-ः ललित गर्ग:-
त्योहार खुशियां बांटने के लिए होते हैं, सांसों में जहर घोलने के लिए नहीं। दीपावली प्रकाश, प्रसन्नता, उल्लास और मंगलकामना का पर्व है, लेकिन यदि उत्सव की चमक के पीछे आसमान धुएं से भर जाए, बच्चों और बुजुर्गों का दम घुटने लगे तथा आम आदमी स्वच्छ हवा के लिए तरसने लगे तो हमें अपनी उत्सव परंपराओं और सामाजिक जिम्मेदारियों पर गंभीरता से विचार करना होगा। विडंबना यह है कि आज प्रदूषण जैसी जीवन-मरण की समस्या पर भी राजनीति का धुआं छाने लगा है। जब लोगों की सांसें संकट में हों, तब धर्म, जाति और राजनीतिक विचारधाराओं के चश्मे से समस्या को देखना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है, बल्कि सामाजिक संवेदनहीनता का प्रमाण भी है। अभिनेत्री और पर्यावरण कार्यकर्ता दीया मिर्जा ने पटाखों से होने वाले वायु एवं ध्वनि प्रदूषण के प्रति जागरूकता का संदेश दिया। बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) ने अपने पर्यावरण अनुकूल दीपावली अभियान में उनका वीडियो जारी किया, लेकिन राजनीतिक विवाद के बाद उसे हटा दिया गया। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदूषण के खिलाफ आवाज उठाना आखिर विवाद का विषय कैसे बन गया? किसी कलाकार का पर्यावरण संरक्षण के पक्ष में बोलना किसी धर्म या त्योहार का विरोध कैसे हो सकता है? मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा वीडियो दोबारा जारी करने का निर्देश इस बात का संदेश है कि जनहित की आवाज को राजनीतिक दबाव के आगे दबाया नहीं जाना चाहिए। पर्यावरण संरक्षण किसी व्यक्ति, दल या धर्म की जागीर नहीं, बल्कि समूचे समाज की साझा जिम्मेदारी है।
मुंबई का उदाहरण इस समस्या की गंभीरता को और उजागर करता है। सामान्यतः समुद्र की हवाओं और भौगोलिक स्थिति के कारण मुंबई को दिल्ली की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर वायु संचार का लाभ मिलता है, लेकिन अब वहां भी प्रदूषण का संकट गहराने लगा है। बीएमसी की पर्यावरण स्थिति रिपोर्ट 2025-26 के अनुसार, मुंबई के 14 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 13 पर पीएम-10 का वार्षिक औसत स्तर राष्ट्रीय निर्धारित सीमा 60 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक पाया गया। चेंबूर और बांद्रा-कुर्ला कॉम्प्लेक्स में यह स्तर 125 माइक्रोग्राम तक पहुंच गया। यह केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि महानगरीय विकास की उस दिशा पर प्रश्नचिह्न है जिसमें इमारतें तो ऊंची होती जा रही हैं, लेकिन लोगों के हिस्से की स्वच्छ हवा छोटी होती जा रही है। यह समझना आवश्यक है कि मुंबई हो या दिल्ली, प्रदूषण का पूरा दोष केवल दीपावली के पटाखों पर डालकर हम अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकते। निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, सड़कों पर जमा मिट्टी, वाहनों का धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना और कमजोर शहरी नियोजन इसके बड़े कारण हैं। पटाखे प्रदूषण की समस्या को त्योहारों के दौरान और गंभीर बनाते हैं, लेकिन प्रदूषण का स्रोत वर्षभर सक्रिय रहता है। इसलिए केवल दीपावली के आसपास प्रतिबंध लगाना और फिर शेष वर्ष आंखें मूंद लेना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि मौसमी सक्रियता का प्रदर्शन है। मुंबई में 13 निगरानी केंद्रों का राष्ट्रीय मानक से ऊपर होना बताता है कि समुद्री हवाओं के भरोसे पर्यावरण की रक्षा नहीं की जा सकती।
दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की स्थिति तो और भी चिंताजनक है। सर्दियों की शुरुआत होते ही तापमान में गिरावट, हवा की धीमी गति और वातावरण में प्रदूषकों के ठहराव से वायु गुणवत्ता तेजी से बिगड़ती है। दिल्ली, गाजियाबाद, नोएडा, गुरुग्राम और फरीदाबाद के नागरिक हर वर्ष इस जहरीले वातावरण का सामना करते हैं। सुबह की सैर स्वास्थ्य का माध्यम बनने के बजाय जोखिम बन जाती है। बच्चों को खांसी, बुजुर्गों को सांस लेने में परेशानी और पहले से बीमार लोगों को अस्पतालों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। जिस हवा में जीवन का संगीत होना चाहिए, उसमें जब प्रदूषण का जहर घुल जाए तो विकास के तमाम दावे बेमानी लगने लगते हैं। इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की सक्रियता महत्वपूर्ण है। न्यायालय ने दिल्ली-एनसीआर में दीपावली के अवसर पर केवल प्रमाणित हरित पटाखों की सीमित बिक्री और निर्धारित समय में उनके उपयोग की अस्थायी अनुमति दी है। 7 और 8 नवंबर के लिए निर्धारित समय सुबह 6 से 7 बजे तथा रात 8 से 10 बजे है। इसके बाद 9 नवंबर से पूर्ण प्रतिबंध फिर प्रभावी होना है। न्यायालय ने नियमों के उल्लंघन और पारंपरिक पटाखों को हरित पटाखों के नाम पर बेचने से रोकने के लिए सख्त निगरानी पर भी जोर दिया है। लेकिन प्रश्न यह है कि आदेश कागज पर सख्त और सड़कों पर बेअसर क्यों रह जाते हैं? हरित पटाखों की आड़ में पारंपरिक पटाखों की बिक्री, निर्धारित समय के बाद आतिशबाजी और प्रतिबंधित सामग्री का खुलेआम कारोबार प्रशासनिक व्यवस्था की पोल खोलता है। कानून बनाना पर्याप्त नहीं, उसका निष्पक्ष और कठोर क्रियान्वयन भी जरूरी है। यदि नियम तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण या प्रशासनिक उदासीनता का लाभ मिलता रहा तो न्यायालयों के निर्देश भी धुएं में उड़ते रहेंगे।
दीपावली के उत्सव को सीमित पटाखों, सामूहिक आतिशबाजी और पर्यावरण अनुकूल विकल्पों के साथ भी पूरे उल्लास से मनाया जा सकता है। उत्सव की सार्थकता शोर की तीव्रता में नहीं, बल्कि मन की प्रसन्नता और सामाजिक सद्भाव में है। यह किसी की धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं, बल्कि दूसरों के जीवन और स्वास्थ्य के अधिकार का सम्मान है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जब दीया मिर्जा जैसी अभिनेत्री पर्यावरण संरक्षण का संदेश देती हैं तो उनके संदेश को राजनीतिक विवाद में उलझा दिया जाता है। मुंबई उच्च न्यायालय ने 3 नवंबर को बीएमसी को उनका हटाया गया वीडियो दोबारा अपलोड करने का निर्देश दिया और स्पष्ट किया कि पर्यावरण के मुद्दे को राजनीतिक या सांप्रदायिक रंग देना अनुचित है। न्यायालय की यह टिप्पणी हमारे लोकतांत्रिक विवेक को झकझोरने वाली है।
आज आवश्यकता है कि सरकारें, न्यायपालिका, नगर निकाय, राजनीतिक दल, उद्योग जगत, सामाजिक संगठन और आम नागरिक एक साझा संकल्प के साथ आगे आएं। निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण हो, वाहनों के उत्सर्जन पर कठोर निगरानी हो, सार्वजनिक परिवहन मजबूत बने, कचरा जलाने पर रोक लगे और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों की जवाबदेही तय हो। साथ ही नागरिक भी पटाखों के अनावश्यक उपयोग, कचरा जलाने और निजी वाहनों के अंधाधुंध इस्तेमाल से बचें। अंततः सवाल यह नहीं है कि दीपावली पर पटाखे चलें या न चलें, सवाल यह है कि क्या हम आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ हवा और सुरक्षित जीवन दे पाएंगे? राजनीति की अपनी जगह है, धर्म और परंपराओं का अपना महत्व है, लेकिन जीवन से बड़ा कोई उत्सव और स्वास्थ्य से बड़ी कोई परंपरा नहीं हो सकती। याद रखना होगा कि प्रदूषण किसी की जाति, धर्म, भाषा या राजनीतिक विचारधारा देखकर फेफड़ों में प्रवेश नहीं करता। हवा सबकी साझा है और उसका संकट भी सबका साझा संकट है। दीपावली के दीप जलें, घर-आंगन रोशन हों, खुशियां बिखरें, लेकिन किसी की सांसों में अंधेरा न उतरे। प्रकाश का पर्व मनाएं, प्रदूषण का पर्व नहीं। यही समय की पुकार है और यही सच्चे उत्सव का विवेकपूर्ण अर्थ है।