— ललित गर्ग —
जैन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा त्याग, तपस्या, संयम, आत्मजागरण और वैराग्य की ऐसी गौरवशाली परंपरा है, जिसमें जीवन की सार्थकता केवल जीने में नहीं, बल्कि जीवन के अंतिम क्षणों को भी सजगता, समता और आत्मशुद्धि से परिपूर्ण बनाने में निहित है। इस परंपरा में संथारा अथवा संलेखना एक ऐसी विशिष्ट आध्यात्मिक साधना है, जो मनुष्य को देह की सीमाओं से ऊपर उठकर आत्मस्वरूप के चिंतन की प्रेरणा देती है। जैन धर्म में अनेक आचार्यों, मुनियों और साध्वियों ने अपनी तपस्या, त्याग और समाधिमरण से इस परंपरा को समृद्ध किया है। वहीं श्रावक-श्राविकाओं ने भी अपने संयमित जीवन और साधनामय अंतिम यात्रा से यह सिद्ध किया है कि आध्यात्मिक उत्कर्ष केवल मुनि-जीवन तक सीमित नहीं, बल्कि श्रद्धा, विवेक और आत्मानुशासन से गृहस्थ जीवन में भी संभव है।
इसी पवित्र परंपरा की एक भावपूर्ण कड़ी हैं दिल्ली और नोएडा के प्रतिष्ठित बोथरा परिवार की मातृशक्ति श्रीमती कान्तादेवी बोथरा, धर्मपत्नी स्वर्गीय श्री पूनमचंदजी बोथरा, जिन्होंने 5 अक्टूबर को प्रातः 8 बजकर 28 मिनट पर सागरी संथारा के माध्यम से समाधिमरण प्राप्त किया। उनका यह महाप्रयाण परिवार के लिए अपूरणीय वियोग का प्रसंग है, किंतु आध्यात्मिक दृष्टि से उनके धर्ममय जीवन, श्रद्धा और साधना का स्मरण करने का अवसर भी है। उनका जीवन हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि मनुष्य की वास्तविक महानता उसके सांसारिक वैभव में नहीं, बल्कि उसकी आंतरिक निर्मलता, धार्मिक निष्ठा, संयम और आत्मकल्याण की भावना में निहित होती है।
जैन दर्शन में संथारा को सामान्य मृत्यु की घटना के रूप में नहीं, बल्कि विशिष्ट आध्यात्मिक भावभूमि में समझा जाता है। संलेखना का मूल भाव है—कषायों को क्षीण करना, राग-द्वेष को कम करना, मोह-ममता के बंधनों को शिथिल करना और जीवन के अंतिम चरण में समता एवं सजगता का विकास करना। यह साधना बाहरी त्याग से अधिक आंतरिक रूपांतरण की प्रक्रिया है। इसमें शरीर के प्रति अनावश्यक आसक्ति से ऊपर उठते हुए आत्मा के स्वरूप, कर्मबंधनों और जीवन की अनित्यता का चिंतन महत्त्वपूर्ण होता है।
सागरी संथारा इसी व्यापक साधना-परंपरा से जुड़ा एक विशिष्ट प्रसंग है। इसकी आध्यात्मिक गरिमा को समझने के लिए उसके पीछे निहित विवेक, वैराग्य, आत्मस्वीकृति और धार्मिक मार्गदर्शन के महत्त्व को समझना आवश्यक है। यह किसी क्षणिक आवेग, निराशा अथवा जीवन से पलायन की भावना का नाम नहीं, बल्कि जैन परंपरा में वर्णित आत्मसंयम और समाधि की भावना से जुड़ा विषय है। इसकी सार्थकता बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि साधक की आंतरिक सजगता, समता और कषायमुक्ति के प्रयास में देखी जाती है।
जैन दर्शन हमें सिखाता है कि जीवन और मृत्यु दोनों अनित्य हैं। शरीर परिवर्तनशील है, जबकि आत्मा को जैन दर्शन में स्वतंत्र, चेतन और शाश्वत तत्त्व माना गया है। इस दृष्टि से मृत्यु का चिंतन भय उत्पन्न करने के लिए नहीं, बल्कि जीवन को अधिक विवेकपूर्ण, करुणामय और संयमित बनाने के लिए है। संथारा की आध्यात्मिक अवधारणा भी इसी आत्मचिंतन की ओर प्रेरित करती है। श्रीमती कान्तादेवी बोथरा की साधनामय जीवनयात्रा का स्मरण करते हुए यही भावना जागृत होती है कि धर्म का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वह जीवन के व्यवहार से लेकर अंतिम समय तक मनुष्य को समता, शांति और आत्मावलोकन की प्रेरणा देता रहे।
श्रीमती कान्तादेवी बोथरा केवल एक परिवार की माता नहीं थीं, बल्कि संस्कारों, धार्मिक आस्था और पारिवारिक एकता की संवाहिका थीं। भारतीय संस्कृति में मां को प्रथम गुरु कहा गया है, क्योंकि वही बच्चे के भीतर श्रद्धा, करुणा, अनुशासन, सेवा और सदाचार के बीज बोती है। मां का व्यक्तित्व परिवार के जीवन में उस अदृश्य शक्ति की तरह कार्य करता है, जो पीढ़ियों को जोड़ती है और कठिन समय में भी उन्हें अपने मूल्यों से विचलित नहीं होने देती।
स्वर्गीय श्री पूनमचंदजी बोथरा का परिवार बीदासर, दिल्ली और नोएडा में अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा, धार्मिक निष्ठा और संघसेवा के लिए जाना जाता है। इस परिवार की विशेष पहचान तेरापंथ धर्मसंघ के प्रति समर्पण, आचार्यों के प्रति श्रद्धा और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में रही है। परम पूज्य आचार्यश्री तुलसी, आचार्यश्री महाप्रज्ञ और वर्तमान युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के प्रति परिवार की गुरु-भक्ति और संघनिष्ठा इसकी गौरवशाली परंपरा के महत्त्वपूर्ण आधार रहे हैं।
इस परंपरा को आगे बढ़ाने में माताजी के संस्कारों की भूमिका को विस्मृत नहीं किया जा सकता। किसी परिवार की वास्तविक संपन्नता उसकी धन-संपदा से नहीं, बल्कि उसके सदस्यों के चरित्र, सेवा-भाव और नैतिक प्रतिबद्धता से मापी जाती है। मां जब अपने बच्चों को धर्म के प्रति श्रद्धा, समाज के प्रति संवेदना और गुरु के प्रति समर्पण का संस्कार देती है, तब वह केवल परिवार का निर्माण नहीं करती, बल्कि समाज की भावी दिशा को भी प्रभावित करती है।
मां शरीर से विदा हो सकती है, लेकिन उसके दिए संस्कार कभी विदा नहीं होते। उसकी सीख संतानों के निर्णयों में, उसकी प्रार्थना उनके संकल्पों में और उसका स्नेह उनके व्यवहार में जीवित रहता है। सचमुच, मां दूर नहीं जाती; वह स्मृतियों में संवेदना, संस्कारों में शक्ति और धड़कनों में प्रार्थना बनकर बस जाती है। श्रीमती कान्तादेवी बोथरा की जीवन-साधना का सबसे महत्त्वपूर्ण संदेश भी यही है कि धर्म केवल पूजा-पाठ का विषय नहीं, बल्कि जीवन को मानवीय, संयमित और मूल्यनिष्ठ बनाने की सतत प्रक्रिया है।
स्वर्गीय श्री पूनमचंदजी बोथरा की गुरु-भक्ति, शासन-भक्ति और संघसेवा की परंपरा को उनके परिवार ने निरंतर आगे बढ़ाया है। श्री बजरंगजी बोथरा और श्री लक्ष्मीपतजी बोथरा ने अपनी सामाजिक सक्रियता, धार्मिक निष्ठा और सेवा-समर्पण से इस परंपरा को नई ऊंचाइयां प्रदान की हैं। उनके कार्य इस बात का उदाहरण हैं कि सच्ची गुरु-भक्ति केवल श्रद्धा व्यक्त करने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि वह सेवा, उत्तरदायित्व और सामूहिक कल्याण के कार्यों में रूपांतरित होती है।
वर्ष 2027 में परम पूज्य युगप्रधान आचार्यश्री महाश्रमणजी के दिल्ली चातुर्मास तथा वर्ष 2028 के मर्यादा महोत्सव की व्यवस्था समिति में श्री बजरंगजी बोथरा वरिष्ठ उपाध्यक्ष के रूप में महत्त्वपूर्ण दायित्व निभा रहे हैं। इसी प्रकार शासनमाता साध्वीप्रमुखा कनकप्रभाजी की स्मृति में महरौली में निर्मित वात्सल्य पीठ के निर्माण में श्री लक्ष्मीपतजी बोथरा की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। इन कार्यों में उनकी सहभागिता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि उस धार्मिक विरासत का विस्तार है, जिसमें सेवा को साधना और समर्पण को धर्म का व्यावहारिक स्वरूप माना जाता है।
माताजी के समाधिमरण के पश्चात इन दायित्वों का महत्त्व और बढ़ जाता है। यह समय परिवार के लिए अपनी भावनाओं को धर्ममय संकल्प में बदलने का है। गुरुसेवा, संघसेवा और समाजसेवा के माध्यम से माताजी द्वारा पोषित संस्कारों को आगे बढ़ाना उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि का एक महत्त्वपूर्ण रूप हो सकता है। जब किसी मां की संतानों का जीवन सेवा और सदाचार की दिशा में आगे बढ़ता है, तब उसके संस्कार परिवार की सीमाओं से निकलकर व्यापक समाज की धरोहर बन जाते हैं।
मृत्यु जीवन का ऐसा सत्य है, जिसे मनुष्य जानते हुए भी प्रायः स्वीकार नहीं करना चाहता। वह संसार के निर्माण में जीवन लगा देता है, लेकिन जीवन की अनिवार्य परिणति के विषय में विचार करने से बचता है। जैन दर्शन इस प्रवृत्ति के स्थान पर जागरूकता, अनित्यता-बोध और आत्मचिंतन का मार्ग प्रस्तुत करता है। मृत्यु का स्मरण जीवन के प्रति उदासीन होने के लिए नहीं, बल्कि प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करने के लिए है।
जैन आचार-विचार में राग और द्वेष को आत्मिक अशांति के प्रमुख कारणों में माना गया है। मनुष्य जितना अधिक मोह, अहंकार, लोभ और प्रतिशोध में उलझता है, उतना ही अपने भीतर की शांति से दूर होता जाता है। इसके विपरीत, क्षमा, विनम्रता, अपरिग्रह और समता उसे आंतरिक स्वतंत्रता की ओर ले जाते हैं। यही वे मूल्य हैं, जिनकी प्रासंगिकता किसी एक धार्मिक समुदाय तक सीमित नहीं है।
श्रीमती कान्तादेवी बोथरा की स्मृति में हमें यही संकल्प ग्रहण करना चाहिए कि हम जीवन रहते अपने संबंधों को मधुर बनाएं, मन में संचित कटुता को दूर करें, अपने व्यवहार में करुणा लाएं और अपने दायित्वों को ईमानदारी से निभाएं। यदि मृत्यु का बोध हमें जीवन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है, तो वह बोध सार्थक है। यदि धर्म हमें दूसरों के दुःख को समझना और उनके प्रति सहानुभूति रखना सिखाता है, तो वही धर्म जीवन में जीवंत होता है।
संथारा और समाधिमरण की चर्चा करते समय यह भी आवश्यक है कि हम इस विषय की आध्यात्मिक गंभीरता और व्यक्तिगत संवेदनशीलता को समझें। ऐसी साधना का मूल्यांकन श्रद्धा के साथ-साथ समुचित धार्मिक मार्गदर्शन, व्यक्ति की सजगता और उसकी परिस्थितियों के संदर्भ में होना चाहिए। इसे आम लोगों के लिए मृत्यु का अनुकरणीय विकल्प मानने के बजाय आत्मसंयम, वैराग्य, क्षमा और समता जैसे जीवनमूल्यों की प्रेरणा के रूप में ग्रहण करना अधिक सार्थक है। आध्यात्मिकता का उद्देश्य जीवन के प्रति जिम्मेदारी से विमुख होना नहीं, बल्कि जीवन को अधिक जागरूक और मूल्यवान बना.
श्रीमती कान्तादेवी बोथरा का समाधिमरण उनके परिवार और परिचितों के लिए गहन भावनात्मक क्षण है। मां का वियोग ऐसा रिक्त स्थान छोड़ता है, जिसकी भरपाई संसार की कोई उपलब्धि नहीं कर सकती। फिर भी भारतीय और जैन आध्यात्मिक परंपरा दुःख के बीच समता, स्मृति के बीच कृतज्ञता और वियोग के बीच आत्मबल खोजने की प्रेरणा देती है। समता का अर्थ आंसुओं को रोकना या संवेदनाओं को दबाना नहीं, बल्कि दुःख को स्वीकार करते हुए स्वयं को विवेक और धर्म से जोड़ना है।
जीवन की अंतिम यात्रा को लेकर जैन दर्शन हमें आत्मा, कर्म और मुक्ति के गहन प्रश्नों पर विचार करने की प्रेरणा देता है। मोक्ष की यात्रा केवल अंतिम क्षणों में नहीं आरंभ होती; उसका आधार जीवन भर के सम्यक् चिंतन, सम्यक् आचरण, संयम और कषायों को कम करने के प्रयासों में निर्मित होता है। इस दृष्टि से किसी साधक की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान तभी पूर्ण होता है, जब उसके जीवन से प्रेरित होकर हम अपने वर्तमान को अधिक निर्मल बनाएं।
मृत्यु जीवन की यात्रा का विराम हो सकती है, लेकिन संस्कारों की यात्रा का अंत नहीं। शरीर की अनुपस्थिति स्मृतियों को मिटा नहीं सकती और वियोग की वेदना उस प्रेरणा को समाप्त नहीं कर सकती, जो किसी धर्मनिष्ठ जीवन से जन्म लेती है। मां के चरणों से मिले संस्कार जब संतानों के कर्मों में उतरते हैं, तब उसका जीवन अपने पीछे एक ऐसी ज्योति छोड़ जाता है, जो समय के साथ और अधिक प्रकाशवान होती जाती है।
इन्हीं मंगलभावनाओं के साथ श्रीमती कान्तादेवी बोथरा को भावभीनी श्रद्धांजलि, कोटिशः नमन और विनम्र अभिवादन। जैन दर्शन की मंगलकामना के अनुरूप उनकी आत्मा की आध्यात्मिक उन्नति की भावना पुष्ट हो तथा समस्त बोथरा परिवार को इस गहन वियोग को धैर्य, समता और आध्यात्मिक शक्ति के साथ सहन करने का सामर्थ्य प्राप्त हो। उनकी धर्मनिष्ठ जीवनयात्रा और समाधिमरण की स्मृति सेवा, संयम, श्रद्धा और आत्मचिंतन की प्रेरणा बनकर समाज के हृदय में सदैव जीवित रहे.