लेख

संयुक्त राष्ट्र संघ: भूमिका एवं वर्तमान प्रासंगिकता

24 अक्टूबर संयुक्त राष्ट्र संघ स्थापना दिवस

-सुनील कुमार महला

शांति, सुरक्षा और मानवता की रक्षा बहुत ही जरूरी है और द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका ने विश्व समुदाय को यह एहसास कराया कि इन सबकी रक्षा के लिए विश्वे में एक प्रभावी, मजबूत एवं निष्पषक्ष अंतरराष्ट्रीय संगठन का होना आवश्यक है। इसी उद्देश्य से 24 अक्टूबर 1945 को संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई। पाठकों को बताता चलूं कि वर्तमान में इस संगठन के 193 सदस्य देश हैं। कहना गलत नहीं होगा कि यू0एन0ए0(संयुक्त राष्ट्र संघ) केवल राष्ट्रों का ही संगठन नहीं है, बल्कि यह वैश्विक शांति, बहुपक्षवाद, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा मानव भविष्य की सामूहिक आकांक्षा का प्रतीक है। आज जब पूरा विश्व युद्ध, भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, जलवायु संकट, आतंकवाद, आर्थिक असमानता और विभिन्नस तकनीकी एवं अन्यआ चुनौतियों का लगातार सामना कर रहा है, तब संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका और प्रासंगिकता पर विचार करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।

संयुक्त राष्ट्र संघ की मुख्यर भूमिका-

इस संगठन की भूमिका के बारे में यदि हम यहां पर चर्चा करें तो इसका काम विश्व के विभिन्नि देशों के बीच आपसी सहयोग और मित्रता को बढ़ावा देना है। पाठक जानते होंगे कि यह संगठन अंतरराष्ट्रीय विवादों को बातचीत के माध्यम से सुलझाने या यूं कहें कि देशों के बीच विवादों का शांतिपूर्ण समाधान, कूटनीतिक संवाद, शांति स्थापना और संघर्षों की रोकथाम करने, युद्धों को रोकने, मानवाधिकारों की रक्षा करने(मानव गरिमा, स्वतंत्रता, समानता तथा भेदभावरहित समाज की स्थापना को प्रोत्साहन) तथा गरीब और जरूरतमंद देशों की सहायता करने में (गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और असमानता को कम करने में सहयोग) या यूं कहें कि वैश्विक सामाजिक-आर्थिक विकास करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इतना ही नहीं यह संगठन शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और आर्थिक विकास के क्षेत्र में भी कार्य करता है। इसके अलावा, यह प्राकृतिक आपदाओं और मानवीय संकटों(जैसे कि युद्ध, विस्थापन, महामारी और प्राकृतिक आपदाओं) के समय प्रभावित लोगों को सहायता प्रदान करता है। अंतरराष्ट्रीय कानून का विकास करने में भी इस संगठन की भूमिका बहुत ही महत्तसवपूर्ण है। दरअसल, यह संगठन राष्ट्रों के बीच नियम-आधारित व्यवस्था, संधियों और कानूनी सहयोग को प्रोत्साहित करता है। इसके अतिरिक्तध, जलवायु परिवर्तन से निपटने, जैव-विविधता बचाने और सतत विकास को बढ़ावा देने या यूं कहें कि पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी इस संगठन की भूमिका बहुत विशेष है। पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में ही नहीं, विभिन्नि वैश्विक समस्याओं जैसे कि स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, साइबर सुरक्षा तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी चुनौतियों पर सामूहिक कार्रवाई के लिए भी यह संगठन मंच उपलब्ध कराता है। कुल मिलाकर, यह बात की जा सकती है कि, संयुक्त राष्ट्र विश्व में शांति, सुरक्षा, समानता और सहयोग स्थापित करने का प्रयास करता है।

वर्तमान समय में संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता-

आज संयुक्त राष्ट्र संघ की प्रासंगिकता केवल उसके उद्देश्यों से नहीं, बल्कि इस बात से निर्धारित होती है कि वह बदलती विश्व व्यवस्था की चुनौतियों का समाधान कितनी प्रभावशीलता से कर पाता है। जैसा कि इस आलेख में पूर्व में भी चर्चा कर चुका हूं कि यहे संगठन वैश्विक शांति एवं सुरक्षा के लिए काम करता है। कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया के संघर्ष और अन्य क्षेत्रीय संकटों के बीच संयुक्त राष्ट्र कूटनीतिक संवाद, मानवीय सहायता तथा शांति स्थापना के लिए एक महत्त्वपूर्ण मंच है। हालाँकि, यह बात अलग है कि सुरक्षा परिषद में महाशक्तियों के मतभेद इसकी प्रभावशीलता को सीमित करते हैं। बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में संतुलन भी इस संगठन का प्रमुख कार्य है। आज विश्वक में विकासशील देशों की संख्यास बढी है एवं विश्व में अनेक शक्तियां उभरकर सामने आ रहीं हैं, ऐसे समय में इस संगठन ने सभी देशों को संवाद का अवसर देकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग और सामूहिक निर्णय-प्रक्रिया को मजबूत करने का काम किया है।सतत विकास एवं सामाजिक न्याय की दिशा में इस संगठन की भूमिका की बात करें तो इसके सतत विकास लक्ष्य  गरीबी उन्मूलन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण के लिए साझा वैश्विक दिशा प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं, आज के समय में, जलवायु परिवर्तन किसी एक देश की समस्या नहीं, बल्कि संपूर्ण मानवता के अस्तित्व से जुड़ी चुनौती है। संयुक्त राष्ट्र जलवायु वार्ताओं और अंतरराष्ट्रीय समझौतों के माध्यम से देशों को साझा जिम्मेदारी निभाने के लिए प्रेरित करता है। मानवाधिकार एवं मानवीय गरिमा के क्रम में शरणार्थियों, महिलाओं, बच्चों, अल्पसंख्यकों तथा संघर्ष प्रभावित नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में संयुक्त राष्ट्र की संस्थाएँ महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और यह बात किसी से छिपी नहीं है। इतना ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र कृत्रिम बुद्धिमत्ता(एआइ), साइबर अपराध, डिजिटल असमानता और महामारी जैसी सीमापार चुनौतियों के क्रम में बहुपक्षीय विमर्श को लगातार प्रोत्साहित करता है।

संयुक्त राष्ट्र संघ के समक्ष मौजूद चुनौतियाँ-

कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान समय में यह संगठन कई अभूतपूर्व और जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है। आज तेजी से बदलती वैश्विक व्यवस्था, महाशक्तियों की प्रतिद्वंद्विता और नए प्रकार के संकटों ने इसके कामकाज और प्रासंगिकता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सुरक्षा परिषद में प्रमुख शक्तियों द्वारा वीटो पावर के दुरुपयोग और बढ़ते भू-राजनीतिक तनावों के कारण यह वैश्विक संघर्षों में त्वरित निर्णय लेने में अक्सर विफल रहता है।सरल शब्दों  में कहें तो पाँच स्थायी सदस्यों की विशेष शक्ति सुरक्षा परिषद में सामूहिक कार्रवाई को बाधित कर सकती है। इसके अतिरिक्त, 1945 के पुराने ढांचे में वर्तमान विश्व व्यवस्था के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व का अभाव है, जिसके ढांचागत सुधार की मांग लगातार हो रही है। यह संस्था गहरे वित्तीय संकट, संसाधनों की कमी, जटिल नौकरशाही(प्रशासनिक जटिलताएँ) और सदस्य देशों द्वारा राष्ट्रीय संप्रभुता के नाम पर मानवीय हस्तक्षेप के विरोध जैसी समस्याओं से भी जूझ रही है। साथ ही, जलवायु परिवर्तन, साइबर खतरे, आतंकवाद और वैश्विक महामारियों जैसी 21वीं सदी की नई बहुआयामी समस्याओं पर सभी 193 सदस्य देशों के बीच आम सहमति बनाना इसके लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। वास्तेव में, निर्णयों के प्रभावी कार्यान्वयन के लिए सदस्य देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति और सहयोग आवश्यक है। इन चुनौतियों के बावजूद, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार की दिशा में अंतर-सरकारी वार्ताएँ जारी हैं। यहां पाठकों को जानकारी देता चलूं कि वर्ष 2026 में भी सुरक्षा परिषद की अधिक प्रतिनिधिपूर्ण और प्रभावी संरचना के लिए सुधार पर चर्चा जारी है।

आगे की राह: संयुक्त राष्ट्र को अधिक प्रभावी कैसे बनाया जाए ?

वास्तीव में, आज सुरक्षा परिषद का विस्तार कर एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का प्रतिनिधित्व बढ़ाये जाने की आवश्य कता है। सच तो यह है कि पांच बड़े देशों (अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस) को मिले ‘वीटो’ (विशेषाधिकार) या यूं कहें कि किसी भी फैसले को अकेले रोक देने का विशेष अधिकार को सीमित करना होगा। कम से कम युद्ध, आतंकवाद या बड़े मानवाधिकार हनन के मामलों में किसी एक देश को फैसला रोकने का अधिकार नहीं होना चाहिए।

वीटो शक्ति के दुरुपयोग को सीमित करने के उपाय विकसित किए जाने की भी आवश्यशकता महत्तीक है। आज भी सुरक्षा परिषद में 1945 के समय के कुछ गिने-चुने ताकतवर देशों का ही दबदबा है। इसे सही मायनों में दुनिया का प्रतिनिधि बनाने के लिए भारत और अफ्रीकी महाद्वीप जैसे नए सदस्यों को भी स्थायी जगह मिलनी चाहिए। वास्तीव में, ताकतवर देशों के ‘वीटो पावर’ (किसी भी फैसले को अकेले रोक देने का विशेष अधिकार) पर लगाम लगनी चाहिए, जिसके कारण अक्सर दुनिया की भलाई के अहम फैसले अटक जाते हैं।  इसके अतिरिक्तस, आज शांति स्थापना और संघर्षों की रोकथाम के लिए कूटनीतिक तंत्र को मजबूत करने, विकासशील देशों को वैश्विक आर्थिक एवं तकनीकी निर्णयों में अधिक भागीदारी दिये जाने,  वित्तीय पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत दक्षता में सुधार किये जाने के साथ ही साथ मानवाधिकारों और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुपालन में दोहरे मानदंडों से भी बचने की आवश्याकता है। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र जो भी नियम बनाए या इसकी अंतरराष्ट्रीय अदालत जो भी फैसला दे, उसे सभी देशों से सख्ती से मनवाने का कोई ठोस तरीका होना चाहिए, ताकि इसके फैसले सिर्फ कागजी सलाह बनकर न रह जाएं। अभी यह संगठन अपने फंड के लिए कुछ अमीर देशों पर बहुत ज्यादा निर्भर है, जिसका फायदा उठाकर वे देश इसकी नीतियों पर दबाव डालते हैं। अगर सभी देश अपना हिस्सा समय पर दें, तो यह बिना किसी दबाव के काम कर सकेगा। इसके अलावा,  इसके कार्यालयीन कामकाज को और अधिक तेज व त्व रित करने की सख्त जरूरत है ताकि किसी आपदा, अकाल या युद्ध के समय प्रभावित लोगों तक तुरंत मदद पहुंचाई जा सके। इसकी पीसकीपिंग फोर्स(शांति बनाए रखने वाली सेनाओं) को भी आज की आधुनिक तकनीक से लैस करने की जरूरत है, ताकि वे केवल मूक दर्शक न रहें और आतंकवाद या आधुनिक युद्धों का डटकर सामना कर सकें। आज दुनिया के सामने जलवायु परिवर्तन, जल संकट, साइबर खतरे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) जैसी बिल्कुल नई चुनौतियां हैं। संयुक्त राष्ट्र को इन मुद्दों पर सिर्फ बैठकें करने या लक्ष्य तय करने के बजाय सख्त अंतरराष्ट्रीय नियम बनाने होंगे, जिन्हें तोड़ने वाले देशों पर कार्रवाई हो सके। हालांकि, यह सब तभी मुमकिन है जब दुनिया के शक्तिशाली देश अपने निजी स्वार्थों को छोड़कर, पूरी दुनिया के भले के लिए एक साथ मिलकर ईमानदारी से काम करने की इच्छाशक्ति दिखाएं।

अंत में निष्कर्ष के तौर पर यही कहूंगा कि संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व समुदाय को संवाद, सहयोग, मानवीय सहायता और साझा नियमों के लिए एक सार्वभौमिक मंच प्रदान किया है। आज बदलती विश्व व्यवस्था में इसे अधिक प्रभावी, लोकतांत्रिक और उत्तरदायी बनाये जाने की आवश्य कता है। वास्तकव में, हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि वैश्विक समस्याओं का समाधान अलगाव और शक्ति-प्रतिस्पर्धा में नहीं, बल्कि संवाद, सहयोग और सामूहिक उत्तरदायित्व में निहित है और यही कारण है कि संयुक्त राष्ट्र संघ आज भी विश्व शांति और मानवता के साझा भविष्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।

-सुनील कुमार महला