आज मां ने फिर याद किया

भूली बिसरी चितराई सी

कुछ यादें बाकी हैं अब भी

जाने कब मां को देखा था

जाने उसे कब महसूस किया

पर , हां आज मां ने फिर याद किया ।।।

बचपन में वो मां जैसी लगती थी

मैं कहता था पर वो न समझती थी

वो कहती की तू बच्चा है

जीवन को नहीं समझता है

ये जिंदगी पैसों से चलती है

तेरे लिए ये न रूकती है

मुझे तुझकों बडा बनाना है

सबसे आगे ले जाना है

पर मैं तो प्यार का भूखा था

पैसे की बात न सुनता था

वो कहता थी मैं लडता था

वो जाती थी मैं रोता था

मैं बडा हुआ और चेहरा भूल गया

मां की आंखों से दूर गया

सुनने को उसकी आवाज मै तरस गया

जाने क्यूं उसने मुझको अपने से दूर किया

पर, हां आज मां फिर ने याद किया ।।।

मैं बडा हुआ पैसे लाया

पर मां को पास न मैने पाया

सोचा पैसे से जिंदगी चलती है

वो मां के बिना न रूकती है

पर प्यार नहीं मैंने पाया

पैसे से जीवन न चला पाया

मैंने बोला मां को , अब तू साथ मेरे ही चल

पैसे के अपने जीवन को , थोडा मेरे लिए बदल

मैंने सोचा , अब बचपन का प्यार मुझे मिल जायेगा

पर मां तो मां जैसी ही थी

वो कैसे बदल ही सकती थी

उसको अब भी मेरी चिंता थी

उसने फिर से वही जवाब दिया

की तू अब भी बच्चा है

जीवन को नहीं समझता है

ये जिंदगी पैसों से चलती है

तेरे लिए ये न रूकती है

सोचा कि मैंने अब तो मां को खो ही दिया

पर, हां आज मां ने फिर याद किया ।।।

-अंकुर विजयवर्गीय

3 thoughts on “आज मां ने फिर याद किया

  1. कविता ””’
    ”””””वो भोली गांवली”””’
    जलती हुई दीप बुझने को ब्याकुल है
    लालिमा कुछ मद्धम सी पड़ गई है
    आँखों में अँधेरा सा छाने लगा है
    उनकी मीठी हंसी गुनगुनाने की आवाज
    बंद कमरे में कुछ प्रश्न लिए
    लांघना चाहती है कुछ बोलना चाहती है
    संम्भावना ! एक नव स्वपन की मन में संजोये
    अंधेरे को चीरते हुए , मन की ब्याकुलता को कहने की कोशिश में
    मद्धम -मद्धम जल ही रही है
    ””””””””वो भोली गांवली ””””’सु -सुन्दर सखी
    आँखों में जीवन की तरल कौंध , सपनों की भारहीनता लिए
    बरसों से एक आशा भरे जीवन बंद कमरे में गुजार रही है
    दूर से निहारती , अतीत से ख़ुशी तलाशती
    अपनो के साथ भी षड्यंत्र भरी जीवन जी रही है
    छोटी सी उम्र में बिखर गई सपने
    फिर -भी एक अनगढ़ आशा लिए
    नये तराने गुनगुना रही है
    सांसों की धुकनी , आँखों की आंसू
    अब भी बसंत की लम्हों को
    संजोकर ”’साहिल ”” एक नया सबेरा ढूंढ़ रही है
    मन में उपजे असंख्य सवालों की एक नई पहेली ढूंढ़ रही है
    बंद कमरे में अपनी ब्याकुलता लिय
    एक साथी -सहेली की तालाश लिए
    मद भरी आँखों से आंसू बार -बार पोंछ रही है
    वो भोली सी नन्ही परी
    हर -पल , हर लम्हा
    जीवन की परिभाषा ढूंढ़ रही है ”””’
    00000लक्ष्मी नारायण लहरे ,युवा साहित्यकार पत्रकार
    छत्तीसगढ़ लेखक संघ संयोजक -कोसीर ,सारंगढ़ जिला -रायगढ़ /छत्तीसगढ़

  2. प्रिय बंधू सप्रेम साहित्य जोग ”””””””
    आपका कविता प्रसंसनीय है हार्दिक बधाई ””””””””””””””

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