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    Homeआर्थिकीबढ़ती आर्थिक असमानता पर मंथन हो

    बढ़ती आर्थिक असमानता पर मंथन हो

    – ललित गर्ग –

    वैश्विक संस्था ऑक्सफैम ने अपनी आर्थिक असमानता रिपोर्ट में समृद्धि के नाम पर पनप रहे नये नजरिया, विसंगतिपूर्ण आर्थिक संरचना एवं अमीरी गरीबी के बीच बढ़ते फासले की तथ्यपरक प्रभावी प्रस्तुति देते हुए इसे घातक बताया है। संभवतः यह एक बड़ी क्रांति एवं विद्रोह का कारण भी बन रहा है। आज देश एवं दुनिया की समृद्धि कुछ लोगों तक केन्द्रित हो गयी है, भारत में भी ऐसी तस्वीर दुनिया की तुलना में अधिक तीव्रता से देखने को मिल रही है। ऑक्सफैम ने अपनी नई रिपोर्ट में कहा है कि भारत में सबसे अमीर एक प्रतिशत के पास अब देश की कुल संपत्ति का 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा है। जबकि नीचे की आधी आबादी के पास कुल संपत्ति का केवल 3 प्रतिशत हिस्सा है। भारत के दस सबसे अमीरों पर 5 प्रतिशत टैक्स लगाने से बच्चों को स्कूल वापस लाने के लिए पूरा पैसा मिल सकता है। केवल एक अरबपति गौतम अडानी पर साल 2017 से 2021 के बीच के लाभ पर टैक्स लगाकर 1.79 लाख करोड़ रुपए जुटाया जा सकता है। जो एक वर्ष के लिए 50 लाख से अधिक भारतीय प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों को रोजगार देने के लिए पर्याप्त है। ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट’ टाइटल वाली इस रिपोर्ट में आगे कहा गया है कि अगर भारत के अरबपतियों पर उनकी पूरी संपत्ति पर 2 प्रतिशत की दर से एक बार टैक्स लगाया जाता है, तो यह देश में अगले तीन वर्षों के लिए कुपोषण से पीड़ित बच्चों के पोषण के लिए 40,423 करोड़ रुपए जुटाया जा सकता है।
    भारत अमीर-गरीब के बीच बढ़ रहा फासला एक चिन्ता का कारण ही नहीं, बल्कि बड़ा राजनीतिक मुद्दा होना चाहिए, लेकिन दुर्भाग्य से यह मुद्दा कभी भी राजनीतिक मुद्दा नहीं बनता। शायद राजनीतिक दलों की दुकानें इन्हीं अमीरों के बल पर चलती है और गरीबी कायम रहना उनको सत्ता दिलाने का सबसे बड़ा हथियार है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में अमीर अधिक अमीर हो रहे हैं और गरीब अधिक गरीब। गौतम अडाणी एवं मुकेश अंबानी के दिन दोगुने रात चौगुने फैलते साम्राज्य पर उंगली उठाई जानी चाहिए, पर कोई भी राजनीतिक दल यह नहीं कर पा रहे हैं। विपक्ष के सामने इससे अच्छा क्या मुद्दा हो सकता है? इस मामले में राहुल गांधी ने पहली बार अपनी भारत जोड़ो यात्रा में यह मुद्दा उठाकर अपने राजनीतिक कद को तनिक ऊंचाई दी है। उनके कारण कम से कम अमीर और गरीब के बीच बढ़ती हुई खाई का सवाल देश के मानस पटल पर दर्ज हुआ है। राजनीति से इतर अर्थशास्त्रियों और विश्व की नामचीन संस्थाओं की रपटों में यह सवाल लगातार रेखांकित हो रहा है।
    ऑक्सफैम के तथ्य चौंकाते ही नहीं है, बल्कि राजनीतिक विसंगतियों एवं विडम्बनाओं की पोल भी खोलते हैं। जिसमें कहा गया है कि देश के 10 सबसे अमीर अरबपतियों पर 5 प्रतिशत का एक बार का टैक्स साल 2022-23 के लिए (1.37 लाख करोड़ रुपए) स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के 86,200 करोड़ और आयुष मंत्रालय 3,050 करोड़ रुपये के अनुमानित बजट से डेढ़ गुना अधिक है। वहीं ऑक्सफैम ने कहा कि भारत में अरबपतियों की कुल संख्या 2020 में 102 से बढ़कर 2022 में 166 हो गई। कमाई के मामले में लैंगिक असमानता पर रिपोर्ट में कहा गया है कि महिला वर्कर को एक पुरुष वर्कर द्वारा कमाए गए प्रत्येक 1 रुपए की तुलना में केवल 63 पैसे मिलते हैं। अनुसूचित जातियों और ग्रामीण वर्करों के लिए यह अंतर और भी अधिक है। ऑक्सफैम ने कहा कि रिपोर्ट भारत में असमानता के प्रभाव का पता लगाने के लिए गुणात्मक और मात्रात्मक जानकारी का मिश्रण है। ऑक्सफैम ने यह भी कहा है कि जब से कोरोना महामारी शुरू हुई, तब से नवंबर 2022 तक भारत में अरबपतियों की संपत्ति में वास्तविक रूप से 121 प्रतिशत या 3,608 करोड़ रुपए प्रति दिन की वृद्धि हुई है।
    भारतीय लोग इनदिनों इस बात से बहुत खुश होते रहते हैं कि भारत शीघ्र ही दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने जा रहा है। लेकिन दुनिया के इस तीसरे सबसे बड़े मालदार एवं समृद्ध देश की असली हालत क्या है? ऑक्सफॉम के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक सिर्फ 100 भारतीय अरबपतियों की संपत्ति 54.12 लाख करोड़ रु. है यानि उनके पास इतना पैसा है कि वह भारत सरकार के डेढ़ साल के बजट से भी ज्यादा है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को अपनी रोजमर्रा के जरूरी चीजों को खरीदने पर बहुत ज्यादा टैक्स भरना पड़ता है, क्योंकि वर्तमान सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि वह बताए बिना ही चुपचाप काट लिया जाता है। इसी का नतीजा है कि देश के 70 करोड़ लोगों की कुल संपत्ति देश के सिर्फ 21 अरबपतियों से भी कम है।
    नया भारत-सशक्त भारत बनाने की जरूरत यह नहीं है कि चंद लोगों के हाथों में ही बहुत सारी पूंजी इकट्ठी हो जाये, पूंजी का वितरण ऐसा होना चाहिए कि विशाल देश के लाखों गांवों एवं करोड़ों लोगों को आसानी से उपलब्ध हो सके। लेकिन क्या कारण है कि महात्मा गांधी को पूजने वाले सत्ताशीर्ष का नेतृत्व उनके ट्रस्टीशीप के सिद्धान्त को बड़ी चतुराई से किनारे कर रखा है। यही कारण है कि एक ओर अमीरों की ऊंची अट्टालिकाएं हैं तो दूसरी ओर फुटपाथों पर रेंगती गरीबी। एक ओर वैभव ने व्यक्ति को विलासिता दी और विलासिता ने व्यक्ति के भीतर क्रूरता जगाई, तो दूसरी ओर गरीबी तथा अभावों की त्रासदी ने उसके भीतर विद्रोह की आग जला दी। वह प्रतिशोध में तपने लगा, अनेक बुराइयां बिन बुलाए घर आ गईं। नई आर्थिक प्रक्रिया को आजादी के बाद दो अर्थों में और बल मिला। एक तो हमारे राष्ट्र का लक्ष्य समग्र मानवीय विकास के स्थान पर आर्थिक विकास रह गया। दूसरा सारे देश में उपभोग का एक ऊंचा स्तर प्राप्त करने की दौड़ शुरू हो गई है। इस प्रक्रिया में सारा समाज ही अर्थ प्रधान हो गया है।
    देश में मानवीय मूल्यों और आर्थिक समानता को हाशिये पर डाल दिया गया है और येन-केन-प्रकारेण धन कमाना ही सबसे बड़ा लक्ष्य बनता जा रहा है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या इस प्रवृत्ति के बीज हमारी परंपराओं में रहे हैं या यह बाजार के दबाव का नतीजा है? कहीं शासन-व्यवस्थाएं गरीबी दूर करने का नारा देकर अमीरों को प्रोत्साहन तो नहीं दे रही है? इस तरह की मानसिकता राष्ट्र को कहां ले जाएगी? ये कुछ प्रश्न अमीरी गरीबी की बढ़ती खाई और उसके तथ्यों पर मंथन को जरूरी बनाते हैं। क्या देश एवं दुनिया में गैर बराबरी घट रही है या बढ़ रही है? वर्ल्ड इनिक्वालिटी रिपोर्ट बताती है कि नब्बे के दशक से लेकर अब तक पूरी दुनिया में गैर बराबरी बढ़ी है। भारत में अमीर और गरीब के बीच खाई और भी तेजी से बढ़ी है। कोविड महामारी का दुनिया में गैर बराबरी पर क्या असर पड़ा, इसके आंकड़े हमें वर्ल्ड बैंक द्वारा 2022 में प्रकाशित रिपोर्ट से मिलते हैं। इस रिपोर्ट के मुताबिक महामारी से पूरी दुनिया में गरीब और अमीर के बीच खाई और ज्यादा चौड़ी हो गई। पूरी दुनिया में कोई 7 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे धकेल दिए गए। इनमें से सबसे बड़ी संख्या भारत से थी जहां इस महामारी के चलते 5 करोड़ से अधिक परिवार गरीबी रेखा से नीचे आ गए। पूंजी का बहाव भारत जैसे देशों की तरफ हो रहा है, जिनकी इकॉनमी कई लोकल और ग्लोबल वजहों से बूम कर रही है। लेकिन इसका लाभ केवल दो-चार लोगों को ही क्यों मिले? रिलायंस, अडानी, इंफोसिस, विप्रो, या दूसरी कंपनियों की कामयाबी भारतीय उद्यमशीलता की कामयाबी भले हो, लेकिन ऐसी हर कामयाबी अपने साथ नाकामियों का हिसाब भी लेकर चलती है, असंतुलन को न्यौतती हैं, दुःख, अभाव एवं असंतोष बढ़ाती है। अब देखते हैं नये बजट में सरकार इन ताजा आंकड़ों पर ध्यान देते हुए भारत की टैक्स-व्यवस्था में कुछ सुधार करती है या नहीं?

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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