“नागरिकों की सुरक्षा का प्रश्न” ….?

जम्मू-कश्मीर के नित्य बिगड़ने वाली विषम परिस्थितियों से आम नागरिकों की सुरक्षा पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है ? सोशल मीडिया पर 9 अप्रैल को कश्मीर घाटी में जिस प्रकार से श्रीनगर संसदीय सीट के उपचुनाव के विरोध में अलगावादियों व उनके समर्थको द्वारा सीआरपीएफ के सुरक्षाकर्मियों पर हो रहें एकतरफा अत्याचारों के 3-4 वीडियो ने सभी देशभक्तो को झकझोर दिया है। उनको विचलित करते हुए राष्ट्रीय स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने वाले एक वीडियो में युवाओं की हिंसक भीड़ दो जवानों को बुरी तरह से पीट रही है तो अन्य वीडियो में कुछ लड़के सुरक्षाकर्मियों को लातों से मारते हुए दिख रहे है। जबकि एक और अन्य वीडियो में अपनी ड्यूटी से लौट रहे जवानों के साथ इन देशद्रोही लड़कों की भीड़ भी चलते चलते इनको उकसाते हुए “गो इण्डिया गो, जालिमों हमारा कश्मीर छोड़ दो” के नारे लगा रही है। इतने पर भी कुछ लड़के जवानों के हैलमेट उतारते है और कुछ ने उनकी सुरक्षा शील्ड तक छीन ली आदि । अनेक प्रकार से उत्पीड़ित होने पर भी यह धैर्य या संयम नही सरकारी आदेश की विवशता थी। जिसके अनुसार उनको पिटने या मरने पर भी आत्मरक्षा के लिये पलटवार के लिए हथियार न उठाने के आदेश थे। यह कैसा अनुशासन है जिसके बंधन से ये सुरक्षाकर्मी अपने अपने जख्मों से पीड़ित होकर भी चुपचाप हाथ बंधे होने की आत्मघाती प्रशासकीय नीति को मन ही मन कोस रहें होंगे ? सीआरपीएफ के एक अधिकारी के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि ये वीडियो उन मानवाधिकारियों को वहां की सच्चाई से अवगत कराता है जो सुरक्षाबलो पर अकारण बल प्रयोग करने का आरोप लगाने से नही चूकते । लेकिन क्या इन प्रमाणों के लिये राष्ट्र की सुरक्षा करने वाले जवानों की आहुति दी जाने लगेगी तो आम नागरिकों की सुरक्षा कैसे संभव हो सकेगी ?
पिछले 2-3 दिन से निरन्तर सोशल मीडिया पर चल रहें इन वीडियो को देख कर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि कश्मीर घाटी में पत्थरबाजों ने हमारे सुरक्षाबलों पर जो अत्याचार किये है वह एक स्वतंत्र राष्ट्र पर सीधा आक्रमण है। यह लोकतांन्त्रिक मूल्यों का खुला उल्लंघन व उसकी मान्यताओं पर अपमानपूर्ण प्रहार है। क्या ऐसे देशद्रोहियों को प्रोत्साहित करते रहने के लिये सुरक्षाबलों के राष्ट्ररक्षको पर पत्थरों, तेजाब व पेट्रोल बमो आदि से आक्रमण होने दें और उनको “धैर्य” का पाठ पढ़ाने के नाम पर उनके जीवन को योंही न्यौछावर होने दें ? यह कैसी नपुंसकता है जो शस्त्र धारियों को आत्मग्लानि के मानसिक वाणों से घायल करती आ रही है ? क्या कोई संवेदना इन देशभक्तों व रक्षकों के लिये शेष है जो इनको अलगाववादियों और आतंकवादियों से सुरक्षित रखने के लिये आगे आये ? देश से आज़ादी चाहने वाले षड्यंत्रकारियों को संविधान के नियम कानूनों का भय नही है , परंतु सुरक्षाबलों को संविधान की रक्षार्थ नियमो के पालन करने में बाधा पहुंचाना क्या उचित है ?
आज मुझे यह लिखने में खेद हो रहा है कि लगभग 130 करोड़ के देश भारतवर्ष में लाखों नही तो हज़ारो सेलीब्रेटीज़ ( प्रसिद्ध नेता, राजनेता, धर्माचार्य, अभिनेता, पत्रकार, खिलाड़ी आदि ) होने के उपरांत भी केवल दो क्रिकेट खिलाड़ियों सर्वश्री गौतम गंभीर व वीरेंद्र सहवाग ने इन अत्याचारों से द्रवित होकर अपनी संवेदनशीलता का परिचय दिया है। कम से कम देश की प्रथम पंक्ति में आने वाले समाज के सभी वर्गों को ऐसे राष्ट्रद्रोही कृत्यों की भरपूर भर्त्सना तो व्यापक रूप से करनी ही चाहिये।जबकि यह बहुत दुखद है कि अनेक स्तर से सरकार को परामर्श दिया जा रहा है कि कश्मीर में पत्थरबाजों पर पैलेट गन के स्थान पर अन्य कोई विकल्प ढूंढा जाये । यह सुझाव देने वाले यह क्यों नही कहते की देशद्रोहियों को बचाने वालों के गलो मे फूलों की माला डालों ? क्या विश्व में ऐसा कोई कानून है जो अपराधियों का साथ देने या उनकी रक्षा करने वालों को दोषी नही मानता ? क्या देशद्रोहियों और आतंकियों से राष्ट्र के जान-माल की सुरक्षा करना सरकार का संवैधानिक दायित्व नही ? न्याय की परिधि में क्या यह उचित है कि सुरक्षाकर्मियों पर पत्थरो, पेट्रोल व तेजाब के बमों और अन्य घातक हथियारों से आक्रमण करके आतंकवादियों को सुरक्षित भागने में सहायक युवाओं की भीड़ को भटका हुआ समझ कर निर्दोष माना जाय ?
यह सर्वविदित है कि वर्षो से कश्मीर घाटी में अलगाववादियों व आतंकवादियों द्वारा प्रति लड़के/युवक को 500 से 1500 रुपये तक देकर सुरक्षाबलों पर हमले करवायें जाते आ रहे है। परिणामस्वरूप अनेक सुरक्षाकर्मी मारे भी गये और साथ ही सरकारी संपत्तियों की भी भारी क्षति हुई है। पिछले कुछ वर्षों के अतिरिक्त भी जुलाई 2016 में आतंकी बुरहान वानी के मारे जाने के बाद इन पत्थरबाजों की टोलियों ने कई माह तक विशेषतौर पर दक्षिण कश्मीर में सामान्य जनजीवन को ही बंधक बना दिया था। जिसको नियंत्रित करने के लिए सरकार को वहां कर्फ्यू भी लगाना पड़ा था। बाद में ऐसा प्रतीत हुआ की नोटबंदी के 50 दिन की अवधि ( 9 नवंबर से 31 दिसम्बर) में व जाली मुद्रा पर अंकुश लगने से इन पत्थरबाजों का धंधा कुछ कम हुआ । परंतु ये कट्टरपंथी अपने आकाओं के आदेशों पर पुनः धीरे धीरे कोई न कोई बहाना बनाकर और अवसर देखकर अपने जिहादी जनून के दुःसाहस का प्रदर्शन करने से बाज नही आ रहें है। अतः ऐसी विपरीत परिस्थितियों में पत्थरबाजों की टोलियों के प्रति कोई सहानभूति करना देशद्रोहियों के दुःसाहस को बढ़ावा ही देगा।
पिछले माह हमारे सेनानायक जनरल विपिन रावत ने अपने एक संदेश में स्पष्ट कहा था कि “जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बल ज्यादा हताहत इसलिए हो रहें है क्योंकि ‘स्थानीय लोग’ उनके अभियान में बाधा डालते है और कई बार आतंकवादियों को भगाने में भी मदद करते है।'” इसके साथ ही उन्होंने अपने कड़े संदेश में स्थानीय कश्मीरी लड़कों को चेतावनी भी दी थी कि “जिन लोगों ने हथियार उठाये है और इस्लामिक स्टेट व पाकिस्तान के झंडे लहराकर आतंकवादी कृत्य करते है तो हम उनको राष्ट्रविरोधी तत्व मानेंगे और उनको पकड़ कर उन पर कड़ी कार्यवाही होगी ।” इस साहसिक बयान पर नेताओं समेत अनेक तथाकथित बुद्धिजीवियों की आलोचनाभरी नकारात्मक टिप्पणियां आयी थी।
लेकिन हमारे लोकतंत्र की बड़ी विचित्र स्थिति यह है कि आतंकियों, अलगाववादियों और अन्य देशद्रोहियों के पक्ष में मौन रहना कही न कही राजनीति में बने रहकर नेताओ व उनके सहयोगियों की सत्तालोलुपता की मानसिकता का बोध कराता है। जबकि आतंकवादियों की पकड़ा-धकडी व मुठभेडों पर तथा पैलेटगन की आवश्यकता आदि पर इन्ही लोगों के विरोधी स्वर तेज सुनाई देते आ रहे है। कश्मीर में आतंकवादियों को जेहादी कार्यो में बाधा बनने वाले “सशस्त्र बल विशेषाधिकार कानून” (अफस्पा) को हटाने की बार-बार हो रही मांग भी इसी विचारधारा का भाग हो तो कोई अतिश्योक्ति नही।
हमारी केंद्रीय सरकार सीआरपीएफ के जवानों को धैर्यवान बनें रह कर निरंतर घायल होते रहने की बेड़ियों से कब मुक्त करेगी ? जबकि वर्षो बाद हमारी केंद्रीय सरकार ने दृढ इच्छाशक्ति का परिचय देते हुए सितंबर 2016 में पीओके में “सर्जिकल स्ट्राइक” करवाकर सेना का मनोबल बढ़ाया था। अब ऐसी परिस्थिति में हम जानते हुए भी पाकपरस्त आतंकियों व अलगाववादियों को प्रोत्साहित करने की आत्मघाती त्रुटि क्यो करना चाहते है ? क्या हिंसक के आगे अहिंसा का कोई अर्थ है ? ध्यान रखना होगा कि देश व देश की जनता की रक्षा करने वाले जवान जब अपनी रक्षा करने में ही विवश है तो फिर वह सम्पूर्ण राष्ट्र की सुरक्षा का दायित्व कैसे निभायेंगे ? इस प्रकार की विवशताओं से नागरिकों की सुरक्षा को संकट में नही डाला जा सकता। काश यह भी आज एक चुनावी मुद्दा बन जायें ?

विनोद कुमार सर्वोदय

1 COMMENT

  1. पाकिस्तान पहले पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर अर्थात (गिलगित, बालतिस्तान एवं आजाद कश्मीर) को एक सार्वभौम राष्ट्र का दर्जा दे. अगर पाकिस्तान प्रमाणिक ढंग से यह काम करता है तो हम भी उसका अनुसरण करेंगे.

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