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मजदूर दिवस की कहानी : इतिहास, संघर्ष और अधिकारों की दास्तां

बाबूलाल नागा

   श्रमिकों के अधिकारों, सम्मान और एकजुटता का प्रतीक 1 मई यानी मई दिवस दुनिया भर के मजदूरों के लंबे संघर्षों की याद दिलाता है। आज जिस आठ घंटे के कार्यदिवस को सामान्य माना जाता है, वह मजदूरों को यूं ही नहीं मिला। इसके पीछे अनगिनत संघर्ष, हड़तालें, जेलें और शहादतें जुड़ी हैं।

   19वीं सदी में अमेरिका सहित कई देशों में मजदूरों से 14 से 18 घंटे तक काम कराया जाता था। काम के घंटों का कोई निश्चित नियम नहीं था। महिलाएं और बच्चे भी कठिन परिस्थितियों में लंबे समय तक काम करने को मजबूर थे। जो मजदूर विरोध करते, उन पर मालिकों के गुंडे, पुलिस और सेना तक छोड़ दी जाती थी।

   इन्हीं हालातों के खिलाफ अमेरिका के मजदूरों ने संगठित होकर आवाज उठाई। 1877 से 1886 के बीच आठ घंटे काम, आठ घंटे आराम और आठ घंटे अपने जीवन के लिए समय की मांग तेज होती गई। 1886 में देशभर में मजदूरों ने “आठ घंटे समितियां” बनाईं। इस आंदोलन का सबसे मजबूत केंद्र बना शिकागो।

  1 मई 1886 को अमेरिका के लाखों मजदूरों ने एक साथ हड़ताल शुरू कर दी। करीब 11 हजार फैक्ट्रियों के 3 लाख 80 हजार से अधिक मजदूर इसमें शामिल हुए। शिकागो में रेल यातायात ठप हो गया, कारखाने बंद हो गए और मजदूरों ने विशाल जुलूस निकाला।

   मजदूरों की बढ़ती ताकत से उद्योगपति घबरा उठे। अखबारों ने मजदूर आंदोलन को “लाल खतरा” बताकर प्रचार शुरू किया। शहर में भारी पुलिस बल तैनात किया गया। कुख्यात पिंकरटन एजेंसी के हथियारबंद गुंडों को भी मजदूरों पर हमला करने के लिए बुलाया गया।

   3 मई को शिकागो के मैकार्मिक हार्वेस्टिंग मशीन कंपनी के मजदूरों ने दो महीने से चल रहे लॉकआउट के खिलाफ प्रदर्शन किया। जब हड़ताली मजदूरों ने हड़ताल तोड़ने लाए गए लोगों के खिलाफ सभा शुरू की, तभी पुलिस ने निहत्थे मजदूरों पर गोलियाँ चला दीं। चार मजदूर मारे गए और कई घायल हुए।

   इस बर्बर दमन के विरोध में अगले दिन 4 मई की शाम को शिकागो के हेमार्केट स्क्वायर में जनसभा बुलाई गई।

   सभा में करीब तीन हजार लोग शामिल हुए। मजदूर नेताओं अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस और सैमुअल फील्डेन ने मजदूरों से एकजुट रहने की अपील की। रात लगभग दस बजे सभा समाप्ति की ओर थी, तभी 180 पुलिसकर्मियों का दल वहां पहुंचा और भीड़ को हटने का आदेश दिया।

   इसी दौरान अचानक एक बम फेंका गया। आज तक यह स्पष्ट नहीं हो सका कि बम किसने फेंका। कई इतिहासकारों का मानना है कि यह साजिश मजदूर आंदोलन को बदनाम करने के लिए रची गई थी। बम से एक पुलिसकर्मी मारा गया और कई घायल हुए।

   इसके बाद पुलिस ने चारों ओर से भीड़ पर अंधाधुंध गोलियां चलानी शुरू कर दीं। छह मजदूर मारे गए और 200 से अधिक घायल हुए। मजदूरों ने अपने खून से रंगे कपड़ों को ही झंडा बना लिया। यही लाल झंडा आगे चलकर मजदूर एकता का प्रतीक बना।

   हेमार्केट घटना के बाद शिकागो में मजदूर बस्तियों, दफ्तरों और छापाखानों पर छापे मारे गए। हजारों लोगों को गिरफ्तार किया गया। आठ मजदूर नेताओं पर हत्या का झूठा मुकदमा चलाया गया। अल्बर्ट पार्संस पुलिस से बच सकते थे, लेकिन उन्होंने अदालत में स्वयं पहुंचकर कहा— “मैं अपने बेकसूर साथियों के साथ कठघरे में खड़ा होने आया हूं ।”

   20 अगस्त 1887 को अदालत ने सात नेताओं को फांसी और एक को 15 साल कैद की सजा सुनाई।

   11 नवंबर 1887 मजदूर वर्ग के इतिहास में काला दिन बन गया। अल्बर्ट पार्संस, ऑगस्ट स्पाइस, एंजेल और फिशर को शिकागो की जेल में फांसी दे दी गई। बताया जाता है कि चारों नेता क्रांतिकारी गीत गाते हुए फांसी के तख्ते तक पहुंचे और पूरे साहस के साथ मौत का सामना किया। 13 नवंबर को उनकी शवयात्रा विशाल जनसैलाब में बदल गई। पांच लाख से अधिक लोग इन शहीद नेताओं को अंतिम सलाम देने सड़कों पर उमड़ पड़े।

   हेमार्केट शहीदों की याद में 1889 में अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन ने फैसला किया कि हर वर्ष 1 मई को अंतरराष्ट्रीय मजदूर दिवस मनाया जाएगा। तब से दुनिया भर में यह दिन मजदूरों के अधिकार, सम्मान, एकता और संघर्ष के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है।

   मई दिवस हमें याद दिलाता है कि अधिकार कभी दान में नहीं मिलते, उन्हें संघर्ष से हासिल करना पड़ता है। आठ घंटे काम का अधिकार, न्यूनतम वेतन, छुट्टी, सुरक्षा और सम्मान—इन सबके पीछे मजदूरों का लंबा संघर्ष छिपा है। आज भी जब श्रमिक अधिकारों पर खतरे बढ़ रहे हैं, तब मई दिवस की यह कहानी हमें एकजुट होकर न्याय और बराबरी की लड़ाई जारी रखने का संदेश देती है।

बाबूलाल नागा