अब और तब: तब हिंदी UN को सुनती थी, अब UN हिंदी को

वैश्वीकरण के  गलियारे से गुजरने वाले 21वीं सदी की इस दुनिया में पूरा विश्व एक गाँव बन चुका है जिसे आज की डिक्शनरी में हम ‘ग्लोबल विलेज’ कहते हैं. वैश्वीकरण आज बाजार व व्यापार तक सीमित नहीं है बल्कि एक दूसरे की भाषा-संस्कृति जैसी सामरिक महत्व वाली चीजों को भी इसी के साथ जोड़ा जा रहा है और इसी का ही एक उदाहरण है हमारे देश में पश्चिमी सभ्यता का प्रवेश. ऐसे ही वैश्विक मूल्यों को जोड़ने, आपसी तालमेल, शांति-सुरक्षा, शैक्षक, सांस्कृतिक व आर्थिक प्रगति को बढ़ावा देने वाला संगठन है संयुक्त राष्ट्र यानी यूएन.

जैसा कि हमारा विषय है यूएन व भारतीय भाषा हिंदी इसीलिए हमें एक नजर भारत और यूएन के रिश्तों की शुरुआती कड़ी पर भी डालना होगा. भारत यूएन नामक वैश्विक संघ के संस्थापक सदस्यों में से एक था,भारत नें 50 अन्य देशों के साथ 26 जून 1945 को ही यूएन के शामिल होने की घोषणा कर दी थी. हालाँकि संस्थापक सदस्य होने के बावजूद भी भारत खुद को यूएन में अपनी वैसी छाप नहीं छोड़ पाया जितना कि विश्व की बड़ी अर्थव्यवस्था वाली शक्तियों जैसे अमेरिका, चीन, रूस, जापान, ब्रिटेन नें खुद को किया. उसका एक पहलू यह भी था कि उस समय न तो हमनें अर्थव्यवस्था में किसी को चुनौती दी थी न ही खेल, शिक्षा, संस्कृति-भाषा जैसी सामरिक शक्तियों में. हालाँकि वो तो भारत के गुजरे जमाने थे लेकिन आज का भारत नया भारत है, नई पहचान है, नई अर्थव्यवस्था है, नया युवा जोश है नई सत्ता है. इसमें कोई शक नहीं कि आज भारत दुनिया की सबसे तेज उभरती आर्थिक शक्ति है लेकिन ये हमारी सामरिक शक्तियाँ नहीं हैं बल्कि भाषा व संस्कृति सामरिक के रूप में गिनी जाती हैं.

जब भी यूएन और भारत की बात आती तो एक प्रश्न भारत के बारे में अक्सर आता है कि भारत यहाँ किस रूप में जाना जाएगा ? ऐसी क्या चीज होगी जो भारत को यूएन के पटल से विश्व भर में एक नई पहचान के साथ नई उड़ान देगी ? लेकिन जब यूएन में भारतीयता और उसके इतिहास के पन्नों को देखा जाता है तो साल 1953 जहन में आता है जब भारत नें विजयलक्ष्मी पंडित के रूप में यूएन को पहली स्थाई महिला सदस्य दिया था. इसके लगभग 25 सालों बाद 1977 में यूएन में हिंदुस्तान को अटल जी के हिंदी भाषण नें नई पहचान दिलाई. दरअसल वो 1977 का साल था और तत्कालीन जनता दल सरकार में विदेश मंत्रालय का जिम्मा था अटल बिहारी के कंधों में, उसी दौरान यूएन के पटल में अटल जी का हिंदी में दिया हुआ भाषण पूरी दुनिया नें सुना. ‘वसुधैव कुटुंबकम’ व मानव मूल्यों के संदेश देने वाले उस भाषण के साथ ही अटल जी भारत की तरफ से हिंदी में बोलने वाले पहले प्रतिनिधि बन गए थे.

यूएन के द्वारा भारतीय संस्कृति व भाषा को विश्व के सामने लाने के लिए सितंबर 2014 में देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र नें एक बहुत बड़ी पहल की जिसमें हजारों साल पुरानी भारतीय संस्कृति का संवाहक व परिचायक योग को यूएन में मान्यता के लिए सभी सदस्य देशों को आव्हान किया था. इसके एक साल के अंदर ही 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मान्यता मिली, हालांकि इसके लिए जरूरी था कि दो तिहाई सदस्य प्रस्ताव के लिए सहमति दें. लेकिन भारत सरकार के सार्थक प्रयासों व कूटनीतिक पहलों के बदौलत 177 देशों का समर्थन जीता. 

इसी के तर्ज में मोदी सरकार की अगली कोशिश हुई शुरू हिंदी को यूएन में आधिकारिक भाषा बनाने का जोकि अपने आप में सुनने में जितना सरल है सैद्धांतिक रूप से उतना ही कठिन. लेकिन हमें पंक्ति याद आती है “उद्यमेन हि सिद्धन्ति कार्याणि न मनोरथैः” अर्थात उद्यम करने से कार्य सिद्ध होते हैं न कि सोचने से. इसके बाद से मोदी सरकार नें हिंदी को वैश्विक पहचान दिलाने के लिए हर छोटे बड़े कदम उठाने शुरू किए. इसके तहत पिछले 4 वर्षों (2014-18) में हिंदी के लिए बजट से लगभग 21 करोड़ रुपए आबंटित किए गए. 

कभी हमारे सोचने का विषय भी था कि चीन चीनी में, जर्मनी जर्मन में, जापान जापानी में, ब्रिटेन अंग्रेजी में, फ़्रांस फ्रेंच में दुनिया के सामने अपने आप को रखता है तो क्या भारत भी ऐसा कुछ कर सकता है ? लेकिन यूएन में अटल जी के बाद हिंदी में फिर किसी नें विश्व को संबोधित किया उसका सिलसिला भी 2014 में मोदी सरकार आने के बाद हुआ जब सितंबर 2014 में 69वें संयुक्त राष्ट्र महासम्मेलन में मोदी जी नें हिंदी में भाषण देकर एक बार फिर हिंदी की यादों को तरो ताजा किया, इसके ठीक अगले सम्मेलन में भारत सरकार में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नें फिर से यूएन में हिंदी में दुनिया को भारत के बारे में बताया. 

विश्व में हिंदी को ले जाने जे लिए साल 1975 में ही भारत नें नागपुर में पहला विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित किया था उसके बाद भी अमेरिका, मारीशस, जैसे देशों में सम्मेलन होते रहे लेकिन इसमें हमनें हिंदी और साहित्य पर ही पूरा ध्यान केंद्रित किया लेकिन ये प्रश्न उठाना भी लाज़मी हो गया कि जब साहित्य पढ़ने वाला ही कोई नहीं रहेगा तो साहित्य का क्या ? कविता पढ़ेगा कौन ? इसके लिए जरूरी था कि हिंदी के भावी पाठकों के बारे में बात की जाए, उन तक शुद्ध हिंदी कैसे पहुँचे ? हिंदी साहित्य को भाषा और संस्कृति से कैसे जोड़ा जाए ? इसके लिए वर्तमान सरकार नें पायलट प्रोग्राम लांच किया, और ये प्रोग्राम जल्द ही  हमारे लिए खुशखबरी लेकर आया. जैसा कि यूएन नें जनवरी 2019 में news.un.org/hi/ नाम से हिंदी वेबसाइट लांच किया और ये भारत के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि ऐसा करने वाली हिंदी पहली नॉन-यूएन एशियाई भाषा थी, इसके अलावा पहली बार 2017 में यूएन नें हिंदी में साप्ताहिक रेडियो समाचार बुलेटिन का प्रसारण भी करना शुरू किया जिसे आप भी हर शुक्रवार यूएन हिंदी के ट्विटर,फेसबुक व इन्स्टाग्राम जैसे सोशल मीडिया प्लेटफार्मों में सुन सकते हैं.

हालाँकि भारत सरकार का ये प्रयास कि यूएन हिंदी में अन्य 6 भाषाओँ के अलावा 7वीं आधिकारिक भाषा बने, इसमें तकनीकी रोड़े अटक रहे हैं. यूएन के नियमों के अनुसार किसी भी भाषा को आधिकारिक दर्जा देने वाले प्रस्ताव को पारित कराने के लिए दो तिहाई बहुमत जरूरी होता है इसके अलावा जितने भी सदस्य इसमें समर्थन देंगे उनको अपने-अपने देशों में उस भाषा के विकास के लिए अलग से धन भी खर्च करने होंगे. दरअसल यही तकनीकी समस्या बनी जैसा कि विदेश मंत्री सुषमा स्वराज नें लोकसभा में एक प्रश्न के जबाव में बताया भी कि “अगर इसके लिए 40 करोड़ खर्च हो रहे हैं तो हम 400 करोड़ देने के लिए तैयार हैं लेकिन नियमों के मुताबिक समर्थन देने वाले देश को ही ये खर्च वहन करना होता है जोकि कुछ देशों के लिए संभव नहीं है और अगर भारत चाहे भी कि उन देशों के बदले खर्च खुद दें परन्तु यूएन का नियम इसे अनुमति नहीं देता.” हालाँकि यूएन में भारत हिंदी को लेकर लगातार दावेदारी मजबूत कर रहा है, विश्व में हिंदी की लगातार लोकप्रियता बढ़ रही है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण आज हमारे सामने सुदूर अफ्रीका में बसे देश मारीशस का है. हालाँकि मारीशस और भारत के रिश्ते काफ़ी पुराने हैं तो जाहिर है कि इन दिनों में भाषा व संस्कृति का आदान-प्रदान भी होता रहा, लेकिन मारीशस में ही पहली बार विश्व हिंदी सचिवालय की नीव रखी गई जिसनें साल 2008 से आधिकारिक रूप से काम करना भी शुरू कर दिया था. 

इस पूरे विमर्श को समेटते हुए हम यहाँ तक पहुँच आए कि जिस तरह तकनीकी, बाजार, साहित्य सब कुछ हिंदी के लिए आज एक बहुत बड़ा अवसर बन रहा है इसके अलावा कूटनीतिक व सामरिक तरीकों से भारत सरकार की जो कोशिशें लगातार जारी हैं उससे जल्द ही यूएन हमारी भारतीय भाषा हिंदी को नियमों में आवश्यक संसोधन करके इसे आधिकारिक भाषा का दर्जा देगा और इसे उम्मीद के पर इसलिए भी लग गए हैं क्योंकि आज के तकनीकी व सूचना के दौर में यूएन नें ‘यूएन हिंदी’ नाम से न्यूज बुलेटिन, वेबसाइट व सोशल मीडिया में आधिकारिक पहचान दे दिया है. इसीलिए आज हम कह सकते हैं कि एक वो भी दिन थे जब यूएन में हिंदी या हिंदुस्तानी गैरों की भाषा सुनता था लेकिन अब हिंदी भी बोली जाने लगी और पूरा यूएन सुनता भी है.

शिवेंद्र तिवारीमीडिया छात्र

साभार : https://www.academics4namo.com/

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