डा.रमेश ठाकुर
ओ-जोन संरक्षण के नाम पर राजधानी में यमुना किनारें बसी वर्षों पुरानी तकरीबन 94 आवासीय कालोनियों में रहने वाले 15-16 लाख लोगों पर बेघर होने का खतरा अचानक से मंडराया है। घरों को उजड़ने को लेकर डीडीए ने बकायदा नोटिस भी कालोनियों में चस्पा कर दिया है। इसके पीछे सरकार का तर्क है ओ-जोन क्षेत्र का पर्यावरणीय संरक्षण करना। फैसला केंद्रीय आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय एंव दिल्ली सरकार ने संयुक्त रूप से लिया है जिसको आधार ‘दिल्ली मास्टर प्लान-2021’ को बनाया है। बस्तियों को तोड़ने के लिए बुलडोजर भी तैयार हैं। अपने घरों से बेदखली के भय ने लोगों के चेहरों पर चिंताभरी सिलवटें उगा दी हैं हालांकि दिल्ली सरकार भरोसा दिला रही है कि जो भी निर्णय होगा, मानवता को ध्यान में रखकर किया जाएगा। मुआवजा और वैकल्पिक आवासीय व्यवस्था भी की जाएगी पर लोगों में बेघर होने का डर उनके भीतर तक बैठ गया है। गुपचुप सरकार की तैयारियों को देखकर भी कॉलोनीवासी चिंतित हैं । भय को लेकर हाहाकार मचा हुआ है। रातों में लोग सो नहीं रहें। उन्हें डर हैं कि कहीं रात के अंधेरे में उनके घर उजाड़ ना दिए जांए।
इसको सियासी पक्ष-विपक्ष भी आमने-सामने हैं। मुख्य विपक्षी दल आम आदमी पार्टी पीड़ितों के पक्ष में आवाज बुंलद किए हुए हैं। सवाल उठता है ओ-जोन प्रक्रिया 5 वर्ष पूर्व तैयार हुई थी, तो अचानक घरों को उजाड़ने का निर्णय क्यों? इस पर सरकारी पक्ष बेशक कुछ न बताए, लेकिन यह एक्शन मालवीय नगर अग्निकांड के बाद लिया गया है। घटना के बाद सरकार ने अवैध निर्माणों, खादर क्षेत्रों में अवैध निर्र्णीय गतिविधियों और डूब क्षेत्र इलाकों में हुई नियम विरुद्ध कार्यों की समीक्षा में पाया कि ओ-जोन में जितने भी निर्माण कार्य हुए हैं, उन्हें बिना देर किए जमींदोज किया जाए ताकि, भविष्य में बाढ़ या प्रकृतिक किसी भी कुदरती आपदाओं के चलते कोई जानमाल की हानि न हो सके लेकिन, क्या एक साथ लाखों लोगों को बेघर कर देना संभव होगा, मानवीय आधार पर तो फिलहाल कतई नहीं लगता?
समूचे भारत की बात करें तो ओ-जोन क्षेत्र में महानगरों से लेकर बड़े-छोटे करीब 86 शहर बसें हैं। क्या दिल्ली के बाद उनको भी निशाने पर लिया जाएगा। देखा जाए तो विदेशों में उनकी ज्यादातर राजधानियां नदियों और समुद्रों के तटों पर ही सदियों से बसी हैं लेकिन उनकी बनावट ऐसी है कि कोई खतरा नहीं? नदियों के तट विशाल दीवार और आधुनिक मजबूतियों से लबरेज हैं। नदियों-झीलों के किनारे बसे शहरों की सुंदरता, बहता नीला पानी देखने लायक होती है। ऐसा भारत में भी किया जा सकता है लेकिन हमारे यहां की नदियों, नालों और झीलों के तट इतने बदसूरत होते हैं जहां पल भर बैठना भी दूभर होता है। बाड़बंदी, तटीय सुरक्षा, दीवारें तो ज्यादातर बनीं ही नहीं हैं। मानसून के वक्त इनका पानी बाहर निकल कर बाढ़ में तब्दील हो जाता है जबकि, विदेशों में बारिश के पानी को गंभीरता के साथ संरक्षित किया जाता है। दिल्ली में ओ-जोर क्षेत्र करीब 22 किलोमीटर में हैं। अगर दोनों ओर मजबूत दीवारें बनवाई गईं होती, जिससे पानी बाहर न फैले और सौन्दर्यकरण किया गया होता तो न बसी-बसाई कालोनियों को उजाड़ा जाता और न ही ओ-जोन क्षेत्र असुरक्षित होता।
दिल्ली में ओ-जोन का क्षेत्रफल लगभग 9700 हेक्टयर में फैला है जो वजीराबाद से लेकर ओखला विहार तक अधिकृत है जिसमें लालकिले के एक हिस्से से लेकर राजघाट, अक्षरधाम मंदिर की सीमाएं भी जुड़ी हैं। विपक्ष का विरोध भी इन्हीं के इर्द-गिर्द है। आम आदमी पार्टी कहती है क्या अक्षरधाम मंदिर से लेकर राजघाट, लालकिला और आगरा का ताजमहल भी उजाड़ा जाएगा? हालांकि, यह सवाल भी वाजिब है कि दिल्ली में यमुना किनारे बाढ़ क्षेत्र में अतिक्रमणों की भरमार बीते एकाध दशकों के भीतर हुई जिसको लेकर दिल्ली हाई कोर्ट से लेकर राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने भी चिंता जताई है। एनजीटी ने तो कई मर्तबा अवैध निर्माणों को लेकर हर्जाना भी वसूला लेकिन पूर्ववर्ती सरकारों की उदासीनता के चलते डूब क्षेत्रों में अवैध निर्माण लगातार होते रहे। मानसून में जब यमुना फनफनाती है तो उसका पानी अधिकृत ओ-जोन क्षेत्रों में घुसकर बाढ़ में परिवर्तित हो जाता है।
ओ-जोन को लेकर कुछ भ्रम की स्थिति भी लोगों में व्याप्त है। कुछ लोग ओ-जोन को वायुमंडल के ओजोन लेयर से जोड़कर देख रहे हैं जबकि, ऐसा बिल्कुल भी नहीं. दोनों आपस में भिन्न-भिन्न हैं। ओ-जोन का मुख्य मकसद पर्यावरण संरक्षण और बाढ़ को नियंत्रण करना होता है। असल में यह ऑक्सीजन जोन या एक इकोलॉजिकल जोन का शार्ट फार्म है। फिलहाल ओ-जोन के हौवे के चलते लाखों लोग बेघर के डरावने साए में जीने को मजबूर हैं। मानवता के आधार पर इस मामले का पटाक्षेप किया जाना अत्यंत जरूरी है। सवाल यहां ये भी उठता है कि जो लोग दशकों से रह रहे हैं, उन्हें हटाने की खबर शासन-प्रशासन ने इतने वर्षों में क्यों नहीं ली। घर उजड़ने के डर से एकजुट हुए हजारों लोगों को हटाना प्रशासन के लिए भी चुनौती होगी।
डा.रमेश ठाकुर