लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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-लिमटी खरे

चूल्हे में हगें, शनीचर को दोष दें. . .

बुंदेलखण्ड की बहुत पुरानी कहावत है -‘‘चूल्हे में हगें, शनीचर को दोष दें. . .। अर्थात पुराने जमाने के शौचालयों के बजाए अलह सुब्बह जाकर चूल्हे में जाकर पॉटी कर दी और सुबह जब देखा तो कहने लगे शनी भारी हो गया है हमारे घर की रसोई में चूल्हे में पॉटी पड़ी है। इसी कहावत को मध्य प्रदेश की शिवराज सरकार चरितार्थ कर रही है। मध्य प्रदेश से होकर गुजरने वाले राष्ट्रीय राजमार्गों के रखरखाव हेतु केंद्रीय भूतल परिवहन मंत्रालय द्वारा हाथ खींच लिए जाने के आरोप के साथ ही मध्य प्रदेश भाजपा द्वारा भूतल परिवहन मंत्री कमल नाथ के खिलाफ सड़कों पर उतरने की बात कही जा रही है। भूतल परिवहन मंत्रालय के उच्च पदस्थ सूत्रों का दावा है कि मध्य प्रदेश सरकार द्वारा नेशनल हाईवे के संधारण के प्रस्तावों को महालेखाकार लेखा एवं हकदारी ग्वालियर के माध्यम से केंद्र को भेजना था, वह अभी तक नही भेजे गए हैं, कुछ प्रस्ताव केंद्र को प्राप्त भी हुए थे किन्तु त्रुटिपूर्ण होने के चलते केंद्र ने इन्हें नामंजूर कर दिया था। सूत्रों का आरोप है कि मध्य प्रदेश के नेशनल हाईवे के रखरखाव के लिए केंद्र सरकार से आने वाली भारी भरकम रकम में पिछले नौ सालों के रिकार्ड में जबर्दस्त गड़बड़झाला है। केंद्र सरकार को प्रस्ताव न भेजकर मध्य प्रदेश ने अपने ही खजाने में तकरीबन तीस करोड़ रूपए की चपत लगा ली है।

सात दिन पहले जागे कलमाड़ी!

राष्ट्रमण्डल खेलों की मेजबानी 2003 में मिल गई थी, और आयोजन होना था 2010 में अर्थात सात सालों का समय था भारत के पास। आयोजन समिति पर भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगते रहे। न केवल भारत गणराज्य के प्रधानमंत्री वरन् कांग्रेस की राजमाता श्रीमति सोनिया गांधी, युवराज राहुल गांधी सहित विपक्ष भी अर्थमोह में ‘ध्रतराष्ट्र‘ की भूमिका में रहा। आयोजन के महज सात दिन पहले सुरेश कलमाड़ी को ‘दिव्य ज्ञान‘ की प्राप्ति हुई, और उन्होंने अपनी गल्ती स्वीकार की है, कि अभी बहुत काम होना बाकी है। कलमाड़ी सोच रहे होंगे के अंतिम समय में सच को स्वीकार करने से वे अपनी जवाबदारी से बच जाएंगे। कलमाड़ी की अंतिम समय में स्वीकारोक्ति किसी ओर के नहीं वरन् प्रधानमंत्री डॉ..मनमोहन सिंह और कांग्रेस एवं संप्रग अध्यक्ष श्रीमति सोनिया गांधी के गाल पर करारे तमाचे से कम नहीं है। जिसे वे भले ही महसूस न कर पा रहे हों पर इसकी गूंज, अनुगूंज, प्रतिध्वनि न केवल भारत में वरन् समूचे विश्व में जोर से सुनाई दे रही है।

तीसरी महाशक्ति बना भारत गणराज्य

भ्रष्टाचार, अनाचार, नक्सलवाद, अलगाववाद, माओवाद, आतंकवाद, प्रांतवाद, भाषावाद आदि की जद में कराहने वाले भारत गणराज्य के नागरिकों के लिए यह खबर खुशी देने के लिए पर्याप्त मानी जा सकती है कि भारत गणराज्य को विश्व की तीसरी महाशक्ति के तौर पर पहचाना गया है। जी हां, अमेरिका की सरकारी रिपोर्ट में 2010 के ताकतवर देशों की फेहरिस्त में अमेरिका, चीन के बाद भारत को स्थान दिया जाना निश्चित तौर पर भारत के लिए गर्व की बात है। इस सूची के अनुसार दुनिया की 22 फीसदी ताकत अमेरिका के पास, 12 फीसदी चीन के पास, भारत के पास आठ प्रतिशत तो जापान, ब्राजील और रूस के पास 5 – 5 प्रतिशत ताकत है। इतना ही नहीं अनुमान 2025 को लेकर लगाया गया है, जिसमें अमेरिका की ताकत 4 प्रतिशत घटकर जताई गई है, 2025 में अमेरिका की ताकत 18 फीसदी, यूरोपीय संघ की 14 फीसदी और भारत की ताकत में दो अंको का इजाफा होकर यह 10 फीसदी होने का अनुमान लगाया गया है।

बाढ़ से निपटने तैयार नहीं हैं सूबे

कितने आश्चर्य की बात है कि भारत गणराज्य द्वारा 35 साल पहले बनाए गए एक विधेयक को सूबाई सरकारों ने कानून के तौर पर मान्यता नहीं दी है। केंद्रीय जल आयोग द्वारा 1975 में बनाए गए मॉडल फ्लड बिल को देश में राजस्थान और मणिपुर द्वारा ही कानूनी तौर पर मान्यता दी है। इस विधेयक के तहत बाढ संभावित निचले इलाकों में रिहाईशी या व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के बजाए बाग बगीचे अथवा खेल के मैदान बनाने की बात कही गई थी, जिसका कारण यह था कि अतिवर्षा या बाढ़ की स्थिति में जान माल की सुरक्षा करना प्रमुख था। आश्चर्य तो तब हुआ जब 35 सालों के बाद भी राजस्थान और मणिपुर को छोडकर किसी भी सूबे की सरकार ने विधानसभा में इसे पेश करके इसे कानूनी तौर पर मान्य नहीं किया है। घोर आश्चर्य तो तब होता है जब कांग्रेस की केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए बिल को सालों साल सूबों पर राज करने वाली कांग्रेस की ही राज्य सरकारों द्वारा उपेक्षा की नजर से देखा गया हो।

दिग्गी की राह पर लालू

राजनीति में वंशवाद, परिवारावद जमकर हावी होता दिख रहा है। कांग्रेस के ताकतवर महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपने पुत्र जयवर्धन को 2013 में राजनीति में लांच करने की योजना बना रखी है, तो भला स्वयंभू प्रबंधन गुरू लालू प्रसाद यादव उससे पीछे कैसे रहते। लालू यादव ने भी अपने क्रिकेटर पुत्र तेजस्वी यादव को राजनीति में उतारकर उसे अपनी राजनैतिक विरासत सौंपने का मानस बना लिया है। पटना में लालू यादव ने अपने पुत्र तेजस्वी को मंच से बाकायदा चुनाव प्रचार की जवाबदारी सौंपकर जता दिया है कि आने वाले समय में राजद के सुप्रीमो के चेयरपर्सन उनके पुत्र तेजस्वी ही होंगे। अरे भई जब नेहरू गांधी परिवार का मूल ‘‘व्यवसाय‘‘ ही ‘‘इक्कीसवीं सदी की जनसेवा‘‘ बन गया हो तो भला फिर नेहरू गांधी परिवार को आदर्श मानने वाले राजनेता इससे भला पीछे कैसे रहेंगे।

जमुना देवी: एक युग का अवसान

मध्य प्रदेश की लौह महिला का अघोषित खिताब पाने वाली आदिवासी नेता जमुना देवी की आवाज शांत हो गई। 1952 से मध्य प्रदेश विधानसभा में लगातार गूंजने वाली आवाज को अब नही सुना जा सकेगा। वे 1952 से 1957 तक मध्य भारत विधानसभा की सदस्य रहीं। 1962 से 1967 तक लोकसभा सदस्य, 1985 में राज्य मंत्री मध्य प्रदेश सरकार, 1998 में उपमुख्यमंत्री बनीं और 16 दिसंबर 2003 को नेता प्रतिपक्ष बनीं। इसके बाद 07 जनवरी 2009 को पुनः नेता प्रतिपक्ष चुनी र्गइं। जमुना बुआ इकलौती ऐसी महिला जनसेवक रहीं जिन्हांेने कभी भी नीतियों के साथ समझौता नहीं किया। पूर्व मुख्यमंत्री एवं महासचिव राजा दिग्विजय सिंह ने अपने दस साल के कार्यकाल में भले ही कुंवर अर्जुन सिंह, स्व.माधवराव सिंधिया, शुक्ल बंधुओं, अजीत जोगी, कमल नाथ जैसे क्षत्रपांे को पानी पिलाया हो, पर जमुना बुआ की एक हुंकार पर राजा दिग्विजय सिंह जैसे नेता भी सहम ही जाते थे। अंतिम समय तक वे सक्रिय राजनीति में रहीं। जमुना बुआ का निधन कांग्रेस के लिए क्षति अवश्य है, पर उनके जाने से राजनैतिक क्षेत्र में हुई रिक्तता की भरपाई शायद ही हो पाए। मध्य प्रदेश विधानसभा में गूंजने वाली एक दबंग आवाज अब शांत हो गई है।

बंगाल की रेलमंत्री

कांग्रेस को न जाने क्या हो गया है कि वह केंद्र मंे सत्ता की मलाई चखनेे के लिए अपने सहयोगियों के हर सितम को हंस हंस कर सह रही है। कांग्रेस चाहे जो करे पर इससे सीधे सीधे नुकसान तो रियाया का ही हो रहा है। संप्रग – 2 में रेल मंत्री बनी ममता बनर्जी का उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ पश्चिम बंगाल की कुर्सी पर काबिज होना दिख रहा है। भारतीय रेल किस दिशा में जा रही है, इस बात से रेल मंत्री ममता बनर्जी को लेना देना नहीं है। पूर्व रेल मंत्री लालू यादव भी शांत भाव से सब कुछ देख सुन रहे हैं। विपक्ष के सारे दल भी मूकदर्शक हैं। रेल दुर्घटनाओं में इजाफा और रेल सुविधाओं में कमी साफ साफ दिखाई पड़ रही है। रेल मंत्री को इन सारी बातों से कोई सरोकार नहीं है, उनका प्रथम उद्देश्य पश्चिम बंगाल की कुर्सी पर काबिज होना ही है। इसलिए वे कई माहों से पश्चिम बंगाल में ही डेरा डाले हुए हैं। अब तो लोग ममता बनर्जी को भारत गणराज्य की रेल मंत्री के बजाए पश्चिम बंगाल की रेलमंत्री के नाम से भी जानने लगे हैं।

घर के लड़का गोंही चूसें, मामा खाएं अमावट

देश के सांसद विधायकों के वेतन भत्तों और अन्य सुविधाओं को देखकर दो वक्त की रोजी रोटी की जद्दोजहद में लगा आम आदमी दांतो तले उंगली दबा लेता है। देश की रक्षा करने वाले वीर सपूतांे के परिवार किस हालत में हैं, इस बात से किसी जनसेवक को लेना देना नहीं है। जनसेवकों की अपनी अंटी में पैसा और सुविधाएं बरकरार रहंे, बस इसके अलावा उन्हें और अधिक कुछ नहीं चाहिए। आपको यह जानकर घोर आश्चर्य होगा कि देश के खुले बाजार में जब दालें 80 रूपए प्रति किलो से अधिक की दर से बिक रही हैं, तब सेना के एक अधिकारी की बेवा को महज अस्सी रूपए प्रतिमाह पेंशन मिल रही है। सेना के दिवंगत मेजर धरमचंद ने भारत पाक के बीच हुए 1947 – 48 एवं 1965 के तथा चीन के साथ हुए 1962 के युद्ध में भाग लिया था। दिवंगत मेजर को उत्कृष्ठ सेवाओं के लिए 14 मेडल भी मिले थे। देश की सबसे बड़ी अदालत ने भी इस मामले में संज्ञान लेते हुए सरकार को फटकार लगाई है। देश की सेवा के लिए प्राणों को न्योछावर करने वाले वीर योद्धाओं के परिवारों की बदहाली से भला जनसेवकों को क्या लेना देना।

औंधे मुंह गिरा आरटीई

शिक्षा का अधिकार (राईट टू एजूकेशन, आरटीई) को कांग्रेसनीत संप्रग सरकार ने जोर शोर से लागू तो कर दिया, किन्तु होमवर्क के बिना लागू आरटीई लागू होते ही औंधे मुंह गिर गया है। देश की महज 14 फीसदी आबादी को ही इस बारे में पता है कि आरटीई किस चिडिया का नाम है। एक सर्वे में यह खुलासा हुआ है कि पंजाब में सबसे अधिक 79 फीसदी, महाराष्ट्र में 55, हरियाणा में 23, बिहार में 21, यूपी में 13, राजस्थान में 12, झारखण्ड मे छ‘, एमपी में महज चार, और देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली में तो यह आंकड़ा शून्य से भी नीचे जाकर दशमलव आठ फीसदी पर आकर टिक गया है। जब राजनेताओं की नाक के नीचे दिल्ली में ही लोगों को शिक्षा के अधिकार के कानून का भान नही है तो फिर सुदूर ग्रामीण अंचलों में तो इस कानून के बारे में भगवान ही मालिक है। वैसे भी शिक्षा को लेकर आजादी के बाद नित नए प्रयोग होते रहे हैं। आज की युवा पीढ़ी आजादी के मायने ही भूलती जा रही है। शिक्षा को लेकर दी जाने वाली सुविधाओं के बारे में भी आम विद्यार्थी या पालक को कोई खास जानकारी नहीं है।

खुद या परिजन को टिकिट दिलाने जुटे कांग्रेसी

बिहार में चुनावों की गहमा गहमी काफी हद तक बढ़ चुकी है। कांग्रेस का राष्ट्रीय मुख्यालय 24 अकबर रोड़ इन दिनों बिहार सदन में तब्दील हो गया है। बिहार से आए नेताओं द्वारा कांग्रेस के नेशनल हेडक्वार्टर की देहरी को चूमा जा रहा है। कांग्रेस के आला नेताओं की समस्या यह है कि बिहार से आए पूर्व विधायक, वर्तमान विधायक, पूर्व सांसद आदि या तो खुद को ही टिकिट देने की पेरवी कर रहे हैं, या फिर उनकी प्राथमिकता है कि उनके बेटे, बेटी, बहू या दामाद को टिकिट देकर उपकृत किया जाए। बताते हैं कि प्रदेशाध्यक्ष रामजतन सिन्हा जहानाबाद से अपने पुत्र के लिए, कृष्णा शाही बेगूसराय से अपनी बहू के लिए, अशोक राम अपने बेटे के लिए सुरक्षित सीट से टिकिट चाह रहे हैं। एसी सूची बहुत ही लंबी है, जिसमें खुद के लिए या अपने परिजनों के लिए टिकिट मांगी जा रही है। सूत्रांे का कहना है कि बिहार की सूची को लेकर कांग्रेस के आला नेता भी असमंजस में हैं, यही कारण है कि दस जनपथ जाकर सूची बार बार वापस आ रही है।

शिशु मृत्यु दर रोकने में भारत असफल

दुनिया भर में हर साल 81 लाख बच्चे अपना पांचवा जन्म दिन मनाने के पहले ही काल के गाल में समा जाते हैं। शिशुओं की मौत के मामले में पिछले दो दशकों में एक तिहाई कमी आई है। इस मामले में चिंताजनक तथ्य यह है कि इन दो दशकों में भारत शिशुदर मृत्यु रोकने में लगभग नाकामयाब ही रहा है। यूनिसेफ के आंकड़ों पर अगर गौर फरमाया जाए तो दुनिया भर में होने वाली बच्चों की मौत में से आधी अर्थात पचास फीसदी मौतें भारत, नाईजीरिया, पाकिस्तान, चीन और कांगों में होती है। वैसे शिशुओं की मृत्यु अफ्रीका में बहुत ज्यादा होती है। इस क्षेत्र में आठ में से एक बच्चे की मौत पांच साल में हो जाती है। यूनिसेफ के आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा दर 2015 तक सहस्त्राब्दी विकास लक्ष्य हासिल करने के लिहाज से अभी पूरी तरह से अपर्याप्त ही मानी जा रही है। 1990 के दशक में विश्व की शिशु मृत्युदर हर साल एक एक करोड़ 24 लाख थी, जो घटकर 81 लाख पर पहुंच गई है।

एमपी में हैं 51 हजार धर्मस्थल अवैध

हिमाचल प्रदेश को भले ही देवभूमि कहा जाता हो, किन्तु देश के हृदय प्रदेश में अवैध धर्मस्थलों की भरमार है। देश की सबसे बड़ी अदालत में सूबे के मुख्य सचिव द्वारा दायर हलफनामे के अनुसार मध्य प्रदेश में 51 हजार से ज्यादा धर्मस्थल अवैध तौर पर बने हुए हैं। एक ओर जहां विकास के नए आयामों में मध्य प्रदेश पिछड़ रहा हो, किन्तु धर्म स्थलों वह भी अवैध रूप से निर्मित होने वाले धर्मस्थलों के मामले में देश का यह सूबा अपने परचम लहरा रहा है। गौरतलब है कि पिछले साल सितम्बर में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि राज्य सरकारें सार्वजनिक स्थलों, सड़कों, नुक्कड़ों, उद्यानों आदि में मंदिर, मस्जिद, गुरूद्वारे, गिरजाघर या अन्य धार्मिक स्थलों के निर्माण की अनुमति कतई न दें। मध्य प्रदेश में जहां चाहे वहां धर्मस्थलों के निर्माण से एक ओर जहां आवागमन बाधित होता है, वहीं दूसरी ओर जब तब कानून और व्यवस्था की स्थिति निर्मित होती रहती है।

पुच्छल तारा

हिन्दुस्तान के वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश द्वारा वन्य जीवों विशेषकर बाघांे को बचाने के लिए आम आदमियों के लिए बनने वाले बांध, सड़क, रेलमार्ग आदि को रोककर अपनी पीठ थपथपाई जा रही है। दिल्ली में नेशनल मीडिया भी चंद दिनों से जयराम रमेश की तारीफों में कसीदे गढ़ रहा है, कारण चाहे जो भी हो, पर जयराम रमेश की छवि मानव विरोधी और वन्य जीव प्रेमी की बन गई है। कोटा राजस्थान में अध्ययनरत पिं्रस सिंह राजपूत ने एक बड़ा ही दिलचस्प ईमेल भेजा है। वे लिखते हैं कि टाईगर 1411 बचे हैं किन्तु भारत में पुरूष और महिला का अनुपात 1000: 824 है। अरे भईया, टाईगर बाद में बचाना पहले बच्चियों को बचा लो, क्योंकि टाईगर को बचाकर क्या उखाड़ लोगे? शेरनी पटने से तो रही और पट भी गई तो क्या बाघिन से शादी का जोखम उठा सकते हो. . .।

One Response to “ये है दिल्ली मेरी जान”

  1. शैलेन्‍द्र कुमार

    शैलेन्द्र कुमार

    पुच्छल तारे का कोई विकल्प नहीं

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