पर्यावरण लेख

नेपाल की त्रासदी से जम्मू-कश्मीर में भी लैंडस्लाइड का भय सताने लगा है


रामस्वरूप रावतसरे

    नेपाल में हालिया तबाही की तस्वीरें अभी आ ही रही हैं कि जम्मू-कश्मीर को लेकर एक नई चेतावनी ने चिंता बढ़ा दी है। यूनिवर्सिटी ऑफ जम्मू के वैज्ञानिकों की नई स्टडी में सामने आया है कि जम्मू-कश्मीर के बड़े हिस्से की जमीन लैंडस्लाइड के लिहाज से संवेदनशील है। करीब 43 हजार वर्ग किलोमीटर क्षेत्र की स्टडी की गई। इसमें 24.4 प्रतिशत इलाका हाई रिस्क और 3.6 प्रतिशत बहुत ज्यादा जोखिम वाले जोन में मिला। यानी पहाड़ों में खतरा छोटा नहीं है। खासकर डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और रामबन जिले ज्यादा संवेदनशील बताए गए हैं। इन इलाकों से गुजरने वाली कई अहम सड़कें भी खतरे के दायरे में आती हैं।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिकों ने साफ कहा है कि लैंडस्लाइड का सटीक समय और स्थान पहले से बताना संभव नहीं है। स्टडी का मकसद यह पता लगाना है कि किन इलाकों में जमीन खिसकने की संभावना ज्यादा है। रिसर्च में 669 पुराने लैंडस्लाइड मामलों को भी देखा गया। इनमें से 87 प्रतिशत घटनाएं ऐसे इलाकों में हुईं, जिन्हें हाई या वेरी हाई सस्पेक्टिबिलिटी जोन में रखा गया था। इससे मैप की अहमियत और बढ़ जाती है। अब प्रशासन इन इलाकों में पहले से निगरानी और बचाव की तैयारी कर सकता है।
स्टडी के मुताबिक डोडा, किश्तवाड़, पुंछ, राजौरी और रामबन में लैंडस्लाइड का खतरा ज्यादा है। इन जिलों में पहाड़ी ढलान तेज हैं और कई जगहों पर भूगर्भीय संरचना कमजोर है। इसके अलावा सड़क निर्माण, पहाड़ों की कटिंग और पेड़ों की कमी भी ढलानों को अस्थिर कर सकती है। यानी प्राकृतिक खतरे के साथ इंसानी गतिविधियां भी जोखिम बढ़ा रही हैं। स्टडी में खास तौर पर एनएच-44, एनएच-244, एनएच-144।, मुगल रोड और किश्तवाड़-केलोंग रोड के आसपास कई संवेदनशील क्षेत्र सामने आए हैं। एनएच-44 जम्मू को कश्मीर से जोड़ने वाला प्रमुख हाईवे है। वहीं एनएच-244 डोडा और किश्तवाड़ के पहाड़ी इलाकों से गुजरता है। ऐसे में इन सड़कों पर लैंडस्लाइड का असर सिर्फ पहाड़ी गांवों तक सीमित नहीं रहेगा। यातायात और जरूरी सेवाएं भी प्रभावित हो सकती हैं।
वैज्ञानिकों ने लैंडस्लाइड के पीछे कई कारणों का विश्लेषण किया। इनमें सड़क से दूरी, ढलान और जलधाराओं से दूरी तीन सबसे अहम कारक सामने आए। सड़क के करीब के इलाके खास तौर पर संवेदनशील पाए गए। वजह यह है कि पहाड़ काटकर सड़क बनाने से प्राकृतिक ढलान की स्थिरता प्रभावित हो सकती है। पेड़-पौधों की कमी भी मिट्टी को बांधे रखने की क्षमता घटाती है। भारी बारिश पहले से कमजोर ढलानों के लिए बड़ा ट्रिगर बन सकती है। लगातार बारिश होने पर पानी मिट्टी और चट्टानों के भीतर पहुंचता है। इससे जमीन कमजोर हो सकती है। ऐसी स्थिति में अस्थिर ढलान अचानक खिसक सकता हैं वैज्ञानिकों ने इसी वजह से संवेदनशील इलाकों में बारिश के दौरान निगरानी बढ़ाने और पहले से तैयारी रखने पर जोर दिया है।
जानकारी के अनुसार रिसर्च टीम ने सैटेलाइट इमेजरी, फील्ड सर्वे और पुराने लैंडस्लाइड रिकॉर्ड का इस्तेमाल किया। 669 दर्ज घटनाओं में से 87 प्रतिशत हाई या वेरी हाई सस्पेक्टिबिलिटी वाले इलाकों में हुईं। इस आंकड़े से पता चलता है कि रिस्क मैपिंग सिर्फ कागज पर बनी तस्वीर नहीं है। यह पुराने घटनाक्रम से भी काफी हद तक मेल खाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इस मैप का इस्तेमाल संवेदनशील इलाकों की पहचान और आपदा तैयारी में किया जा सकता है।
नेपाल में 26 अगस्त को हुए बर्फ और चट्टान के ढहने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने हिमालयी इलाकों की नाजुक स्थिति फिर सामने रख दी है। जम्मू-कश्मीर की यह स्टडी उस घटना की सीधी भविष्यवाणी नहीं करती। लेकिन दोनों घटनाएं एक बात जरूर याद दिलाती हैं कि पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक ढलानों की निगरानी कितनी जरूरी है। वैज्ञानिकों ने भी कहा है कि जोखिम का आकलन किया जा सकता है और उसी आधार पर सावधानी बढ़ाई जा सकती है।
जानकारों की माने तो रिसर्च के अनुसार तैयार किया गया लैंडस्लाइड सस्पेक्टिबिलिटी मैप प्रशासन के लिए उपयोगी टूल साबित हो सकता है। इससे हाई रिस्क इलाकों में निगरानी बढ़ाई जा सकती है। सड़क निर्माण के दौरान ज्यादा सावधानी बरती जा सकती है। कमजोर ढलानों को स्थिर करने के उपाय भी प्राथमिकता से किए जा सकते हैं। वैज्ञानिकों की सलाह साफ है कि लैंडस्लाइड का सटीक वक्त बताना मुश्किल है लेकिन खतरे वाले इलाकों को पहचान कर नुकसान कम करने की तैयारी जरूर की जा सकती है।