समाज

सुविधा नहीं, गरीब के जीवन का आधार है राशन व्यवस्था

श्रुति कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार

भारत आज दुनिया की सबसे तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है। विकास, डिजिटलीकरण और कल्याणकारी योजनाओं की चर्चा देशभर में होती है, लेकिन क्या यह योजनाएं देश के ग्रामीण क्षेत्रों में एक समान रूप से सभी को लाभान्वित करती हैं? इस पर किसी का ध्यान नहीं जाता है. जबकि हकीकत यह है कि आज भी 

बिहार जैसे राज्यों के कई ऐसे ग्रामीण इलाके हैं, जहां हज़ारों गरीब परिवारों को राशन जैसी सुविधा समय पर नहीं मिल पाती है. जिन घरों की आय इतनी कम है कि रोज़ कमाकर रोज़ खाना बनता है, उनके लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) केवल एक सरकारी योजना नहीं, बल्कि जीवन का आधार है। जब राशन समय पर नहीं मिलता, कम मात्रा में मिलता है या बिना किसी स्पष्ट कारण के राशन कार्ड से किसी सदस्य का नाम काट दिया जाता है, तब इसका सबसे बड़ा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनके लिए दो वक़्त का भरपेट भोजन जुटाना भी किसी चुनौती से कम नहीं है।
बिहार के कई ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ऐसे परिवार रहते हैं जो गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन करते हैं। खेतिहर मजदूर, दिहाड़ी श्रमिक, भूमिहीन किसान और असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले लोग अक्सर अनिश्चित आय पर निर्भर रहते हैं। बरसात, बाढ़, सूखा या बीमारी जैसे हालात उनकी कमाई को और प्रभावित कर देते हैं। ऐसे समय में सरकारी राशन ही उनके घर का चूल्हा जलाए रखने का सबसे भरोसेमंद सहारा बनता है। यदि किसी महीने राशन मिलने में देरी हो जाए, तो परिवार को भूखे पेट सोने की नौबत तक आ जाती है।

एक आंकड़े के अनुसार बिहार में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग 8.7 करोड़ से अधिक लाभार्थियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से खाद्यान्न उपलब्ध कराया जाता है। राज्य सरकार के खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण विभाग के अनुसार, लगभग 2 करोड़ से अधिक राशन कार्ड राज्य में सक्रिय हैं, जिनके माध्यम से पात्र परिवारों को हर महीने प्रति व्यक्ति 5 किलोग्राम खाद्यान्न (चावल और गेहूँ) अत्यंत रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जाता है। वहीं अंत्योदय अन्न योजना (एएवाई) के अंतर्गत आने वाले अत्यंत गरीब परिवारों को प्रति परिवार 35 किलोग्राम खाद्यान्न दिया जाता है। यही व्यवस्था लाखों परिवारों के लिए खाद्य सुरक्षा की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है।

राशन कार्ड का महत्व केवल अनाज प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। आज यह अनेक सरकारी योजनाओं तक पहुँच का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन चुका है। पात्र परिवारों को राशन मिलने के साथ-साथ कई मामलों में आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य सुरक्षा का लाभ भी मिलता है। इसके अतिरिक्त कई सरकारी योजनाओं में पात्रता निर्धारित करने, पहचान प्रमाण के रूप में उपयोग करने तथा सामाजिक सुरक्षा योजनाओं से जोड़ने में भी राशन कार्ड महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यही कारण है कि यदि किसी व्यक्ति या परिवार का नाम राशन कार्ड से हट जाता है, तो उसका प्रभाव केवल भोजन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सरकारी सुविधाओं पर भी पड़ता है।

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब नाम दोबारा जुड़वाने के लिए गरीब परिवारों को अनावश्यक खर्च या रिश्वत देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। जिन लोगों के पास अपने बच्चों की पढ़ाई, दवा या भोजन के लिए पैसे नहीं होते, वे केवल अपने अधिकार को वापस पाने के लिए उधार लेकर भी रकम खर्च करने को विवश हो जाते हैं। यह केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है जो सबसे कमजोर लोगों की सुरक्षा के लिए बनाई गई है।

मुजफ्फरपुर सहित बिहार के कई ग्रामीण इलाकों में यह शिकायत भी सामने आती है कि उचित मूल्य की दुकानों पर राशन वितरण की तिथि को लेकर स्पष्ट जानकारी नहीं दी जाती। कहीं मशीन खराब होने का बहाना बनाया जाता है तो कहीं खाद्यान्न समय पर नहीं पहुँचने की बात कही जाती है। कई लाभार्थियों को कई बार दुकान तक आना-जाना पड़ता है। रोज़ मजदूरी करने वाले लोगों के लिए यह केवल आने-जाने का खर्च नहीं, बल्कि पूरे दिन की मजदूरी का नुकसान भी होता है। यदि एक व्यक्ति राशन लेने के लिए दो या तीन दिन तक काम छोड़ता है, तो उसके परिवार की आय पर सीधा असर पड़ता है।

डिजिटल व्यवस्था लागू होने के बाद पारदर्शिता बढ़ाने की कोशिशें अवश्य हुई हैं, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी समस्याएं भी सामने आती हैं। आधार प्रमाणीकरण में दिक्कत, इंटरनेट कनेक्टिविटी की कमी, बायोमेट्रिक मशीन का सही तरीके से काम न करना या बुजुर्गों और मेहनतकश लोगों के अंगूठे के निशान स्पष्ट न मिलने जैसी समस्याओं के कारण कई पात्र लाभार्थी राशन प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं। तकनीक का उद्देश्य सुविधा देना होना चाहिए, न कि पात्र व्यक्ति के अधिकार में बाधा बनना।

यह भी समझना आवश्यक है कि खाद्य सुरक्षा केवल भूख मिटाने का प्रश्न नहीं है। पर्याप्त और नियमित भोजन मिलने से बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास बेहतर होता है, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों का स्वास्थ्य सुरक्षित रहता है तथा परिवार आर्थिक संकट के समय भी सम्मान के साथ जीवन जी पाता है। इसके विपरीत यदि राशन व्यवस्था कमजोर होती है, तो कुपोषण, कर्ज़, असुरक्षा और सामाजिक असमानता जैसी समस्याएं और गहरी हो जाती हैं।

सरकार ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने के लिए अनेक सुधार किए हैं। ‘वन नेशन, वन राशन कार्ड’ जैसी व्यवस्था से प्रवासी मजदूरों को देश के किसी भी हिस्से में राशन प्राप्त करने की सुविधा मिली है। ई-पीओएस मशीनों और ऑनलाइन निगरानी प्रणाली से पारदर्शिता बढ़ाने का प्रयास भी हुआ है। फिर भी इन व्यवस्थाओं का वास्तविक लाभ तभी मिलेगा, जब अंतिम व्यक्ति तक समय पर, बिना भेदभाव और बिना भ्रष्टाचार के खाद्यान्न पहुँचे। जब तक हर गरीब परिवार को बिना बाधा, सम्मान पूर्वक और समय पर उसका राशन नहीं मिलेगा, तब तक खाद्य सुरक्षा का उद्देश्य अधूरा ही रहेगा।(यह लेखिका की निजी राय है)