पर्यावरण लेख

पलाश की सिंदूरी आभा : फागुन का दहकता दर्पण, जिसमें झांकती है हमारी परंपरा

उमेश कुमार साहू

जब फागुन की बयार चलती है तो प्रकृति मानो अपना मौन तोड़कर रंगों की भाषा में बात करने लगती है। इस संवाद का सबसे प्रखर और दीप्तिमान शब्द है – पलाश। जिसे हम लोकभाषा में ‘टेसू’ या ‘ढाक’ भी कहते हैं। पलाश मात्र एक वृक्ष नहीं, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप की उस अदम्य जिजीविषा का प्रतीक है, जो तपन और अभावों के बीच भी सौंदर्य का उत्सव मनाना जानती है।

प्रकृति का आत्मदाह या सृजन का संगीत?

पलाश को ‘वनों की ज्वाला’ (Flame of the Forest) कहा जाता है। वैज्ञानिक रूप से इसे ब्यूटिया मोनोस्पर्मा (Butea \ monosperma) कहते हैं। जब बसंत अपने चरम पर होता है, तब पलाश के पत्तों का साथ छूट जाता है और उसकी नग्न टहनियों पर सिंदूरी-नारंगी फूलों का ऐसा सैलाब उमड़ता है कि दूर से देखने पर लगता है मानो जंगल में आग लगी हो।

यह दृश्य विस्मयकारी होता है; पत्तों की अनुपस्थिति में फूलों का यह वर्चस्व यह संदेश देता है कि सृजन के लिए कभी-कभी पुराने आवरणों का त्याग अनिवार्य है। पलाश का खिलना इस बात की घोषणा है कि जीवन की सार्थकता केवल हरे-भरे बने रहने में नहीं, बल्कि प्रतिकूल परिस्थितियों में अपने भीतर के रंग को पूरी प्रखरता के साथ बिखेरने में है।

सांस्कृतिक धरोहर और होली का मर्म

जिस तरह एक नदी अपनी मर्यादा (किनारों) में रहकर ही सुंदर और उपयोगी होती है, उसी तरह हमारे त्योहार भी नियमों और लोक-लाज की सीमाओं में ही आनंददायी होते हैं। टेसू का चटक रंग इसी अनुशासित उल्लास की अभिव्यक्ति है। पलाश का रंग ‘केसरिया’ या ‘नारंगी’ होना मात्र संयोग नहीं है। यह त्याग, वैराग्य और शौर्य का रंग है।

प्राचीन काल में होली का पर्व पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंगों से ही मनाया जाता था। ये रंग केवल त्वचा को ही नहीं, बल्कि मन को भी शीतलता प्रदान करते थे। पलाश के फूलों को रात भर पानी में भिगोकर जो केसरिया रंग तैयार होता था, वह त्वचा के रोगों के लिए रामबाण था। आज के कृत्रिम रंगों ने न केवल हमारे चेहरों को बिगाड़ा है, बल्कि उस उत्सवधर्मिता की आत्मा को भी मलिन कर दिया है। पलाश हमें याद दिलाता है कि उत्सव प्रकृति के विरुद्ध जाकर नहीं, बल्कि उसके साथ लयबद्ध होकर मनाया जाना चाहिए।

लोक-जीवन और आर्थिक आधार

पलाश का महत्व केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का भी आधार रहा है। इसके पत्तों से बने ‘दौने और पत्तल’ हमारी उस परंपरा का हिस्सा रहे हैं, जहाँ ‘उपयोग करो और फेंक दो’ (Use and Throw) की संस्कृति प्लास्टिक के कचरे से नहीं, बल्कि मिट्टी में मिल जाने वाले तत्वों से बनी थी। इसके पत्तों का भोजन पर एक विशेष औषधीय प्रभाव होता था।

ग्रामीण अंचलों में आज भी पलाश की छाल से रस्सियाँ बनाई जाती हैं और इसके गोंद (कमरकस) का उपयोग स्वास्थ्यवर्धक औषधियों में होता है। यह वृक्ष हमें सिखाता है कि जो वस्तु देखने में जितनी सुंदर है, वह उतनी ही उपयोगी भी हो सकती है। यह ‘कला के लिए कला’ नहीं, बल्कि ‘जीवन के लिए कला’ का उत्कृष्ट उदाहरण है।

साहित्यिक और आध्यात्मिक संदर्भ

भारतीय साहित्य पलाश की महिमा से भरा पड़ा है। कालिदास के ‘ऋतुसंहार’ में इसे बसंत का आभूषण बताया गया है। संत और मनीषी इसे ‘ब्रह्मवृक्ष’ कहते हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से देखें तो पलाश के त्रिपत्र (तीन पत्ते) ब्रह्मा, विष्णु और महेश के प्रतीक माने जाते हैं। इसके समिधा (लकड़ी) का उपयोग यज्ञों में किया जाता है, जो इसकी पवित्रता को सिद्ध करता है।

पलाश हमें सिखाता है कि ‘शून्यता में भी पूर्णता’ कैसे खोजी जाए। जब इसके सारे पत्ते झड़ जाते हैं, तब यह सबसे सुंदर दिखता है। यह मनुष्य को संदेश देता है कि जब जीवन की बाहरी सुख-सुविधाएं (पत्ते) छूट जाएं, तब अपने भीतर के आत्मिक सौंदर्य (फूल) को प्रकट करने का असली समय होता है। यह ‘रिक्तता’ में ‘पूर्णता’ का उत्सव है।

पारिस्थितिक तंत्र का रक्षक

आज के दौर में जब जलवायु परिवर्तन एक बड़ी चुनौती है, पलाश जैसे वृक्षों का महत्व और बढ़ गया है। यह वृक्ष बंजर और कठोर भूमि पर भी जीवित रहने की क्षमता रखता है। यह न केवल मृदा अपरदन को रोकता है, बल्कि भूजल स्तर को सुधारने में भी सहायक है। इसकी जड़ें मिट्टी को इतनी मजबूती से पकड़ती हैं कि इन्हें ‘मिट्टी का रक्षक’ कहा जाता है। इसके फूल पक्षियों और कीटों के लिए भोजन का मुख्य स्रोत बनते हैं, जिससे जैव-विविधता बनी रहती है।

भटकाव और समाधान : एक निष्कर्ष

“आज हम भटक गए हैं और कभी न मिलने वाली मंजिल तलाश रहे हैं।” हमारी यह भटकन प्रकृति से अलगाव के कारण है। हमने पलाश के प्राकृतिक रंगों को छोड़कर ‘सिंथेटिक’ चकाचौंध को अपना लिया। हमने मर्यादाओं को तिलांजलि देकर उच्छृंखलता को आधुनिकता मान लिया।

पलाश की वापसी केवल एक वृक्ष की वापसी नहीं होगी, बल्कि वह हमारी उस चेतना की वापसी होगी जो हमें संयम, सात्विकता और सामूहिकता की याद दिलाती है। यह हमें अपनी जड़ों की ओर लौटने का आह्वान करता है। जब तक टेसू के फूल लाल दहक रहे हैं, तब तक उम्मीद जीवित है कि हम अपनी खोई हुई सांस्कृतिक पहचान को पुनः प्राप्त कर सकते हैं और उस मर्यादा को पुनर्जीवित कर सकते हैं, जिसके बिना समाज का रंग फीका पड़ जाता है।

अंततः, पलाश एक विचार है – कि जो कठिन समय में खिलता है, वही वास्तविक सौंदर्य का स्वामी होता है।

उमेश कुमार साहू