समाज

अंधविश्वास की कीमत: टोना-टोटका, झाड़-फूँक और तंत्र-मंत्र के नाम पर कब तक होगी ठगी

हाल ही में प्रकाशित एक समाचार ने पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया। टोना-टोटका करवाने की रंजिश में ईंट और लोहे की रॉड से हमला कर एक वृद्धा की निर्मम हत्या कर दी गई। यह घटना केवल एक आपराधिक वारदात नहीं, बल्कि समाज में गहराई तक फैले अंधविश्वास की भयावह तस्वीर भी प्रस्तुत करती है। दुखद तथ्य यह है कि विज्ञान और तकनीक के इस युग में भी टोना-टोटका, झाड़-फूँक और तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों को भ्रमित करने, ठगने और मानसिक रूप से शोषित करने का सिलसिला लगातार जारी है।
आज भी अनेक तथाकथित तांत्रिक, ओझा और स्वयंभू सिद्ध पुरुष बीमारी दूर करने, भूत-प्रेत भगाने, मुकदमे में विजय दिलाने, मनचाहा प्रेम या विवाह कराने, जिन्न को वश में करने, संतान प्राप्ति, व्यापार में उन्नति, सट्टे और जुए में धन दिलाने जैसे अवैज्ञानिक और असंभव दावे करते हैं। विडंबना यह है कि इन दावों के जाल में केवल अशिक्षित ही नहीं, बल्कि शिक्षित और आर्थिक रूप से संपन्न लोग भी फँस जाते हैं। भय, असुरक्षा, लालच और कठिन परिस्थितियों में त्वरित समाधान पाने की मानसिकता लोगों को ऐसे पाखंडियों का आसान शिकार बना देती है।
समाचार पत्रों, सोशल मीडिया और अन्य माध्यमों में आज भी “काला जादू विशेषज्ञ”, “हर समस्या का समाधान”, “100 प्रतिशत गारंटी”, “एक ही रात में मनोकामना पूर्ण” जैसे विज्ञापन देखने को मिल जाते हैं। कुछ लोग तो कैंसर, लकवा, मानसिक रोग और अन्य गंभीर तथा असाध्य बीमारियों को बिना किसी चिकित्सकीय उपचार के ठीक करने का दावा भी करते हैं। ऐसे झूठे दावे न केवल लोगों की मेहनत की कमाई लूटते हैं, बल्कि कई बार मरीज का समय पर चिकित्सा उपचार भी रुक जाता है, जिससे उसकी जान तक खतरे में पड़ जाती है।
ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, बल्कि शहरों में भी साँप या बिच्छू के काटने, दाँत दर्द, बुखार, बच्चों के रोग अथवा अन्य बीमारियों के लिए झाड़-फूँक का सहारा लेने की प्रवृत्ति आज भी देखने को मिलती है। कई बार समय पर अस्पताल न पहुँच पाने के कारण रोगी की स्थिति गंभीर हो जाती है। यह केवल अज्ञानता नहीं, बल्कि वैज्ञानिक सोच के अभाव का परिणाम है।
इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि अनेक मामलों में तंत्र-मंत्र के नाम पर महिलाओं के साथ दुष्कर्म, यौन शोषण, ब्लैकमेल और आर्थिक ठगी की घटनाएँ सामने आती रहती हैं। लोग अपनी समस्या के समाधान की आशा में इन तथाकथित तांत्रिकों पर विश्वास कर लेते हैं और अंततः अपनी धन-संपत्ति, सम्मान और कभी-कभी जीवन तक से हाथ धो बैठते हैं। अनेक परिवार अंधविश्वास के कारण टूट जाते हैं और कई बार निर्दोष लोगों पर “डायन” या “टोना करने” का आरोप लगाकर उनके साथ हिंसा तक कर दी जाती है।
कुछ समय पूर्व एक राष्ट्रीय समाचार चैनल ने स्टिंग ऑपरेशन के माध्यम से अनेक स्वयंभू तांत्रिकों की पोल खोली थी। कैमरे के सामने उनके चमत्कारों की सच्चाई उजागर हुई, लेकिन दुर्भाग्य से समाज पर उसका अपेक्षित प्रभाव नहीं पड़ा। आज भी ऐसे लोगों की संख्या कम होने के बजाय बढ़ती दिखाई देती है। इसका कारण है लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण की कमी, प्रभावी जन-जागरूकता का अभाव तथा कानूनों का कमजोर क्रियान्वयन।
भारत का संविधान नागरिकों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवतावाद और सुधार की भावना विकसित करने का आह्वान करता है। इसलिए आवश्यकता केवल कानून बनाने की नहीं, बल्कि समाज में वैज्ञानिक चेतना विकसित करने की भी है। विद्यालयों, महाविद्यालयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक नेताओं, मीडिया और प्रशासन को मिलकर अंधविश्वास के विरुद्ध व्यापक जन-जागरण अभियान चलाना चाहिए। साथ ही ऐसे झूठे और भ्रामक विज्ञापनों पर तत्काल रोक लगनी चाहिए तथा चमत्कार और तंत्र-मंत्र के नाम पर लोगों से धन ऐंठने वालों के विरुद्ध कठोर कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।
आस्था और अध्यात्म भारतीय संस्कृति की अमूल्य धरोहर हैं, किंतु आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं होता। धर्म मनुष्य को विवेक, करुणा और सत्य का मार्ग दिखाता है, जबकि अंधविश्वास उसे भय, भ्रम और शोषण की ओर ले जाता है। अब समय आ गया है कि समाज विज्ञान, तर्क और विवेक को अपनाए तथा टोना-टोटका, झाड़-फूँक और तंत्र-मंत्र के नाम पर फैलाए जा रहे पाखंड को सिरे से नकार दे। यही एक जागरूक, सुरक्षित और प्रगतिशील समाज की पहचान होगी।

  • सुरेश गोयल धूप वाला