राजनीति

मौकापरस्त अखिलेश के पीडीए के हर बार क्यों बदल जाते हैं मायने

राजेश श्रीवास्तव

अखिलेश यादव गुरुवार को पंडित जनेश्वर मिश्र की जयंती पर ब्राह्मण सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे । उन्होंने ब्राहमणों की बड़ी जुटान देखकर कह दिया कि पीडीए का पीडी दरअसल पंडित का ही शार्ट है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ वह जिस समाज के बीच होते हैं, उसी के अनुसार पीडीए के मायने बदल लेते हैं। कभी वो पीडीए को पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक बताते हैं। कभी पी से पंडित, कभी पी से पिछड़ा, कभी पी से पीड़ित, कभी ए से अगड़ा, कभी ए से अल्पसंख्यक, कभी ए से अति पिछड़ा, कभी डी से दलित कभी डी से डेवलपमेंट । आखिर क्यों ऐसा है क्या अखिलेश को भी लगने लगा है कि अकेले पिछड़ा दलित और अल्पसंख्यक से उनकी सरकार नहीं बनने वाली है। या फिर वो कन्फ्यूज हैं या वह सभी समाज को बरगला रहे हैं. वह किसी के नहीं है क्योंकि कहा जाता है कि जो सबका होता है वह किसी का नहीं होता हालांकि राजनीति में यह लागू नहीं होता, यहा आप किसी के भी मत होईये लेकिन दिखाएँ कि आप सबके है।

 तो आखिर कन्फ्यूज अखिलेश यादव 2०27 में किसके सहारे वैतरिणी पार करने की रणनीति बना रहे हैं। ब्राहमणों को अखिलेश ने क्यों साधा, यह भी समझने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि पंडित के चक्कर में अखिलेश पिछड़े से हाथ धो बैठेंगे। बार-बार नाम बदलने की रणनीति कहीं अखिलेश को भारी तो नहीं पड़ जायेगी क्योंकि इसके जवाब में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां समाजवादी पार्टी के पीडीए की नई-नई राजनीतिक व्याख्याएं गढ़ते हुए कभी इसे ”परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी’’ तो कभी ”प्रोडक्शन हाउस ऑफ दंगाई एंड अपराधी’’ बताते हैं और उनके सामने अखिलेश की छवि अभी उतनी प्रभावी नहीं है। ऐसे में देखना होगा कि 2०27 के विधानसभा चुनाव में कहीं अखिलेश के पीडीए व योगी का पीडीए पलीता तो नहीं लगा देगा, या फिर अखिलेश का पीडीए योगी के पीडीए पर भारी पड़ेगा।

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले सियासी माहौल गर्म हो गया है। समाजवादी पार्टी ने बुधवार को लखनऊ में पार्टी के दिग्गज नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में साफ संकेत दिया कि इस बार उसकी नजर बीजेपी के कोर वोट बैंक पर है. अब सवाल उठ रहा है कि क्या सपा 1०० विधानसभा सीटों पर असर डालने वाले ब्राह्मण वोट में बंटवारा करा सकती है?

वहीं, कई लोग कहते हैं कि ये मुश्किल है। सामने भगवा वेशधारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हैं, संत समाज है, सनातन की बात करने वाली बीजेपी है और हिदू-हिदुत्व की सियासत हर बयान में दोहराई जाती है। परंपरागत रूप से दस में से आठ ब्राह्मण वोट बीजेपी को मिलते रहे हैं। ऐसे में सपा ब्राह्मण वोट की आहुति से सत्ता का हवन कर पाएगी? कहीं ऐसा तो नहीं कि पंडित के चक्कर में अखिलेश पिछड़े से हाथ धो बैठेंगे। बार-बार नाम बदलने की रणनीति कहीं अखिलेश को भारी तो नहीं पड़ जायेगी। 

इसी के जवाब में लखनऊ में पवन पांडेय, सनातन पांडेय, माता प्रसाद पांडेय, अभिषेक मिश्रा, करुणेश द्बिवेदी समेत तमाम युवा ब्राह्मण नेताओं की मौजूदगी में अखिलेश यादव ने त्रिशूल उठाया। छोटे लोहिया कहे जाने वाले जनेश्वर मिश्र की जयंती पर प्रबुद्ध सम्मेलन हुआ, डमरू बजा और शिव तांडव स्तोत्र का पाठ हुआ। इन सबके बीच अखिलेश यादव ने पिछड़े, दलित, अल्पसंख्यक के रूप में गढ़े गए पीडीए के ‘पी’ का नया रूप बताया।

अखिलेश ने कहा, ‘लोग पीडीए की बात करते हैं। पीडीए की नई-नई परिभाषा बनाते हैं। जबसे पीडीए से हारे हैं। तब से पीडीए की नई परिभाषा वो लोग बना रहे हैं। पीडीए में पीडी पंडित का ही शॉर्ट फॉर्म है. जो लोग पीडीए की परिभाषा समय-समय पर अलग बनाते हैं, वो जान ले पीडी ही पंडित का शॉर्ट फॉर्म है। जितनी पीड़ा दोगे, पीड़ा बढ़ाओगे, उतना ही पीडीए और मजबूत दिखाई देगा।

दरअसल जिस ब्राह्मण वोट को साधने की कोशिश में समाजवादी पार्टी लगी है, उससे जुड़े कुछ तथ्य पहले नोट कर लीजिए। यूपी में ब्राह्मण वोट पर राजनीतिक इतिहास का पहला तथ्य ये है कि ब्राह्मण कांग्रेस का मुख्य वोट बैंक माना जाता था। यूपी में अब तक 6 मुख्यमंत्री ब्राह्मण रहे और सभी कांग्रेस पार्टी से थे ब्राह्मणों ने 23 साल तक यूपी पर राज किया। आजादी के बाद राम मंदिर आंदोलन तक ब्राह्मण ज्यादातर कांग्रेस के साथ रहा। यूपी में आखिरी ब्राह्मण सीएम कांग्रेस के नारायण दत्त तिवारी थे।

यूपी में ब्राह्मण वोट पर राजनीतिक इतिहास का दूसरा तथ्य ये है कि राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण बीजेपी की तरफ आने लगे. 6 दिसंबर 1992 के बाद गठबंधन की राजनीति शुरू हो गई जिसकी वजह से ब्राह्मण वोट बंट गया। साल 2००7 में कई सालों बाद पूर्ण बहुमत की सरकार जब मायावती की बनी तो इसका पूरा श्रेय ब्राह्मणों को गया।

तीसरा तथ्य ब्राह्मण वोटों का ये है कि 2००7 से अब तक जिसके ब्राह्मण विधायक ज्यादा रहे हैं, यूपी में उसकी सत्ता रही है। साल 2००7 में मायावती के बीएसपी के 41 ब्राह्मण विधायक बने। 2०12 में समाजवादी पार्टी के 21 ब्राह्मण विधायक जीते थे। 2०17 में बीजेपी के 58 ब्राह्मण विधायक जीते, जबकि 2०22 में बीजेपी के 41 ब्राह्मण विधायक जीते हैं।

इन्हीं सब तथ्यों के बीच जब अखिलेश यादव मुस्लिम, यादव और फिर पिछड़े वोट के कुछ हिस्से के साथ अब सवर्णों में सबसे बड़े वर्ग ब्राह्मण वोट को हासिल करना चाहते हैं। इसीलिए कृष्ण और सुदामा की दोस्ती तक याद कराते हैं।

अखिलेश ने कहा, ‘भगवान कृष्ण और सुदामा की दोस्ती आज की नहीं है, बताओ कितने हजार साल पुरानी है, किस युग की है दोस्ती, कितने हजार साल पुरानी दोस्ती है। दोस्त हम लोग ऐसे भी होते हैं। परवाह नहीं करते, जिन्होंने महाभारत पढ़ी होगी। जिनको जानकारी होगी पौराणिक व्यवस्था का पता होगा। दुनिया में ऐसी दोस्ती कहीं और नहीं है। कृष्ण और सुदामा का दूसरा उदाहरण बता दो। समाजवादी पार्टी को जब भी मौका मिला है, हमने सम्मान देने का काम किया है।

उधर, समाजवादी पार्टी के इस सम्मेलन और रणनीति पर तीखा हमला बोलते हुए यूपी के डिप्टी सीएम और भाजपा के बड़े ब्राह्मण नेता ब्रजेश पाठक ने कहा कि सपा की हालत ‘सौ-सौ चूहे खा के बिल्ली हज को चली’ जैसी है। उन्होंने कहा कि जनता और चूहे इस बात पर कभी भरोसा नहीं करेंगे। पाठक ने आरोप लगाया कि सपा के शासनकाल में हमेशा गुंडागर्दी, अराजकता, दंगे, सर्व समाज का पतन और सनातन संस्कृति को ध्वस्त करने का काम हुआ है।

दूसरी ओर राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले को लेकर संसद से लेकर यूपी विधानसभा तक सियासी घमासान जारी है। लखनऊ विधानसभा के बाहर विपक्षी विधायक हाथों में दानपात्र और तख्तियां लेकर विरोध प्रदर्शन करते दिखे। मंगलवार को सदन से बाहर निकाले गए सपा विधायक सचिन यादव बुधवार को विधानसभा के बाहर धरने पर बैठ गए। सपा की नजर राम मंदिर विवाद और ब्राह्मण वोट बैंक को साधकर बीजेपी के हिदू वोट में सेंध लगाने पर है।

अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी बनाम अखिलेश की सियासत अब सीधे जातीय समीकरणों के अखाड़े में उतर चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां समाजवादी पार्टी के पीडीए की नई-नई राजनीतिक व्याख्याएं गढ़ते हुए कभी इसे ”परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी’’ तो कभी ”प्रोडक्शन हाउस ऑफ दंगाई एंड अपराधी’’ बताते हैं, वहीं अब अखिलेश यादव ने उसी पीडीए का नया अर्थ निकालकर भाजपा को उसी के अंदाज में जवाब दिया है। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि ”पीडीए में पीडी का मतलब पंडित है।’’ यानी जिस नारे को भाजपा लगातार निशाने पर ले रही थी, उसे सपा प्रमुख ने ब्राह्मण राजनीति के नए दरवाजे में बदलने की कोशिश कर दी।

दरअसल, अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र को समाजवादी आंदोलन का बड़ा चेहरा बताते हुए ब्राह्मण समाज को सम्मान देने का संदेश दिया और साफ संकेत दिया कि 2०27 की लड़ाई में सपा सिर्फ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि ब्राह्मण मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।

आपको बता दें कि ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश का यह नया दांव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह वर्ग लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहा है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में ब्राह्मण मतदाता मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ रहे। मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में उनका बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया और राम मंदिर आंदोलन ने इस रिश्ते को और मजबूत किया। हालांकि 2००7 में मायावती ने ”ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिग’’ के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर यह साबित कर दिया था कि ब्राह्मण वोट पूरी तरह किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं हैं लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद से ही यह वर्ग भाजपा के साथ रहा लेकिन तमाम कारणों के चलते ब्राह्मण भाजपा से नाराज बताये जा रहे हैं जिसके चलते अब एक बार फिर यही वर्ग सभी राजनीतिक दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।

यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी भी इस मुकाबले में पीछे नहीं है। मायावती पहले ही ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने और उन्हें सम्मानजनक भागीदारी देने की रणनीति का ऐलान कर चुकी हैं। उनका दावा है कि ब्राह्मणों सहित सवर्ण समाज के हित सबसे सुरक्षित बसपा में हैं और 2००7 जैसा समीकरण दोबारा बन सकता है। ऐसे में साफ है कि 2०27 के चुनाव में ब्राह्मण वोटों के लिए भाजपा, सपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।

उधर, उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र भी इसी राजनीतिक तल्खी की भेंट चढ़ गया। विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर लोकतंत्र और विकास विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अनुपूरक बजट, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने जैसे जनहित के मुद्दों पर चर्चा तक नहीं होने दी। योगी ने दावा किया कि उनकी सरकार ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने के साथ पांच लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा भी उपलब्ध कराई है, लेकिन विपक्ष का मकसद केवल व्यवधान पैदा करना था।

बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब नारे भी हथियार हैं और उनकी परिभाषाएं भी। योगी हर मौके पर पीडीए की नई व्याख्या गढ़कर सपा पर हमला बोल रहे हैं, तो अखिलेश उसी पीडीए में ”पंडित’’ जोड़कर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती भी ब्राह्मण कार्ड खेल चुकी हैं। ऐसे में यह साफ है कि अगले साल का विधानसभा चुनाव सिर्फ विकास और कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि नारों, जातीय समीकरणों और राजनीतिक प्रतीकों की जंग पर भी लड़ा जाएगा।

लेकिन यह भी समझना होगा कि ब्राह्मण किधर जायेगा, यह तय नहीं माना जा सकता। ब्राह्मण जब उस मायावती के साथ चला गया जिसने कभी नारा गढ़ा था कि तिलक तराजू और तलवार…। मतलब ब्राह्मण सम्मान का भूखा होता है लेकिन उसको अपनी प्रतिष्ठा और नाक का सवाल नहीं बनाता। उसे जहां लाभ दिखेगा, वहीं जायेगा।

राजेश श्रीवास्तव