मनोरंजन मीडिया

न्यूज़ रूम में ‘कोड’ का राज: क्या AI छीन लेगा खबरों की रूह?

संदर्भ:- विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस (3 मई)

मणिमाला शर्मा 

दुनिया साल 2026 में खड़ी है, जहाँ तकनीक ने मानव सभ्यता के हर पहलू को अपनी चपेट में ले लिया है।  भले ही आप इसे अच्छा कहें या बुरा , पर यह बात सच साबित हुई है । अब पत्रकारिता को ही ले लें ;जिसे कभी ‘इंसानी जज्बे’ और ‘नैतिक साहस’ का पेशा माना जाता था, आज एक बड़े संकट के मुहाने पर खड़ी है। वह संकट है;आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) आज जब हम विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि सत्ता पत्रकार को जेल भेज रही है या नहीं, बल्कि सवाल यह है कि क्या भविष्य में ‘पत्रकार’ नाम की कोई प्रजाति बचेगी भी या नहीं ? एल्गोरिदम और ‘कोड’ के इस दौर में खबरों की ‘रूह’ गायब हो रही है और उसकी जगह ले ली है डेटा के निर्जीव पहाड़ों ने। मशीनी युग के इस संक्रमण काल में पत्रकारिता का पूरा अस्तित्व ही दांव पर लगा हुआ है।

2026 के चुनावी मौसम में हमने देखा कि तकनीक कैसे एक ‘भस्मासुर’ बन सकती है। डीपफेक तकनीक ने वह कर दिखाया जो कभी असंभव लगता था। किसी भी सम्मानित पत्रकार या राजनेता का चेहरा और आवाज चुराकर उससे कुछ भी कहलवाया जा सकता है। जनता के लिए अब यह पहचानना नामुमकिन हो गया है कि स्क्रीन पर दिख रहा व्यक्ति सच बोल रहा है या वह किसी सॉफ़्टवेयर की खुराफात है। जब ‘सच’ को इतनी आसानी से बदला जा सकता हो, तो प्रेस की आजादी का मतलब ही क्या रह जाता है? प्रेस की आजादी का आधार ‘तथ्य’ होते हैं, लेकिन AI ने तथ्यों को ही ‘मशीनी खिलौना’ बना दिया है। आज फेक न्यूज़ किसी व्हाट्सएप ग्रुप से नहीं, बल्कि हाई-टेक लैब्स से निकलती है, जिसे पकड़ पाना इंसान के बस की बात नहीं रही। यह तकनीक प्रेस की विश्वसनीयता को दीमक की तरह चाट रही है और सच की अर्थी पर तकनीक का यह जश्न लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत तो कतई नहीं है।

भारत के बड़े मीडिया हाउस आज गर्व से कह रहे हैं कि वे AI का इस्तेमाल कर रहे हैं, लेकिन इसके पीछे का काला सच ‘कॉस्ट कटिंग’ और ‘छंटनी’ है। न्यूज़ रूम का यह ‘सफेद हाथी’ असल में ऑटोमेटेड जर्नलिज्म की अंधी दौड़ है। जो खबरें कभी एक पत्रकार अपनी संवेदनाओं और ज़मीनी समझ से लिखता था, अब वह काम ‘लार्ज लैंग्वेज मॉडल्स’ (LLMs) कर रहे हैं। मौसम का हाल, खेल के नतीजे और शेयर बाजार की खबरें अब मशीनें लिख रही हैं। और कुछ चेनल्स पर तो ए आई A I जनित एंकर जो बिल्कुल ह्यूमन एंकर जैसे हैं; मौसम का हाल दर्शकों को बता भी रहे हैं। समस्या यहाँ  यह नहीं है कि खबरें मशीन लिख रही हैं ।समस्या यह है कि मशीन के पास ‘विवेक’ (Conscience) नहीं होता। मशीन को यह नहीं पता कि किसी खबर का समाज पर क्या असर होगा। वह केवल डेटा प्रोसेस करती है।  यह बात हम सब भलीभाँति जानते और समझते हैं कि जब आप पत्रकारिता से मानवीय संवेदना को बाहर निकाल देते हैं, तो वह ‘न्यूज़’ नहीं रहती, वह केवल ‘इन्फॉर्मेशन’ बनकर रह जाती है। आज न्यूज़ रूम में पत्रकारों की जगह ‘प्रॉम्प्ट इंजीनियर्स’ ले रहे हैं, जिनका सरोकार जनता के दुख-दर्द से नहीं, बल्कि केवल क्लिक-थ्रू रेट (CTR) से है।

प्रेस की आजादी पर पहले हमला सरकारें करती थीं, अब ‘एल्गोरिदम’ करते हैं। गूगल, मेटा और एक्स (ट्विटर) के एल्गोरिदम आज तय करते हैं कि कौन सी खबर ट्रेंड करेगी और किसे ‘सेंसिटिव’ मानकर दबा दिया जाएगा। यह एक तरह की ‘अदृश्य तानाशाही’ है। यदि कोई स्वतंत्र पत्रकार किसी बड़े कॉर्पोरेट या शक्तिशाली नेता के खिलाफ रिपोर्ट लिखता है, तो उसे सीधे ब्लॉक नहीं किया जाता, बल्कि उसकी ‘रीच’ खत्म कर दी जाती है। इसे ‘शैडो बैनिंग’ कहते हैं। पत्रकार चिल्लाता रहता है, लेकिन उसकी आवाज जनता तक पहुँच ही नहीं पाती। 2026 में प्रेस की आजादी का मतलब अब केवल ‘बोलने की आजादी’ नहीं है, बल्कि ‘सुने जाने की आजादी’ भी है, जिसे बड़ी टेक कंपनियां अपनी जेब में लेकर घूम रही हैं। यह एल्गोरिदम की सेंसरशिप आज का नया डिजिटल पहरा है।

AI के दौर में पत्रकारिता और जासूसी के बीच की लकीर बहुत पतली हो गई है। पत्रकारों के डिजिटल फुटप्रिंट्स को ट्रैक करना अब बहुत आसान है। सत्ता और शक्तिशाली संगठन AI टूल्स का इस्तेमाल करके पत्रकारों की बातचीत, उनके स्रोत और उनकी अगली चाल का पता लगा लेते हैं। पेगासस जैसे सॉफ्टवेयर तो केवल शुरुआत थे, अब AI के जरिए बिना किसी ऐप के भी पत्रकारों की जासूसी मुमकिन है। जब पत्रकारों के ‘सोर्स’ सुरक्षित नहीं रहेंगे, तो खोजी पत्रकारिता पूरी तरह मर जाएगी। कोई भी व्हिसलब्लोअर अब किसी पत्रकार से बात करने की हिम्मत नहीं करेगा, क्योंकि उसे पता है कि ‘डिजिटल आई’ सब देख रही है। निजी डेटा का यह शिकार अंततः पत्रकारिता को एक जासूसी तंत्र में बदल देगा।

साथ ही, AI पत्रकारिता को ‘अति व्यावसायिक’ बना रहा है। आज खबरें जनता की जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि विज्ञापनदाताओं की पसंद के हिसाब से ‘कस्टमाइज’ की जा रही हैं। AI यह ट्रैक करता है कि आपको क्या पसंद है और फिर वही परोसता है। इससे ‘इको चैंबर’ पैदा हो रहे हैं। यानी आप केवल वही सच देख रहे हैं जो आप देखना चाहते हैं। अलग-अलग नजरिए खत्म हो रहे हैं। एक स्वतंत्र प्रेस का काम समाज को आईना दिखाना होता है, लेकिन AI उसे केवल ‘फिल्टर’ किया हुआ सच दिखा रहा है, जो नैतिकता के पतन और बाजार के दबाव का परिणाम है। भारतीय संदर्भ में तो न्यूज़ रूम एक ‘सर्कस’ बन गया है, जहाँ AI का इस्तेमाल ‘तमाशे’ के लिए ज्यादा हो रहा है। न्यूज़ चैनल्स ने ‘AI एंकर’ लॉन्च कर दिए हैं

जो कभी थकते नहीं, कभी बीमार नहीं होते और सबसे बड़ी बात, वे कभी सत्ता से ‘कड़वे सवाल’ नहीं पूछते। ये रोबोटिक एंकर वही पढ़ते हैं जो उनके सॉफ्टवेयर में फीड किया जाता है। यह पत्रकारिता का ‘मशीनीकरण’ है और उन युवा पत्रकारों के सपनों पर प्रहार है जो देश को बदलने का जज्बा लेकर इस पेशे में आए थे।

सवाल है कि क्या कोई रास्ता बचा है? क्या हम तकनीक के आगे घुटने टेक दें? बिल्कुल नहीं। रास्ता ‘को-एक्जिस्टेंस’ का है, लेकिन वह ‘पत्रकारिता की शर्तों’ पर होना चाहिए। तकनीक का इस्तेमाल डेटा जुटाने और रिसर्च में होना चाहिए, न कि पत्रकार के दिमाग को रिप्लेस करने में। आज पूरी दुनिया को ऐसे अंतरराष्ट्रीय कानूनों की जरूरत है जो ‘AI जनित कंटेंट’ पर लेबल लगाना अनिवार्य करें। सभी सरकारों को डीपफेक के खिलाफ सख्त कानून बनाने होंगे और टेक कंपनियों को उनकी जवाबदेही तय करनी होगी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जनता को समझना होगा कि ‘फ्री न्यूज़’ का लालच उन्हें ‘फेक न्यूज़’ की गर्त में धकेल रहा है। अच्छी पत्रकारिता के लिए कीमत चुकानी पड़ती है। यदि हम स्वतंत्र पत्रकारों का समर्थन नहीं करेंगे, तो हमें मशीनी खबरों के साथ जीने के लिए तैयार रहना चाहिए।

अंत में, लड़ाई ‘कलम’ और ‘कोड’ के बीच है। कोड के पास गति है, डेटा है, और असीमित शक्ति है। लेकिन कलम के पास वह ‘लहू’ है जो अन्याय देखकर खौलता है। पत्रकारिता केवल सूचनाओं का लेन-देन नहीं है, यह सत्ता की आँखों में आँखें डालकर सच बोलने का नाम है। एक मशीन कभी जेल नहीं जा सकती, एक मशीन कभी अन्याय के खिलाफ भूख हड़ताल नहीं कर सकती, और एक मशीन कभी उस ‘मजलूम’ के आंसू नहीं पोंछ सकती जिसकी जमीन छीनी गई हो। AI हमारे हाथ का औजार हो सकता है, लेकिन वह हमारा मस्तिष्क और हमारा दिल नहीं बन सकता। यदि हमने पत्रकारिता की ‘मानवीय रूह’ को बचा लिया, तभी हम प्रेस की असली आजादी का दावा कर पाएंगे। वरना, 2026 तो सिर्फ शुरुआत है, आने वाले समय में इतिहास केवल एल्गोरिदम के जरिए लिखा जाएगा, सच के जरिए नहीं।

मणिमाला शर्मा 

वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक