क्या चुनाव आयोग की तरह HDFC बैंक भी ‘सुरक्षित हाथों’ में है?
राजकुमार अग्रवाल
शायरी के शौकीन और 1984 बैच के पूर्व आईएएस (IAS) अधिकारी राजीव कुमार, जो देश के 25वें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) रह चुके हैं, अब निजी क्षेत्र के सबसे बड़े बैंकों में से एक, HDFC Bank के चेयरमैन पद की कमान संभालने जा रहे हैं। सरकारी सेवा और संवैधानिक संस्थाओं के गलियारों से निकलकर कॉरपोरेट जगत के शीर्ष पायदान पर पहुंचने की यह यात्रा जितनी चमकदार दिखती है, उतनी ही यह देश की आम जनता, आर्थिक विश्लेषकों और लोकतांत्रिक विचारकों के मन में गंभीर विमर्श भी खड़े करती है।
जब देश की सबसे बड़ी चुनावी नियामक संस्था का मुखिया सीधे एक विशाल वित्तीय साम्राज्य के शीर्ष पर बैठता है तो सार्वजनिक चर्चा होना स्वाभाविक है। आम खाताधारकों और राजनीतिक विश्लेषकों के मन में यह सवाल उठने लगा है कि जिस तरह चुनाव आयोग के कार्यकाल के दौरान निष्पक्षता और स्वतंत्रता को लेकर तीखी बहसें हुई थीं, क्या उसी तरह देश के आम खाताधारकों की गाढ़ी कमाई और banking governance पर भी इसका कोई प्रभाव पड़ेगा? आइए, इस पूरे घटनाक्रम, पूर्व CEC के रूप में राजीव कुमार के कार्यकाल, और देश के वित्तीय परिदृश्य पर इसके संभावित प्रभावों का एक संतुलित, तथ्यात्मक और निष्पक्ष विश्लेषण करते हैं।
संवैधानिक गरिमा और प्रशासनिक चुनौतियां: CEC के रूप में कार्यकाल
राजीव कुमार का मुख्य चुनाव आयुक्त के रूप में कार्यकाल (2022-2025) देश के इतिहास में सबसे अधिक चर्चा और बहस का केंद्र रहा। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव आयोग को एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संस्था का दर्जा दिया गया है, जिसका काम बिना किसी बाहरी दबाव के चुनाव संपन्न कराना है। उनके समर्थकों का मानना है कि उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव और जम्मू-कश्मीर सहित 31 राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों में पूर्ण चुनाव चक्र को न्यूनतम हिंसा और प्रशासनिक कुशलता के साथ पूरा कराया करा दिया था।
इसके विपरीत, विपक्ष (कांग्रेस, टीएमसी, आप आदि) और राजनीतिक आलोचकों ने उनके कार्यकाल पर पक्षपात के गंभीर आरोप लगाए। आलोचकों का तर्क था कि आदर्श आचार संहिता (MCC) के कथित उल्लंघनों पर सत्तापक्ष के प्रति नरमी बरती गई जबकि विपक्षी नेताओं पर त्वरित कार्रवाई हुई। टर्नआउट डेटा में देरी, ईवीएम-वीवीपीएटी मिलान की अपारदर्शिता और असम डेलिमिटेशन (परिसीमन) को लेकर भी तीखे सवाल उठे। हालांकि, चुनाव आयोग ने हमेशा इन आरोपों का लिखित खंडन किया और सुप्रीम कोर्ट ने भी चुनावी प्रक्रियाओं को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं को खारिज कर आयोग की प्रशासनिक व्यवस्था पर मुहर लगाई।
टी.एन. शेषन युग बनाम वर्तमान दौर
जब भी भारतीय चुनाव आयोग की बात होती है, तो पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन का नाम स्वतः ही जेहन में आ जाता है, जिन्होंने आयोग को एक अत्यंत शक्तिशाली और स्वायत्त संस्था के रूप में स्थापित किया था। आलोचकों का कहना है कि वर्तमान दौर में संस्थागत स्वतंत्रता और कार्यकारी नियंत्रण के बीच की खाई बढ़ी है, जिससे ‘ट्रस्ट डेफिसिट’ (विश्वास की कमी) की स्थिति पैदा हुई है। लोकनीति-CSDS के सर्वेक्षणों में भी संस्थाओं के प्रति जनता के विश्वास में उतार-चढ़ाव की बात सामने आई है, जो लोकतांत्रिक स्वास्थ्य के लिए एक महत्वपूर्ण विचारणीय बिंदु है।
HDFC बैंक के चेयरमैन पद पर नियुक्ति: कॉरपोरेट गवर्नेंस की कसौटी
अब बात करते हैं उस नए मोड़ की, जिसने देश के करोड़ों खाताधारकों को सोचने पर मजबूर कर दिया है। HDFC बैंक केवल एक बैंक नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी माना जाता है। इसमें देश के मध्यम वर्ग, नौकरीपेशा लोगों और छोटे व्यापारियों की जीवनभर की जमा पूंजी सुरक्षित है। पूर्व वित्त सचिव (Finance Secretary) के रूप में राजीव कुमार के पास बैंकिंग सुधारों, विलय (HDFC-HDFC Bank Merger) और वित्तीय नियामक ढांचे का एक लंबा और ठोस अनुभव है, जो बैंक प्रबंधन के लिए बेहद उपयोगी साबित हो सकता है।
सरकारी सेवा से सेवानिवृत्ति के बाद कॉरपोरेट सेक्टर में जाना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन हितों के टकराव (Conflict of Interest) को लेकर उठने वाले नैतिक सवाल भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। आम जनता में यह चिंता रहती है कि क्या बैंकिंग नीतियों और बड़े कॉरपोरेट ऋणों के आवंटन में किसी भी प्रकार का राजनीतिक प्रभाव काम कर सकता है?
हालांकि, यहाँ यह समझना बेहद आवश्यक है कि भारतीय बैंकिंग प्रणाली पूरी तरह रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के कड़े नियमों, प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग और एनपीए (NPA) मानदंडों के अधीन काम करती है। बैंक का बोर्ड, ऑडिटर्स, शेयरहोल्डर्स और केंद्रीय एजेंसियां (CBI, ED, RBI) प्रत्येक बड़े वित्तीय लेनदेन पर पैनी नजर रखते हैं। इसलिए, किसी भी संस्थान को सीधे तौर पर राजनीतिक प्रभाव में बताना अतिशयोक्ति होगी, लेकिन क्रोनिविज्म (सांठगांठ की पूंजीवाद) के आरोपों के प्रति सजग रहना बैंकिंग साख के लिए अनिवार्य है।
संस्थागत साख और जनता की सजगता
देश की राजनीतिक बहस में अक्सर यह दावा किया जाता है कि “2014 से देश सुरक्षित हाथों में है।” राजनीतिक मोर्चे पर जनता किसे चुनती है, यह उसका लोकतांत्रिक अधिकार है।लेकिन जब बात आर्थिक सुरक्षा और जीवनभर की जमा पूंजी की आती है, तो सजगता और जागरूकता ही सबसे बड़ा हथियार बनती है। नागरिकों को केवल राजनीतिक वादों या अफवाहों के भरोसे रहने के बजाय अपने वित्तीय संस्थानों की गतिविधियों, बैंक की बैलेंस शीट और नियामक बदलावों पर बारीक नजर रखनी चाहिए।
चाहे वह चुनाव आयोग हो, न्यायपालिका हो, या फिर रिजर्व बैंक और बड़े वित्तीय संस्थान—इन सभी की स्वायत्तता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता ही देश के लोकतंत्र की नींव है। बिना ठोस सबूतों के किसी संस्थान को पूरी तरह पूर्वाग्रही कहना गलत होगा, परंतु संस्थाओं की पारदर्शिता को लेकर निरंतर सवाल उठाना और उन्हें जवाबदेह बनाना एक जीवंत लोकतंत्र की पहचान है।
सजग नागरिकता ही लोकतंत्र का आधार
राजीव कुमार की शायरी के अंदाज में कहें तो, इकरार और वफ़ा के दावों के बीच असल कसौटी कर्मों की होती है। चुनाव आयोग के प्रमुख के रूप में उनके प्रशासनिक फैसलों पर जो बहसें हुईं, वे इतिहास का हिस्सा हैं। लेकिन अब, HDFC बैंक के चेयरमैन के रूप में उनकी भूमिका सीधे तौर पर देश की आर्थिक साख और जनता के भरोसे से जुड़ी हुई है।
भारत के नागरिकों को अब और अधिक सावधान, जागरूक और विश्लेषणात्मक होना होगा। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे लोकतांत्रिक संस्थान और वित्तीय दुर्ग दोनों ही सुरक्षित और पारदर्शी बने रहें, ताकि किसी भी आम नागरिक को अपनी जमा पूंजी या अपने वोट की ताकत को लेकर असमंजस में न रहना पड़े। सजग रहें, क्योंक लोकतंत्र और अर्थव्यवस्था दोनों की मजबूती आपके जागरूक रहने पर ही टिकी है।
राजकुमार अग्रवाल
(वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक और ‘दैनिक अटल हिन्द’ के सम्पादक)