऐसे ही कर लें. बिना उत्पादकता कम किये हुए भौतिक मीटिंग को जितना संभव कम हो, कम कर लें. सिग्नल पर गाडी को बंद कर दें. सब लोग एक बार गाड़ियों का फिटनेस चेक कर इसका सर्टिफिकेट लें लें. दुबई की तरह फिटनेस के नियम प्रभावी हो जाएँ। इन सब प्रैक्टिस चेंज से बिना किसी उत्पादकता को प्रभावित किये ही ईंधन की खपत को १० से १५ फीसदी कम कर सकते हैं. हमारा टारगेट होना चाहिए कि अगर महीने में १०० लीटर ईंधन खरीदते हैं तो कैसे ८० लीटर में ही सारे काम चला लें. इससे हम सिर्फ देश का डॉलर ही नहीं बचाएंगे, हम  २५ फीसदी तक ईंधन मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रखेंगे।

तेल के बाद गैस की खपत कम कर सकते हैं. गाड़ियों के गैस में तो उपरोक्त व्यवहार परिवर्तन कर खपत कम कर सकते हैं. घरेलू गैस की बचत के लिए भी कुछ चेंज प्रैक्टिस कर सकते हैं। पहला हम घर पर एक इंडक्शन चूल्हा और इलेक्ट्रिक केतली रख लें. अपने खाने पकाने में से जो आइटम हम इस पर बना सकते हैं, वह इस पर ही बनायें जैसे चावल, दाल, गरम पानी, ग्रीन टी इत्यादि। चाय एक दो समय के लिए कम कर सकते हैं तो कम करें। इस मिक्स यूज को अपना कर गैस के यूज को २० से २५ फीसदी तक कम कर सकते हैं। खाने को प्रेशर कुकर में बनायें, धीमे आंच में बनायें और बर्तन रखने के बाद चूल्हा जलायें और सही लाइटर रखें। इस चेंज प्रैक्टिस से १० से १५ फीसदी तक गैस खपत और कम कर सकते हैं. साथ में अगर दो तीन सब्जी बनती है घर में तो १ सब्जी पर आ जाएँ और सप्ताह में एक दिन अचार चटनी और चोखे का उपभोग करें। इन सब के इस्तेमाल से ५ से १० फीसदी और गैस खपत हो सकती. इस प्रकार करीब करीब ३० फीसदी गैस ईंधन खपत कम हो सकती है. किचन यूज में ये चेंज प्रैक्टिस को फॉलो करें तो अच्छा खासा गैस बचत हो सकती है। हर गैस उपभोक्ता को यह टारगेट करना चाहिए जो गैस ३० दिन में ख़त्म होती है उसे ४० दिन तक चलाएं। इससे हम ३० फीसदी तक मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रख सकेंगे।

 खाद्य तेल की खपत कैसे कम कर सकते हैं क्यूंकि आज भी हम पाम आयल सबसे अधिक आयात करते हैं. इसके लिए सरकार तिलहन उत्पादन को प्रोत्साहित कर सकती है. यदि हम महीने में तीन लीटर तेल का इस्तेमाल करते हैं तो कोशिश करनी चाहिए की २.५ लीटर में ही वही खाना बना लें । तली चीजों के इस्तेमाल में कुछ दिनों तक कमीं लाएं। सप्ताह में एक दिन अचार चटनी और चोखे का उपभोग करें।  इस प्रकार हम तेल की खपत कम कर के ३० फीसदी तक मूल्यवृद्धि के झटके तक भी अपने आपको तैयार रखेंगे।

सोने की खपत को भी हम नियंत्रित कर अपना डॉलर ऑउटफ्लो और आयात बिल कम रख सकते हैं. ऐसे में उतना ही सोना खरीदें जितना जरुरी है. डिलीवरी वाला सोना अगर आभूषण वाला है तो उसे जरुरत के स्तर तक ही कुछ महीनों तक खरीदें. सोने में उस खरीद को बंद करने का प्रयास करें जिसे आप तिजोरी में रखने वाले हैं. निवेश सिर्फ उन्ही चीजों में करें जो मनी सर्कुलेशन बढ़ाने वाली हो.

 इन उपभोग के चेंज प्रैक्टिस से हम लगभग २५ फीसदी तक के मूल्यवृद्धि को ही नहीं सहने योग्य होंगे बल्कि हम २५ फीसदी आपूर्ति की कमी से होने वाली मंदी से लड़ इसे रोकने में या इसका प्रभाव कम करने में काफी हद तक सफल होंगे।

पंकज जायसवाल