लेखक परिचय

अमलेन्दु उपाध्याय

अमलेन्दु उपाध्याय

लेखक राजनीतिक समीक्षक हैं और 'दि संडे पोस्ट' में सह संपादक हैं। संपर्क: एस सी टी लिमिटेड सी-15, मेरठ रोड इण्डस्ट्रियल एरिया गाजियाबाद मो 9953007626

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25rahul-ghandi_09071आजकल अपने राहुल बाबा की सादगी के चर्चे कुछ ज्यादा ही हो रहे हैं और सोने पर सुहागा यह है कि राहुल बाबा बिना बताए दलितों के घर भी पहुंच रहे हैं और उनके घर पर भोजन भी कर रहे हैं। जाहिर है यह सारी नौटंकी उत्तार प्रदेश में होने के कारण दलित की बेटी बहन मायावती का क्रोधित होना स्वाभाविक है। पिछले दिनों शताब्दी में आम आदमी बनकर यात्रा करने के बाद राहुल बाबा अचानक लखनऊ के निकट बाराबंकी जिले के रामनगर के पास एक दलित गांव में जा पहुंचे और लोकसभा चुनाव से पहले जिस तरह उन्होंने एडिसन के बल्ब की तरह ‘कलावती’ का आविष्कार किया था ठीक उसी तरह बाराबंकी में उन्होंने ‘जलवर्षा’ की सफल खोज की।

राहुल बाबा के इस महान कार्य की तारीफ होनी चाहिए थी, सो हुई और बहन जी को धाक्का लगना था, सो लगा ही। लेकिन इस तू-तू- मैं-मैं में असल सवाल पीछे छूटता जा रहा है कि राहुल बाबा के इस कलावती-जलवर्षा नाटक से आम दलितों का क्या भला हो रहा है? क्या इस नौटंकी से दलितों की रोजी रोटी के अवसर बढ़ गए? या दलितों को बराबरी का हक मिल गया? अगर ऐसा है या हमारे कांग्रेसी विद्वजन ऐसा मानते हैं तब तो मानना पड़ेगा कि राहुल बाबा कांग्रेस के सपूत हैं और जिस काम को इंदिरा और राजीव नहीं कर पाए उस काम को करके राहुल बाबा करके अपनी सात पुष्तों का प्रायश्चित कर रहे हैं।

युवराज ने बाराबंकी में ‘दलित ग्राम प्रधान’ के घर पर भोजन तो किया लेकिन वहां से 250 किमी दूर उस गोरखपुर जाने की जहमत नहीं उठा पाए जहां जापानी बुखार से तीन सौ से ज्यादा दलितों के बच्चे पिछले दो माह में ही मारे गए हैं। वैसे राहुल बाबा समझदार हैं इसीलिए वह दलितों के घर जाकर तो खाना खा रहे हैं, लेकिन किसी दलित को दस जनपथ लाकर खाना नहीं खिला रहे हैं। यह बात दीगर है कि दस जनपथ पर एक इफ्तार पार्टी पर ही लगभग एक करोड़ रूपया खर्च हो जाता है। क्या राहुल बाबा अपने दलित अभियान के तहत अगली यात्रा बिहार की करना चाहेंगे और वहां वह दलित जाति मुसहरों के टोले में रात गुजारेंगे और उनके साथ भोजन करके यह जानने का प्रयास भी करेंगे कि यह लोग जिस भोजन (चूहे) की वजह से जाने जाते हैं उसे और लोग क्यों नहीं खाते?

राहुल के इस नाटक में इतना जरूर हुआ कि वह सरकारी मशीनरी और अफसर (जो वैसे ही काम नहीं करते हैं) उन्हें अपनी कामचोरी छिपाने के लिए एक बहाना मिल गया कि वह तो राहुल की लोकेशन ढूंढने में व्यस्त थे।

जहां तक राहुल बाबा की सादगी का सवाल है तो यह सादगी तब शुरू हुई जब विदेशमंत्री कृष्णा और विदेश राज्य मंत्री शशि थरूर की विलासिता की पोल देश के सामने खुली कि किस तरह से ‘कांग्रेस का हाथ-आम आदमी के साथ’ का नारा देने वाले कांग्रेसी भद्रजन जनता की मेहनत की कमाई पर गुलछर्रे उड़ा रहे हैं। इससे पहले राहुल बाबा को भी सादगी याद नहीं आई थी अचानक सारे कांग्रेसियों के सिर पर सादगी का भूत सवार हो गया। उसके बाद राहुल बाबा ने शताब्दी में यात्रा की। उनकी शताब्दी यात्रा को मीडिया में प्रचारित किया गया कि राहुल ने आम आदमी की तरह शताब्दी में सफर किया। मुबारक हो! अब भद्र कांग्रेसजनों और उनके मीडियाई पिछलग्गुओं ने आम आदमी की परिभाषा भी बदल दी। अब आम आदमी शताब्दी में यात्रा करता है और विमान की इकॉनॉमी क्लास में मवेशी यात्रा करते हैं। इस हिसाब से पैसेंजर ट्रेन में या रेलगाड़ी के जनरल डिब्बे में कीड़े मकोड़े यात्रा करते हैं। यह एक षड्यन्त्र है। राहुल की शताब्दी यात्रा के बहाने आम आदमी की परिभाषा बदली जा रही है।

लेकिन यह राहुल गांधी का दुर्भाग्य है कि जब वह गांव में गए तो उन्हें लोगों ने पहचाना ही नहीं और उन्हें बताना पड़ा कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं। केवल यही एक घटना राहुल की सादगी की पोल पट्टी खोलने के लिए काफी है। क्या राजीव गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह इंदिरा गांधी के बेटे हैं? या इंदिरा गांधी को कभी बताने की जरूरत पड़ी थी कि वह जवाहर लाल नेहरू की बेटी हैं? लेकिन राहुल गांधी को बताना पड़ रहा है कि वह राजीव गांधी के बेटे हैं।

राहुल अपने नाटक से कांग्रेस के लिए ही मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं। अब अगर राहुल दलित इलाकों का विकास न होने के लिए कोस रहे हैं, तो किसको? इस देश पर पांच दशक तक तो कांग्रेस का ही शासन रहा। लिहाजा विकास न होने का दोश तो सबसे अधिक कांग्रेस के ही सिर पर है। फिर राहुल सवाल किससे कर रहे हैं?

रहा सवाल राहुल की सादगी का। तो मनोहर श्याम जोशी ने इंदिरा गांधी का एक बार साक्षात्कार लिया था जब इंदिरा जी प्रधानमंत्री थीं। जोशी जी ने कांग्रेसी नेताओं की सादगी पर उनसे सवाल पूछा तो इंदिरा जी ने जबाव दिया-”यह सही है कि कांग्रेस को सादगी और जनसेवा की दिशा में नेतृत्व देना चाहिए लेकिन जो लोग यह समझते हैं कि बंगला छोड़कर झोपड़ी में जा बसना चाहिए नेताओं को, वह बात एक दिखावटी शगल सी मालूम होती है। कुछ सहूलियतें जरूरी होती हैं सरकारी कामकाज के जिए, सुरक्षा और गोपनीयता के भी कुछ तकाजे होते हैं। उनके पूरे किए जाने का मतलब शानो-शौकत नहीं है। हां, उससे अधिक कुछ होता तो वह ठीक नहीं।” कुछ समझे राहुल बाबा! आपकी दादी स्व. इंदिरा जी आपकी सादगी को एक दिखावटी शगल बता रही हैं। इसलिए हे युवराज गरीबों पर दया करो, उनकी गरीबी का मजाक मत उड़ाओ!!!!!

-अमलेन्दु उपाध्‍याय

4 Responses to “क्या हासिल होगा इस सादगी से”

  1. rakesh kr upadhyay

    यह सही है की इस तरह के दिखावे से आम जनता को कुछ मिलने वाला नहीं है; मगर इसका एक सकारात्मक पक्ष भी है की लोगों के के बीच उपेषित पड़े मानव समाज की धारा में एक नया बहाव दिखाई दे रहा है .
    यद्यपि की आम जनता अब सजग है उसे बताने की जरूरत नहीं है क्या गलत है और क्या सही ?
    राजनितिक लाभ के लिए किये गए ये कदम आखिर कब तक ??????????

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