More
    Homeराजनीतिनौनिहालों को दहशतगर्दी की तालीम

    नौनिहालों को दहशतगर्दी की तालीम


    प्रमोद भार्गव

    दक्षिण-कश्मीर के शोपियां जिले में एक धार्मिक मदरसे के 13 छात्रों के आतंकवादी समूहों में शामिल होने की खबर अत्यंत चिंताजनक है। जामिया-सिराज-उल-उलूम नाम के इस मदरसे के तीन अध्यापकों को जन-सुरक्षा अधिनियम (पीएसए) के तहत बंदी बनाया गया है। अन्य छह अध्यापक संदेह के घेरे में हैं। इसे कश्मीर के नामी मदरसों में गिना जाता है। इसके पहले भी यह मदरसा हिंसक घटनाओं, राष्ट्र विरोधी गतिविधियों और यहां के छात्रों के आतंकी वारदातों में शामिल होने के कारण जांच एजेंसियों के रडार पर रहा है। हैरानी की बात है कि पिछले कुछ सालों में जो छात्र दक्षिण-कश्मीर में मारे गए हैं, उनमें से 13 ने इसी मदरसे से आतंक का पाठ पढ़ा था। पुलवामा हमले में शामिल रहे सज्जाद बट ने भी यहीं से पढ़ाई की थी, जिसे इसी साल अगस्त में सुरक्षाबलों ने मारा है। अल-बदर का आतंकी जुबैर नेंगरू, हिज्बुल का आतंकी नाजमीन डार और एजाज अहमद पाल भी जिहाद की इसी पाठशाला से निकले थे। यह मदरसा जमात-ए-इस्लामी से जुड़ा है। इस मदरसे में जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तर-प्रदेश, केरल, और तेलंगाना के छात्र भी पढ़ने आते हैं।

    इस खुलासे से साफ है कि घाटी में सेना, सुरक्षाबलों और स्थानीय पुलिस का शिकंजा कस रहा है। इसलिए आतंकी संगठन मदरसों को ठिकाना बनाकर छात्रों को आतंकी बनाने का क्रूर खेल, खेलने में लग गए हैं। बच्चों धार्मिक कट्टरता के बहाने आतंक का पाठ पढ़ाना आसान होता है। चूंकि धारा-370 और 35-ए के खात्मे के बाद घाटी की आम जनता खुले रूप में न केवल मुख्यधारा में शामिल हो रही है, बल्कि शासन-प्रशासन की योजनाओं में बढ़-चढ़कर भागीदारी भी कर रही है। इसलिए आतंकी संगठन जनता में घुसपैठ बनाने में नाकाम साबित हो रहे हैं। नतीजतन ये उन मदरसों में घुसपैठ कर रहे हैं जिनका इतिहास आतंकियों की शरणस्थली बने रहने का रहा है।

    घाटी के आतंकी दौर की हकीकत रही है कि पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोम्मद और हिजबुल मुजाहिद्दीन ने जम्मू-कश्मीर में सेना और सुरक्षा बलों पर जो आत्मघाती हमले कराए हैं, उनमें बड़ी संख्या में मासूम बच्चों और किशोरों का इस्तेमाल किया गया था। इस सत्य का खुलासा संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् की ‘बच्चे एवं सशस्त्र संघर्ष’ नाम से आई रिपोर्ट में भी किया गया था। रिपोर्ट के मुताबिक ऐसे आतंकी संगठनों में शामिल किए जाने वाले बच्चे और किशोरों को आतंक का पाठ मदरसों में पढ़ाया गया है। साल 2017 में कश्मीर में हुए तीन आतंकी हमलों में बच्चों के शामिल होने के तथ्य की पुष्टि हुई थी। पुलवामा जिले में मुठभेड़ के दौरान 15 साल का एक नाबालिग मारा गया था और सज्जाद बट शामिल था, जिसे अगस्त-2020 में सुरक्षाबलों ने मारा है। यह रिपोर्ट जनवरी-2017 से दिसंबर तक की है।

    रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान में मौजूद आतंकी संगठनों ने ऐसे वीडियो जारी किए हैं, जिनमें किशोरों को आत्मघाती हमलों का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पाकिस्तान में सशस्त्र समूहों द्वारा बच्चों व किशोरों को भर्ती किए जाने और उनका इस्तेमाल आत्मघाती हमलों मेें किए जाने की लगातार खबरें मिल रही हैं। जनवरी-17 में तहरीक-ए-तालिबान ने एक वीडियो जारी किया था, जिसमें लड़कियों सहित बच्चों को सिखाया जा रहा है कि आत्मघाती हमले किस तरह किए जाते हैं। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि दुनियाभर में बाल अधिकारों के हनन के 21,000 मामले सामने आए हैं। पिछले साल दुनियाभर में हुए संघर्षों में 10,000 से भी ज्यादा बच्चे मारे गए या विकलांगता का शिकार हुए। आठ हजार से ज्यादा बच्चों को आतंकियों, नक्सलियों और विद्रोहियों ने अपने संगठनों में शामिल किया है। ये बच्चे युद्ध से प्रभावित सीरिया, अफगानिस्तान, यमन, फिलीपिंस, नाईजीरिया, भारत और पाकिस्तान समेत 20 देशों के हैं।

    भारत के जम्मू-कश्मीर में युवाओं को आतंकवादी बनाने की मुहिम कश्मीर के अलगाववादी चलाते रहे हैं। इस तथ्य की पुष्टि 20 वर्षीय गुमराह आतंकवादी अरशिद माजिद खान के आत्मसमर्पण से हुई थी। अरशिद कॉलेज में फुटबॉल का अच्छा खिलाड़ी था। किंतु कश्मीर के बिगड़े माहौल में धर्म की अफीम चटा देने के कारण वह बहक गया और लश्कर-ए-तैयबा में शामिल हो गया। उसके आतंकवादी बनने की खबर मिलते ही मां-बाप जिस बेहाल स्थिति को प्राप्त हुए टीवी चैनलों पर दिखाए गए थे, उससे अरशिद का हृदय पिघल गया और वह घर लौट आया।

    दरअसल कश्मीरी युवक जिस तरह से आतंकी बनाए जा रहे हैं, यह पाकिस्तानी सेना और वहां पनाह लिए आतंकी संगठनों का नापाक मंसूबा है। इसके लिए मुस्लिम कौम के उन गरीब व लाचार बच्चों, किशोर और युवाओं को इस्लाम के बहाने आतंकवादी बनाने का काम मदरसों में किया जा रहा है, जो अपने परिवार की आर्थिक बदहाली दूर करने के लिए आर्थिक सुरक्षा चाहते हैं। पाक सेना के भेष में यही आतंकी अंतरराष्ट्रीय नियंत्रण रेखा को पार कर भारत-पाक सीमा पर छद्म युद्ध लड़ रहे हैं। कारगिल युद्ध में भी इन छद्म बहरुपियों की मुख्य भूमिका थी। इस सच्चाई से पर्दा संयुक्त राष्ट्र ने अब उठाया है, किंतु खुद पाक के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल एवं पाक खुफिया एजेंसी आईएसआई के सेवानिवृत्त अधिकारी रहे, शाहिद अजीज ने ‘द नेशनल डेली अखबार’ में पहले ही उठा दिया था। अजीज ने कहा था कि ‘कारगिल की तरह हमने कोई सबक नहीं लिया है। हकीकत यह है कि हमारे गलत और जिद्दी कामों की कीमत हमारे बच्चे अपने खून से चुका रहे हैं।’

    कमोबेश आतंकवादी और अलगाववादियों की शह के चलते यही हश्र कश्मीर के युवा भोग रहे हैं। पाक की इसी दुर्भावना का परिणाम था कि जब 10 लाख का खूंखार इनामी बुरहान वानी भारतीय सेना के हाथों मारा गया तो उसे शहीद बताने के बाबत जो प्रदर्शन हुए थे, उनमेें करीब 100 कश्मीरी युवक मारे गए थे। दरअसल यह स्थिति धारा-370 खत्म होने से पहले तक सीमा पार से अलगाववादियों को मिल रहा बेखौफ प्रोत्साहन रहा था। जबकि अलगाव का नेतृत्व कर रहे कश्मीरी नेताओं में ज्यादातर के बीबी-बच्चे कश्मीर की सरजमीं पर रहते ही नहीं हैं। इनके दिल्ली में आलीशान घर हैं और इनके बच्चे देश के नामी स्कूलों में या तो पढ़ रहे हैं या फिर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों में नौकरी कर रहे हैं।

    इन्हीं अलगाववादियों की शह से घाटी में संचार सुविधाओं के जरिए चरमपंथी माहौल विकसित हुआ था। अलगाववाद से जुड़ी जो सोशल साइटें हैं, वे युवाओं में भटकाव पैदा कर रही थीं। इसीलिए जब भी रमजान के महीने में केंद्र सरकार ने उदारता बरती तब इसके सकारात्मक परिणाम निकलने की बजाय सेना को पत्थरबाजों का दंश झेलना पड़ा था। यही नहीं संघर्ष विराम का लाभ उठाते हुए आतंकियों ने राइफलमैन औरंगजेब और संपादक शुजात बुखारी की निर्मम हत्याएं कर दी थीं। इन घटनाओं से प्रेरित होकर अलगाववादियों ने आजादी की मांग के साथ इस्लामिक स्टेट को जम्मू-कश्मीर में लाने का नारा बुलंद कर दिया था। यही वजह रही थी कि पहले कश्मीर के भटके युवा अपने लोगों को नहीं मारते थे और न ही पर्यटकों व पत्रकारों को हाथ लगाते थे। लेकिन इसके बाद जो भी उन्हें, उनके रास्ते में बाधा बनता दिखा, उसे निपटाने लग गए थे। इसी क्रम में औरंगजैब और शुजात बुखारी से पहले ये आतंकी उपनिरीक्षक गौहर अहमद, लेफ्टिनेंट उमर फैयाज और डीएसपी अयूब पंडित की भी हत्या कर चुके थे।

    सैन्य विशेषज्ञों का भी मानना है कि पहले ज्यादातर आतंकी कम पढ़े-लिखे थे, लेकिन बाद में जो आतंकी सामने आए, वे काफी पढ़े-लिखे थे। यही वजह है कि ये ज्यादा निरंकुश और दुर्दांत रूप में पेश आए थे। बहरहाल देश की जांच एजेंसियों और स्थानीय पुलिस को घाटी में मौजूद मदरसों व अन्य शैक्षिक संस्थाओं पर नियंत्रण व निगरानी बनाए रखने की जरूरत है, जिससे आतंकी छात्रों के कोमल व निर्दोष मन-मस्तिष्क को राष्ट्रघाती मंशाओं के अनुरूप ढालने में सफल नहीं होने पाए।

    प्रमोद भार्गव
    प्रमोद भार्गवhttps://www.pravakta.com/author/pramodsvp997rediffmail-com
    लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

    LEAVE A REPLY

    Please enter your comment!
    Please enter your name here

    * Copy This Password *

    * Type Or Paste Password Here *

    11,674 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress

    Captcha verification failed!
    CAPTCHA user score failed. Please contact us!

    Must Read