दुर्गेश्वर राय
वर्ष 1930 में जब कनाडा के हेमिल्टन शहर में पहली बार ब्रिटिश एम्पायर गेम्स के रूप में बहु-खेल स्पर्धा की शुरुआत हुई थी, तब इसका उद्देश्य एक साझा ऐतिहासिक पहचान से जुड़े देशों को खेल के मंच पर एकत्र करना था। बीते लगभग एक शतक में यह आयोजन कई दौर से गुजरा। द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान 1942 और 1946 में इसका आयोजन नहीं हो सका, लेकिन उसके बाद से यह हर चार साल में नियमित रूप से आयोजित होता आ रहा है। नाम बदले, देश बढ़े और खेलों की संख्या भी लगातार बढ़ती गई। समय के साथ यह खेल महाकुंभ दुनिया के सबसे बड़े खेल आयोजनों में गिना जाने लगा। हाल ही में संपन्न हुए ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेल 2026 ने इस ऐतिहासिक परंपरा के सामने एक नया और बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है। यह आयोजन इतिहास में अपने पदकों या रिकॉर्ड्स से ज्यादा अपनी मजबूरी और अप्रत्याशित कटौती के लिए याद रखा जाएगा।
ग्लासगो 2026 की पृष्ठभूमि को समझे बिना इसके वर्तमान स्वरूप का आकलन अधूरा रहेगा। मूल रूप से इन खेलों की मेजबानी ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य को सौंपी गई थी। आयोजन के लिए बुनियादी ढांचे और सुरक्षा पर होने वाले अत्यधिक वित्तीय खर्च के अनुमान को देखते हुए विक्टोरिया ने अचानक मेजबानी से अपने हाथ पीछे खींच लिए। खेल पर रद्द होने का संकट मंडराने लगा। ऐसे समय में स्कॉटलैंड का ग्लासगो शहर बचाव के लिए आगे आया। ग्लासगो ने बिना किसी सार्वजनिक धन या नए निर्माण के इन खेलों को आयोजित करने की शर्त रखी। नतीजा यह हुआ कि पूरे खेल महाकुंभ को केवल चार मौजूदा खेल परिसरों में समेट दिया गया। बजट को सीमित करने के लिए प्रतिस्पर्धाओं और खेलों की संख्या में भारी कटौती करनी पड़ी।
इस कटौती का सबसे बड़ा असर उन पारंपरिक खेलों पर पड़ा जो वर्षों से राष्ट्रमंडल खेलों का मुख्य आकर्षण रहे हैं। ग्लासगो 2026 में केवल 10 मुख्य खेलों को ही जगह मिल सकी। बर्मिंघम 2022 की तुलना में कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, टेबल टेनिस, क्रिकेट, स्क्वैश, निशानेबाजी, तीरंदाजी, ट्रायथलॉन और रग्बी जैसे लोकप्रिय खेलों को पूरी तरह बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। राष्ट्रमंडल खेलों में एथलेटिक्स और तैराकी को छोड़कर किसी भी खेल का भविष्य कभी पूरी तरह स्थायी नहीं रहा है। रोइंग, टेनिस, निशानेबाजी और जूडो जैसे खेलों का अतीत भी जोड़ने और घटाने के इसी दौर से गुजरता रहा है। लेकिन एक साथ इतने विशाल और स्थापित खेलों को बाहर करना राष्ट्रमंडल के इतिहास में पहली बार हुआ।
खेलों की इस सूची के छोटा होने से पदक तालिका का संतुलन और कई देशों का खेल ढांचा प्रभावित हुआ। खासकर भारत जैसे देशों के लिए यह एक बड़ा झटका था। भारत के पारंपरिक ताकत वाले खेल जैसे कुश्ती, निशानेबाजी, बैडमिंटन और टेबल टेनिस सूची से गायब थे, जिनसे भारत को दर्जनों पदकों की उम्मीद रहती थी। इस विषम परिस्थिति के बावजूद भारतीय एथलीटों ने सीमित अवसरों में अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन दिया। भारत ने 13 स्वर्ण, 17 रजत और 9 कांस्य के साथ कुल 39 पदक जीतकर तालिका में चौथा स्थान हासिल किया। भारतीय दल के लिए सबसे शानदार प्रदर्शन मुक्केबाजी में रहा, जहाँ से 7 स्वर्ण और 3 रजत सहित सर्वाधिक 10 पदक आए। इसके अलावा भारोत्तोलन में मीराबाई चानू ने लगातार तीसरी बार स्वर्ण पदक जीतकर अपनी निरंतरता साबित की, जबकि एथलेटिक्स, जूडो और पैरा-स्पोर्ट्स में भी भारतीय खिलाड़ियों ने अपनी छाप छोड़ी।
सीमित विषयों और कम प्रतिस्पर्धाओं के बावजूद इस बार कई ऐतिहासिक रिकॉर्ड्स टूटे। ऑस्ट्रेलिया 70 स्वर्ण सहित 171 पदकों के साथ तालिका में शीर्ष पर रहा, जबकि इंग्लैंड और कनाडा ने क्रमशः दूसरा और तीसरा स्थान हासिल किया। खिलाड़ियों ने अपने कौशल के बल पर इस छोटे मंच को भी ऐतिहासिक बना दिया। पैरा-खेलों और ट्रैक साइकिलिंग में नए विश्व कीर्तिमान स्थापित हुए। नाइजीरिया की फोलाशादे ओलुवाफेमियायो ने पैरा-पावरलिफ्टिंग हैवीवेट श्रेणी में 175 किग्रा वजन उठाकर नया विश्व रिकॉर्ड बनाया। नाइजीरिया की ही रीता फर्डिनेंड ने प्लस 79 किग्रा वर्ग में 158 किग्रा उठाकर यह उपलब्धि हासिल की। एथलेटिक्स में नाइजीरिया की गुडनेस चिएमरी न्वाचुकवू ने डिस्कस थ्रो में 36.56 मीटर का थ्रो फेंककर विश्व रिकॉर्ड अपने नाम किया। इसके अलावा कई दशकों पुराने गेम्स रिकॉर्ड भी ध्वस्त हुए। स्कॉटलैंड के जोश केर ने पुरुषों की 1 मील दौड़ को 3 मिनट 54.12 सेकंड में पूरा करके वर्ष 1966 से चला आ रहा 60 साल पुराना गेम्स रिकॉर्ड तोड़ दिया। वहीं ऑस्ट्रेलिया के कर्टिस मार्शल ने पोल वॉल्ट में 5.85 मीटर की छलांग लगाकर नया गेम्स रिकॉर्ड बनाया।
इन रिकॉर्ड्स और पदकों से परे ग्लासगो 2026 हमें खेल आयोजनों के भविष्य पर गहराई से सोचने के लिए मजबूर करता है। आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो ग्लासगो ने दुनिया को सस्टेनेबल यानी टिकाऊ और कम खर्चीला खेल मॉडल दिखाया है। बड़े खेल आयोजनों के लिए अरबों डॉलर के नए स्टेडियम बनाना, एथलीट विलेज बसाना और बाद में उनका उपेक्षित रह जाना विकासशील या छोटे देशों के लिए एक बड़ा आर्थिक बोझ बन चुका था। ग्लासगो का यह मॉडल यह संदेश देता है कि बिना विशाल बजट के भी विश्वस्तरीय प्रतियोगिताएं आयोजित की जा सकती हैं। इससे भविष्य में उन देशों को भी मेजबानी की प्रेरणा मिलेगी जो वित्तीय संसाधनों की कमी के कारण पीछे हट जाते थे।
लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू उतना ही निराशाजनक है। जब किसी अंतरराष्ट्रीय मंच से कुश्ती, बैडमिंटन या हॉकी जैसे विश्व स्तरीय लोकप्रिय खेल हटा दिए जाते हैं, तो उस मंच की वैश्विक प्रासंगिकता पर सवाल उठने लगते हैं। राष्ट्रमंडल खेलों की विशिष्टता हमेशा इस बात में रही है कि यह ओलंपिक के बाद खिलाड़ियों को अपनी प्रतिभा साबित करने का सबसे बड़ा अवसर प्रदान करता था। यदि यह आयोजन केवल गिने-चुने खेलों तक सीमित होकर रह जाएगा, तो एथलीटों के लिए इसकी उपयोगिता कम होने लगेगी। खेल संघों को मिलने वाली स्पॉन्सरशिप और सरकारी बजटीय सहायता पर इसका सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
ग्लासगो का यह आयोजन राष्ट्रमंडल खेलों के इतिहास में एक नया मोड़ है। यह दिखाता है कि आधुनिक खेल तंत्र अब केवल भव्यता और फिजूलखर्ची पर नहीं चल सकता, उसे व्यावहारिकता और आर्थिक संतुलन की जरूरत है। लेकिन इस संतुलन को साधने की प्रक्रिया में खेलों की आत्मा और विविधता बलि नहीं चढ़नी चाहिए। आने वाले वर्षों में राष्ट्रमंडल खेल महासंघ को एक ऐसा बीच का रास्ता खोजना होगा, जहाँ बजट भी नियंत्रण में रहे और दुनिया भर के एथलीटों को उनकी मुख्य खेल विधाओं से वंचित भी न होना पड़े। तभी इस ऐतिहासिक खेल आयोजन का गौरव और भविष्य दोनों सुरक्षित रह पाएंगे।
दुर्गेश्वर राय