कविता

हर अपना अपना नहीं

हर अपना अपना नहीं, भ्रम में रहना छोड़ ।
समय पड़े तो देखिए, कौन निभाता जोड़ ।।

रावण को विश्वास था, कुल है पूरा साथ ।
सत्य सामने आ गया, छूट गए सब हाथ ।।

कुंभकर्ण ने साथ दे, निभाया भ्रातृ धर्म ।
सच का स्वर दबा रहा, अधूरा रहा कर्म ।।

सत्य विभीषण ने कहा, सह न सका अन्याय ।
अपनों ने ही त्याग कर, दी उसको तब हाय ।।

साथ खड़ा होना नहीं, बस रिश्ते की बात ।
गलत राह से रोक दे, वह है सच्चा साथ ।।

गलती पर जो मौन रह, कैसा उसका नेह ।
पास रहे सच ना कहे, मन में कैसी हेय।।

परिवार वही आईना, दिखला दे सच रूप ।
गिरने से ही थाम ले, दूर करे हर कूप ।।

सुख में तो सब साथ हैं, दुख में मिले न मीत।
जो विपदा में साथ दे, समझो सच्ची प्रीत।।

भटके पथ पर रोककर, जो दिखला दे राह ।
वही सगा कहलाएगा, वह है सच्ची चाह ।।

रिश्ते केवल रक्त के, होते नहीं महान ।
सत्य, विश्वास प्रेम से, बनता सच्चा मान ।।

समय सभी को परखता, खुल जाता व्यवहार ।
कौन पराया, कौन सँग, होता साफ विचार ।।

अंत समय बस यह समझ, जीवन का निष्कर्ष ।
हर अपना अपना नहीं, सच्चा दुर्लभ हर्ष ।।

-डॉ. प्रियंका सौरभ