राजनीति

बाँटने की ऐसी पराकाष्ठा

वीरेन्द्र सिंह परिहार

          तेलंगाना के कांग्रेसी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने गत दिनों कुछ ऐसी बात कही जिसकी प्रत्याशा शायद ही किसी को रही हो। उन्हेांने कहा कि राम उत्तर भारतीयों के देवता हैं और शिव दक्षिण भारतीयों के देवता हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने बंटवारे पर बंटवारा करते हुये कहा कि राम अमीरों के और शिव गरीबों के देवता हैं। उन्होंने भाजपा पर राम पर कब्जा करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने यह भी कहा कि प्रधानमंत्री मोदी आये दिन जय श्री राम का नारा लगाते हैं, पर ‘हर-हर महादेव’ का नारा कभी नहीं लगाते। यहाँ पर यह बताना आवश्यक है कि जहाँ तक प्रधानमंत्री मोदी का सवाल है, वह उतने ही शिव-भक्त हैं, जितने राम-भक्त। पता नहीं उन्होंने कितनी बार सार्वजनिक रूप से हर-हर महादेव और ओम् पार्वती पतये नमः का उद्घोष किया है। देश के प्रमुख ज्योतिर्लिंगो जैसे काशी-विश्वनाथ, केदारनाथ आदि का कलेवर ही बदल दिया है, जिसमें वहाँ अब तीर्थ यात्रियों को दर्शन सुगमता से तो मिलने ही लगता है, साथ ही उनकी संख्या भी बहुत ज्यादा बढ़ गई है जिसका एक विशेष परिणाम यह हुआ है कि ऐसी जगहों पर लोगो को रोजगार के अवसर बहुत बढ़ गये हैं पर विडम्बना यह कि इस देश में एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे न तो प्रधानमंत्री मोदी की कोई विशेषता दिखाई पड़ती और न ही मोदी सरकार की किसी उपलब्धि को देखने-सुनने को तैयार हैं। महाकवि तुलसीदास के शब्दो में उनकी स्थिति वही है, ‘‘मूदहुँ आँख कतहु कोउ नाही।’’

          अब जहाँ तक रेवंत रेड्डी के इस कथन का सवाल है कि राम मात्र उत्तर भारतीयों के देवता हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि दक्षिण में गोदावरी के तट पर श्री सीता रामचन्द्र स्वामी मंदिर उल्लेखनीय है जिसे दक्षिण का अयोध्या भी कहा जाता है। द्रविण आन्दोलन के क्षेत्र तमिलनाडु के कुम्भकोणम में रामस्वामी नाम से राम का प्रसिद्ध मंदिर है। त्रिपयार (केरल) में सबसे प्राचीन और सम्मानित श्री राम मंदिर है। आन्ध्रप्रदेश में कोदण्डाराम मंदिर प्रेसिद्ध है। हप्पी के प्राचीन खण्डहरों के पास श्री राम का मन्द्राचलम मंदिर प्रसिद्ध है। मान्यता है कि यही राम और सुग्रीव की भेंट हुई थी। इसके अलावा भी राम जिन विष्णु के अवतार माने जाते हैं, उनके व्यंकेटेश्वर और पद्मनाभ मंदिर दक्षिण में ही स्थित हैं जिनमें तिरुपति का बेंकटेश्वर मंदिर में तो सबसे ज्यादा रिकार्ड तीर्थयात्री दर्शनों को पहुँचते हैं। अब रहा सवाल इस बात का कि शिव मात्र दक्षिण भारतीयों के आराध्य हैं, उत्तर भारतीयों के नहीं, तो यह सभी को पता है कि पूरे देश में स्थित 12 ज्योतिर्लिंगों में मात्र 2 ही रामेश्वरम् और मल्लिकार्जुन ही दक्षिण भारत में स्थित हैं। शेष 10 ज्योर्तिलिंग उत्तर भारत जिसे प्राचीन भारत में आर्यावर्त के नाम से जाना जाता था, स्थित हैं। इसी से समझा जा सकता है कि शिव और राम का इस तरह से उत्तर और दक्षिण के मध्य विभाजन कितना निराधार और प्रायोजित दिखता है।

वस्तुतः हमारी भारतीय अस्मिता में शिव और राम मूलतः एक ही हैं। दोनो ही एक-दूसरे को अपना इष्टदेव मानते हैं। शिव जहाँ राम-राम जपते रहते हैं, वहीं राम रामेश्वर में रामेश्वरम् ज्योतिर्लिंग की स्थापना करते है। रामेश्वरम् से ही प्रकट हैं कि राम के ईश्वर। इतना ही नहीं, राम पूरी ताकत से यह उद्घोष करते हैं- ‘‘शिवद्रोही मम दास कहावा, सो नर सपनेहू मोहि न भावा।’’ यह उत्तर और दक्षिण के एक होने का ही प्रमाण है कि गंगोत्री का अथवा गंगाजल रामेश्वर में चढ़ाना मुक्ति का साधन माना गया है। रेवंत रेड्डी जैसे लोगो को यह भी पता होना चाहिए कि अयोध्या के राम मंदिर में राम की मूर्ति दक्षिण के ही काले पत्थरों एवं दक्षिण भारतीय स्टाइल में ही बनाई गई है। इससे यह पूरी तरह प्रमाणित है कि सम्पूर्ण भारत एक है। सुदूर दक्षिण में जन्मे आचार्य शंकर ने भेदभाव मिटाने और एकत्व स्थापित करने के लिये ही देश के चारों कोनों में उत्तर-दक्षिण, पूरब-पश्चिम में सिर्फ चार मठ ही नहीं बनाये बल्कि बद्रीनाथ में केरल के नम्बूदरी ब्राम्हण को प्रमुख रूप से पूजा पाठ करने का अधिकार और रामेश्वरम् में उत्तर भारतीय ब्राम्हणों को पूजा पाठ देने की प्रथा, वस्तुतः राष्ट्रीय एकात्मता की ही दृष्टि थी। इतना ही नहीं, आचार्य शंकर ने जिस पंचायतन पूजा की शुरूआत की, उसमें शिव और विष्णु, राम जिनके अवतार हैं- उन दोनो को ही स्थान दिया था।

  सच्चाई यह भी है कि राम भक्ति के सर्वप्रथम पुष्ट प्रमाण उत्तर में नहीं, दक्षिण के आलवार संतो में देखने को मिलता है। त्रावणकोट के कुलशंखर आलवार जो नौवीं सदी के माने जाते हैं, उनकी रचनाओं का पांचवा अंश रामावतार से सम्बन्ध रखता है। जिसमें अपने इष्टदेव राम के प्रति अत्यंत कोमल और गम्भीर भक्ति प्रदर्शित की गई है। रामानंद जैसे संत राम भक्ति का प्रचार करने के पूर्व दक्षिण में रह आये थे। तभी तो कहा गया- ‘भक्ति द्रविण उपजी, लाये रामानंद।’ भक्ति को प्रधानता देने वाले रामानुज, मध्व, निम्बार्क और वल्लभाचार्य सभी दक्षिण के ही रहने वाले थे।

          भारतीय वागमय के राम की स्वीकृति और व्यापकता इतनी व्यापक है कि जातक कथाओं के अनुसार बुद्ध अपने पूर्व जन्म में एक बार राम होकर भी जन्मे और जैन ग्रंथो में तिरसठ महापुरूषों में राम और लक्ष्मण भी शामिल हैं। देश में रामकथा को लेकर भारत की सभी प्रमुख भाषाओं मं रामायणों की रचना हुई जो अपने-अपने क्षेत्रों मे अत्यन्त लोकप्रिय हुई। उक्त सभी रामायणों के प्रचार के चलते भारतीय संस्कृति की एकरूपता में बहुत वृद्धि हुई। तभी तो राम को सिर्फ उत्तर भारत ही नहीं, सम्पूर्ण भारत की संस्कृति का पहचान कहा जाता है। जबसे अयोध्या में भव्य राम मंदिर बना है, तभी से दक्षिण भारत के हजारों तीर्थयात्री अयोध्या में राम दर्शनों के लिये पहुँच रहे हैं। जहाँ तक विभिन्न भाषाओं में रामायण की रचना का सवाल है, उसमें बाल्मीकि की संस्कृत भाषा में मूल रामायण के अलावा तमिल में कंबन कृत, तेलगू में द्विपाद रामायण, मलयालम में रामचरित, कन्नड में तोरवे रामायण, उड़िया में बलरामदाम रामायण, मराठी में भावार्थ रामायण के अलावा 16वीं सदी में अवधी भाषा में रचित ‘रामचरित मानस’ अत्यन्त लोकप्रिय है। सिर्फ भारत ही नहीं, इसके साथ तिब्बत, सिहल, खोतान, हिन्दचीन, श्याम, थाईलैण्ड, बम्ह देश, इंडोनेशिया में भी रामकथा का व्यापक स्तर पर प्रसार हुआ। जिसका प्रभाव अभी तक कायम है। इंडोनेशिया जैसे मुस्लिम देश में राम कथाओं का मंचन अब भी बहुत लोकप्रिय है। विष्णु की सवारी गरूण के नाम से ही वहाँ के एयरवेज हैं। इंडोनेशिया के राष्ट्रपति रहे डा0 सुकर्णों ने एक बार स्पष्ट रूप से कहा था कि सम्प्रदाय बदल जाने से पुरखे नहीं बदल जाते। यानी वहाँ पर राम की गिनती महान पूर्वज में की जाती है।

        

  राष्ट्र कवि कहे जाने वाले रामधारी सिंह दिनकर के शब्दो में- ‘‘बड़ा ऐतिहासिक तथ्य यह भी कि रामकथा के चलते ही शैव और वैष्णव का विभेद दूर हुआ। आगे चलकर तो रामकथा शिव की भक्ति में एकाकार हो गई। राम का रामेश्वरम में शिव की प्रतिष्ठा कराना तथा हनुमान को एकादस रूद्र का अवतार माना जाना इसका प्रमाण है। कालक्रम में रामकथा का ऐसा विकास और विस्तार कि शैव और वैष्णव मतों की भिन्नता जाती रही। राम एक ऐसे चरित्र हैं जो बाम्हण धर्म में विष्णु के अवतार, बौद्ध धर्म में बोधिसत्व और जैन धर्म में आठवें बलदेव के रूप में प्रतिष्ठित हुये और आगे चलकर उनकी भक्ति में शिव भक्ति की लय हो गई।’’ रेवंत रेड्डी जैसे लोगो को पंडित नेहरू का तत्कालीन राष्ट्रपति डा0 राजेश प्रसाद की नवनिर्मित सोमनाथ मंदिर के उद्घाटन में जाने से रोकने का प्रयास में कोई शिव विरोधी कदम नहीं दिखता। पर जो मोदी प्रधानमंत्री केदारनाथ मंदिर में जाकर और वहाँ की गुफा में शिव का ध्यान लगाते हैं, वह प्रकारान्तर से शिव विरोधी है।

          इसके साथ यह भी कथन कि राम अमीरों के और शिव गरीबों के देवता हैं, पूरी तरह गलत है। पूरे देश के पता नहीं कितने राजा-महाराजा शिवभक्त थे। मेवाड़ के सिसोदिया राजघराने में एकलिंग (शिव) ही राज सिंहासन पर प्रतिष्ठित होते थे और राजा उनके प्रतिनिधि के तौर पर राजकाज चलाता था। पूरे उत्तर भारत में जब राजपूत सेनाएं विदेशी आक्रान्ताओं का सामना करती थी, तो हर-हर महादेव का उद्घोष ही उनको शक्ति देता था और मनोबल बढ़ाता था। वस्तुतः रेवंत रेड्डी अपने नेता राहुल गाँधी की लिखी स्किप्ट को ही पढ़ रहे हैं, जो हर जगह हिन्दू धर्म के विभाजन और बंटवारे की बातें करते हैं। कांग्रेस पार्टी को 12 वर्षों से अधिक केन्द्रीय सत्ता से दूर रहने पर ऐसा लगता है कि अब सत्ता में आने के लिये अंग्रेजो की तर्ज पर ‘फूट डालो और राज करो’ की नीति के अलावा कोई विकल्प नहीं है। तभी तो यह काले अंग्रेज अब भगवानों का भी विभाजन (बटवारा) करने लगे हैं। यद्यपि बंटवारे की राजनीति ऐसे लोग लम्बे समय से करते आ रहे हैं पर अब हताशा और निराशा में यह कुछ भी साय-पटाय बोल रहे हैं। तभी तो रेवंत रेड्डी जैसे लोग कहते हैं कि यदि उन्हें कोई रेवत्तूद्दीन कहे तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। यह वैसी ही बात है जैसा कांग्रेस पार्टी के एक नेता ने कभी कहा था कि यदि देश में गुसलमानों का बहुमत आ भी गया तो क्या फर्क पड़ता है ? ऐसे लोग 800 वर्षों की मुसलमानों की गुलामी और यहाँ तक कि देश के बंटवारे से लेकर पाकिस्तान, बाग्लादेश, कश्मीर घाटी में हिन्दुओं की दुर्दशा देख कर भी अनदेखा करना चाहते हैं। कुल मिलाकर रेवंत रेड्डी का कथन बंटवारे की वही पुनरावृत्ति थी जो अंग्रेजो के समय से लेकर स्वतंत्र भारत तक द्रविण राजनीति के तहत आर्य बनाम द्रविण की थ्योरी उछाली गई थी और द्रविणों को देश का मूल निवासी और आर्यों को आक्रमणकारी बताने का एक अच्छा-खासा नैरेटिव खड़ा किया गया था, जो इधर कई शोधो में पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है।

          देश के प्रसिद्ध समाजवादी नेता डा0 राममनोहर लोहिया ने कहा था- ‘‘हे भारत माता! हमे शिव का शिव का मस्तिष्क दो, कृष्ण का ह्रदय  दो और राम का कर्म और वचन दो।’’ उनकी दृष्टि में राम उत्तर और दक्षिण को जोड़ने वाले हैं पर रेवंत रेड्डी जैसे लोगों को कौन समझाए ? उनका आरोप है कि भाजपा ने राम पर कब्जा कर लिया है। राम मंदिर के आंदोलन को मुस्लिम विरोधी और साम्प्रदायिकता फैलाने वाला और यहाँ तक कि राम को काल्पनिक बताकर सर्वोच्च न्यायालय में शपथ पत्र देने वाली पार्टी की ऐसी शिकायत का क्या औचित्य हो सकता है ? ऐसे लोगों के पास अब भी मौका है कि मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि और काशी विश्वनाथ में बाबरी मस्जिद हटाने की पहल कर वह शिव और कृष्ण पर कब्जा कर सकते हैं।

वीरेन्द्र सिंह परिहार