-अशोक “प्रवृद्ध”
लेखक, आध्यात्मिक चिंतक व साहित्यकार
हिमालय केवल पाषाणों का समुच्चय नहीं, अपितु आर्यावर्त की आध्यात्मिक चेतना का मेरुदंड है। भारतीय पौराणिक ग्रंथों में हिमालय को देवात्मा कहा गया है। कुमारसंभवम् में महाकवि कालिदास उद्घोष करते हैं-
अस्त्युत्तरस्यां दिशि देवतात्मा हिमालयो नाम नगाधिराजः।
पूर्वापरौ तोयनिधी वगाह्य स्थितः पृथिव्या इव मानदण्डः।।
महाकवि कालिदास का यह श्लोक मात्र काव्योक्ति नहीं, अपितु आर्यावर्त की उस भौगोलिक और आध्यात्मिक मर्यादा का उद्घोष है, जिसका केंद्र बिंदु देवाधिदेव महादेव का वासस्थल कैलास मानसरोवर है। इसी पावन पथ की एक दुर्गम किंतु सामरिक कशेरुका है- लिपुलेख दर्रा। सम्प्रति, भारत और चीन के मध्य इस मार्ग से यात्रा के पुनरुद्धार की वार्ता ने दक्षिण एशिया की भू राजनीति में एक नवीन विमर्श को जन्म दिया है। यह विमर्श केवल पर्यटन या तीर्थाटन तक सीमित नहीं है, अपितु यह नेपाल की बालेन शाह सरकार के लिए वह अग्निपरीक्षा है, जहां राष्ट्रवाद, ऐतिहासिक साक्ष्य और अंतर्राष्ट्रीय संबंधों की त्रिवेणी एक जटिल भंवर उत्पन्न कर रही है। पौराणिक ग्रंथों में हिमालय के इस क्षेत्र को व्यास घाटी और मानस खंड के नाम से अभिहित किया गया है। स्कंद पुराण के मानस खंड के अनुसार जाह्नवी (गंगा) और काली नदी के मध्य का यह क्षेत्र ऋषियों की तपोभूमि है। पौराणिक कालक्रम के अनुसार इसी क्षेत्र में महर्षि वेदव्यास ने वेदों का संहिताकरण किया था। लिपुलेख दर्रा प्राचीन हिमवत पथ का वह द्वार है, जिसे पार कर ऋषियों और मुनियों ने त्रिविष्टप (तिब्बत) की ऊंचाइयों को स्पर्श किया। वायु पुराण और ब्रह्मांड पुराण में कैलास पर्वत की स्थिति और उसके पहुंच मार्ग का जो सूक्ष्म वर्णन प्राप्त होता है, वह लिपुलेख की वर्तमान भौगोलिक स्थिति से पूर्णतः मेल खाता है। प्राचीन काल में जब राष्ट्रों की सीमाएं आधुनिक मानचित्रों की कृत्रिम रेखाओं से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक प्रभाव क्षेत्र से निर्धारित होती थीं, तब लिपुलेख निर्विवाद रूप से आर्यावर्त की उत्तरी सीमा का रक्षक था। यहां की रंग (शौका) जनजाति, जो स्वयं को व्यास की संतान मानती है, सदियों से इस मार्ग की प्रहरी रही है। उनके लोकगीतों और जागरों में लिपुलेख को उस सेतु के रूप में वर्णित किया गया है, जो मर्त्यलोक को शिवलोक से जोड़ता है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में लिपुलेख का विवाद आधुनिक काल की उपज है। 1816 की सुगौली संधि, जो तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी और नेपाल के गोरखा राजाओं के मध्य हुई थी, आज इस विवाद की जड़ में है। संधि की धारा 5 के अनुसार नेपाल के राजा ने काली नदी के पश्चिम के क्षेत्रों पर अपना दावा त्याग दिया था। किन्तु काली नदी का उद्गम कहां है? यही वह प्रश्न है, जो आज एक कूटनीतिक गुत्थी बन गया है। भारत का पक्ष अत्यंत सुस्पष्ट और साक्ष्यों पर आधारित है। 1830, 1850 और 1870 के सर्वे के ब्रिटिश कालीन राजस्व अभिलेख यह प्रमाणित करते हैं कि कालापानी और लिपुलेख के क्षेत्र कुमाऊं प्रशासन के अंतर्गत थे। यहां के निवासियों ने सदैव भारत को कर (लगान) दिया है और भारतीय निर्वाचन प्रक्रियाओं में भाग लिया है। इसके विपरीत नेपाल का नवीन मानचित्र, जिसे वर्तमान बालेन सरकार और उनके पूर्ववर्ती शासकों ने राजनीतिक संजीवनी के रूप में प्रस्तुत किया है, नदी के एक वैकल्पिक स्रोत को आधार बनाकर इस पूरे क्षेत्र पर अपना दावा ठोकता है। नेपाल की राजनीति में बालेन शाह का उदय एक विद्रोही स्वर के रूप में हुआ है। उनकी कार्यशैली में उग्र राष्ट्रवाद और व्यवस्था विरोध का सम्मिश्रण है। लिपुलेख के मार्ग से भारत और चीन के बीच यात्रा और व्यापार का पुनः प्रारंभ होना, बालेन सरकार के लिए एक द्विआधारी संकट है। यदि बालेन सरकार इस त्रिपक्षीय संगम पर भारत और चीन के समझौतों का विरोध नहीं करती, तो उन पर राष्ट्रहित से समझौते का लांछन लगेगा, जो उनकी राजनीतिक छवि को धूमिल कर सकता है। नेपाल प्रायः भारत को संतुलित करने के लिए चीन कार्ड का उपयोग करता रहा है, किन्तु लिपुलेख के प्रश्न पर चीन का व्यवहार अत्यंत व्यावहारिक रहा है। 2015 में प्रधान मंत्री मोदी की चीन यात्रा के समय जब दोनों देशों ने लिपुलेख को व्यापारिक मार्ग बनाने पर सहमति दी थी, तब चीन ने नेपाल के विरोध को दरकिनार कर दिया था। बालेन शाह के लिए यह समझना दुष्कर है कि बीजिंग के लिए उसका व्यापारिक और सामरिक हित, काठमांडू की भावनाओं से अधिक मूल्यवान है।
लिपुलेख मात्र एक पहाड़ी दर्रा नहीं, अपितु तिब्बत के पठार पर दृष्टि रखने वाला भारत को वह सुविधाजनक स्थान प्रदान करता है, जहां से चीनी गतिविधियों की निगरानी सुगम हो जाती है। 2020 में सीमा सड़क संगठन द्वारा निर्मित धारचूला- लिपुलेख सड़क ने न केवल यात्रा समय को घटाया, बल्कि भारतीय सेना की लॉजिस्टिक्स क्षमता को भी सुदृढ़ किया। चीन की विस्तारवादी नीति और स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की घेराबंदी के प्रत्युत्तर में लिपुलेख भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति और सुरक्षा वास्तुकला का अभिन्न अंग है। ऐसे में, नेपाल का विरोध भारत को अपनी संप्रभुता और सुरक्षा चिंताओं के मध्य एक कठिन चुनाव करने पर विवश करता है, जिसका समाधान केवल कठोर कूटनीति में ही निहित है। राष्ट्र का अस्तित्व केवल उसकी सीमाओं से नहीं, बल्कि उसकी चिति से निर्धारित होता है। लिपुलेख के संदर्भ में शाश्वत सत्य यह है कि यह भूमि सांस्कृतिक रूप से भारत के मानस का अंश है। नेपाल की वर्तमान उत्तेजना के पीछे आंतरिक राजनीति की विफलताएं अधिक हैं। जब-जब नेपाल का शासक वर्ग अपनी जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने में असफल होता है, वह कालापानी-लिपुलेख के जिन्न को बाहर निकाल लाता है। बालेन शाह भी इसी परिपाटी के पथिक प्रतीत होते हैं, किन्तु उन्हें यह विस्मृत नहीं करना चाहिए कि अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में मानचित्रों की जिद भौगोलिक यथार्थ और ऐतिहासिक निरंतरता के सम्मुख पराजित हो जाती है।
भारत और चीन, वैश्विक व्यवस्था के दो उभरते ध्रुव हैं। यद्यपि उनके मध्य सीमा विवाद विद्यमान है, फिर भी आर्थिक और धार्मिक पर्यटन (कैलास यात्रा) के क्षेत्र में वे सहयोग की संभावनाएं तलाशते हैं। लिपुलेख इसी सहयोग का केंद्र है। यदि चीन इस मार्ग को मान्यता देता है, तो वह परोक्ष रूप से इस क्षेत्र पर भारत के प्रशासनिक नियंत्रण को स्वीकार करता है। यह स्थिति नेपाल की क्षेत्रीय संप्रभुता के दावों को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर एकाकी कर देती है। बालेन सरकार के लिए प्रश्न यह है कि क्या वे एक ऐसे क्षेत्र के लिए भारत और चीन, दोनों से संबंध बिगाड़ने का जोखिम उठाएंगे, जो पिछले 150 वर्षों से उनके प्रभावी नियंत्रण में नहीं रहा है? यहां अग्निपरीक्षा का अर्थ केवल विरोध दर्ज कराना नहीं, बल्कि उस विरोध की तार्किक परिणति तक पहुंचना है, जिसमें नेपाल वर्तमान में स्वयं को अक्षम पा रहा है। भारत के लिए लिपुलेख का अर्थ केवल किलोमीटर और सड़क नहीं है। यह उस सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक है, जहां अयोध्या से कैलास तक का मार्ग सुगम हो रहा है। भारत की विदेश नीति अब अपनी जड़ों की रक्षा के प्रति अधिक मुखर है। नेपाल को यह समझना होगा कि उसकी विशिष्ट पहचान भारत विरोध में नहीं, अपितु उस साझा विरासत में है, जिसका केंद्र हिमालय है। बालेन शाह की सरकार यदि केवल विरोध के लिए विरोध करती है, तो वह नेपाल के उन नागरिकों के हितों के साथ अन्याय करेगी, जो सीमा पार व्यापार और रोटी-बेटी के संबंधों पर आश्रित हैं।
लिपुलेख का विवाद अंततः सत्य की उसी कसौटी पर कसा जाएगा, जहां ऐतिहासिक प्रमाण और वर्तमान यथार्थ मिलते हैं। भारत और चीन का इस मार्ग को पुनः खोलना क्षेत्र में स्थिरता और समृद्धि का परिचायक है। बालेन सरकार की अग्निपरीक्षा का सफल परिणाम तभी संभव है, जब वे संकीर्ण राजनीति से ऊपर उठकर भौगोलिक यथार्थ को स्वीकार करें। लिपुलेख के पथ पर गूंजने वाला हर हर महादेव का उद्घोष यह सिद्ध करता है कि यह भूमि देवात्मा हिमालय की है, और यहां का प्रत्येक कण भारतीय चेतना का साक्षी है। राजनीति की रेखाएं बदल सकती हैं, मानचित्रों के रंग फीके पड़ सकते हैं, किन्तु महर्षि व्यास की यह तपोभूमि अपनी अस्मिता के साथ भारत के मस्तक पर सदा तिलक की भांति सुशोभित रहेगी। लिपुलेख पर नेपाल का दावा ऐतिहासिक रूप से तथ्यविहीन और कूटनीतिक रूप से चीन प्रेरित अधिक प्रतीत होता है। बालेन सरकार को अपनी ऊर्जा विरोध के स्थान पर द्विपक्षीय वार्ता और साझा सांस्कृतिक विकास पर केंद्रित करनी चाहिए, अन्यथा यह अग्निपरीक्षा उनके राजनीतिक पतन का मार्ग भी प्रशस्त कर सकती है।
वस्तुतः, लिपुलेख केवल एक भौगोलिक दर्रा या मानचित्र पर खींची गई कोई निर्जीव रेखा नहीं है, अपितु यह आर्यावर्त की उस सनातन चेतना का जीवंत साक्ष्य है, जिसने युगों-युगों से मानवता को कैलास की दिव्यता से जोड़ा है। ऐतिहासिक साक्ष्यों, पौराणिक संदर्भों और वर्तमान सामरिक यथार्थों के आलोक में यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र पर भारत की उपस्थिति मात्र प्रशासनिक नहीं, वरन सांस्कृतिक और सुरक्षात्मक अनिवार्यता है। बालेन शाह सरकार के लिए जो आज अग्निपरीक्षा का समय प्रतीत हो रहा है, वह वास्तव में नेपाल के राजनीतिक नेतृत्व के लिए आत्म अवलोकन का क्षण है। उग्र राष्ट्रवाद की बैसाखियों पर टिकी राजनीति क्षणिक जन उन्माद तो उत्पन्न कर सकती है, किन्तु वह दीर्घकालिक कूटनीतिक संबंधों और भौगोलिक सत्य की आधारशिला नहीं बन सकती। नेपाल को यह समझना होगा कि भारत के साथ उसका संबंध केवल संधियों का नहीं, अपितु साझा चिति और संस्कृति का है। लिपुलेख के मार्ग से कैलास यात्रा का पुनरुद्धार इस क्षेत्र में शांति, समृद्धि और आध्यात्मिक एकात्मकता का मार्ग प्रशस्त करेगा, जिसका लाभ अंततः संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र को ही मिलना है। सत्य कभी खंडित नहीं होता। भारत और चीन के मध्य इस मार्ग पर बढ़ती सहमति यह संकेत देती है कि वैश्विक राजनीति अब टकराव के स्थान पर सांस्कृतिक और आर्थिक सेतुओं के निर्माण की ओर अग्रसर है। नेपाल की बालेन सरकार को चाहिए कि वह इतिहास की धूल झाड़कर वर्तमान के उजियारे में देखे और इस मार्ग को विवाद का विषय बनाने के स्थान पर, इसे दक्षिण एशिया के आध्यात्मिक उदय के प्रवेश द्वार के रूप में स्वीकार करे। अंततः, लिपुलेख की दुर्गम ऊंचाइयों पर फहराता हुआ सत्य यही है कि यह भूमि देवात्मा हिमालय की है, और हिमालय का प्रत्येक स्पंदन भारतीय संस्कृति की रक्षा का वचन देता है। राजनीतिक व्यामोह के बादल छंटेंगे और अंततः वह शाश्वत सत्य ही शेष रहेगा जो कहता है- जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। भारत का पक्ष यहां केवल अपनी भूमि की रक्षा नहीं, अपितु उस देवपथ की रक्षा है जो सम्पूर्ण विश्व को महादेव के चरणों तक ले जाता है।