राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का आज जो विशाल स्वरूप दिखाई देता है, उसके पीछे हजारों प्रचारकों, स्वयंसेवकों और कार्यकर्ताओं का दशकों का निस्वार्थ तप, त्याग और संघर्ष छिपा हुआ है। आज की पीढ़ी जब सुसंगठित शाखाओं, कार्यालयों और सेवा कार्यों को देखती है, तो शायद उसे यह अनुमान भी नहीं होता कि इस विराट वटवृक्ष का बीजारोपण कितनी कठिन परिस्थितियों में हुआ था।
हिसार के अनेक वरिष्ठ एवं पुराने स्वयंसेवकों से सुनने को मिलता है कि 1940 के दशक में नागपुर से एक युवा प्रचारक, जिन्हें सभी स्नेहपूर्वक “अनु जी” कहकर संबोधित करते थे, संघ कार्य के विस्तार के उद्देश्य से हिसार आए थे। उनके पास न धन था, न रहने का कोई निश्चित स्थान और न ही किसी प्रकार का भौतिक साधन। उनके पास केवल एक संकल्प था—राष्ट्र जीवन के निर्माण के लिए अधिक से अधिक लोगों को जोड़ना।
बताया जाता है कि अनु जी का नियमित आना-जाना देवी भवन मंदिर परिसर में चलने वाले कुश्ती अखाड़े में था। वे स्वयं भी कुश्ती और व्यायाम के शौकीन थे। उन्होंने अखाड़े में पहलवानों के साथ अभ्यास करना आरंभ किया। इससे वहां आने वाले युवाओं, बच्चों और बुजुर्गों से उनका सहज परिचय बढ़ने लगा। उनका सरल स्वभाव, अनुशासित जीवन और आत्मीय व्यवहार लोगों का विश्वास जीतता चला गया।
धीरे-धीरे जब पर्याप्त संपर्क बन गया तो उन्होंने एक उपयुक्त स्थान पर नियमित शाखा प्रारंभ की। शाखा का स्वरूप लगभग वही था जो आज भी संघ की पहचान है—भगवा ध्वज को प्रणाम, कबड्डी और खो-खो जैसे खेल, छोटे-छोटे सामूहिक व्यायाम, देशभक्ति के गीत, प्रेरक विचार-विमर्श और अंत में संघ प्रार्थना। इन गतिविधियों ने बच्चों, युवाओं और समाज के विभिन्न वर्गों को आकर्षित किया। देखते ही देखते शाखा में आने वाले स्वयंसेवकों की संख्या बढ़ने लगी और संघ कार्य धीरे-धीरे मजबूत आधार प्राप्त करता गया।
पुराने स्वयंसेवक यह भी बताते हैं कि जब अनु जी नागपुर से निकले थे, तब उनकी जेब में बहुत कम धन था। कई दिनों तक भुने हुए चने, गुड़ और पानी ही उनके भोजन का आधार रहे। रात्रि में कभी दुकानों की पटरियों पर सोकर रात बितानी पड़ती थी। लेकिन उनके चेहरे पर न निराशा दिखाई देती थी और न ही कठिनाइयों की शिकायत। उनके मन में केवल एक ध्येय था—समाज को संगठित करना और राष्ट्रभाव को जागृत करना।
समय के साथ जब स्थानीय लोगों का विश्वास बढ़ा तो कार्यकर्ताओं ने अपने घरों के द्वार उनके लिए खोल दिए। भोजन और रहने की व्यवस्था होने लगी। बाद में कार्यकर्ताओं के सहयोग से कार्यालय और स्थायी व्यवस्था भी बन गई। इस प्रकार एक छोटे से प्रयास ने धीरे-धीरे संगठित रूप धारण कर लिया।
वास्तव में केवल हिसार ही नहीं, बल्कि देश के अनेक नगरों और गांवों में संघ कार्य का प्रारंभ लगभग इसी प्रकार के त्याग, परिश्रम और जनसंपर्क के माध्यम से हुआ। प्रचारकों ने व्यक्तिगत सुविधा, परिवार और आर्थिक सुरक्षा का विचार किए बिना समाज के बीच रहकर कार्य किया। यही कारण है कि संघ का विस्तार किसी सरकारी सहायता या बड़े संसाधनों से नहीं, बल्कि व्यक्ति-निर्माण और विश्वास के आधार पर हुआ।
आज जब हम संघ के व्यापक सेवा कार्यों, शाखाओं और सामाजिक योगदान को देखते हैं, तब उन प्रारंभिक प्रचारकों का संघर्ष स्मरण करना स्वाभाविक है। उनका जीवन यह संदेश देता है कि किसी भी बड़े संगठन की वास्तविक शक्ति भवनों या साधनों में नहीं, बल्कि समर्पित व्यक्तित्वों के तप, त्याग, अनुशासन और समाज के विश्वास में निहित होती है। यही वे मूल्य हैं जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी संघ कार्य को निरंतर आगे बढ़ाया और उसे समाज जीवन की एक महत्वपूर्ण धारा के रूप में स्थापित किया।
-सुरेश गोयल धूप वाला