सफ़र लिखूँ मैं इसलिए, याद रहे हर मोड़।
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़।।
राहों ने सिखला दिया, जीवन का व्यवहार।
अपने कितने साथ थे, किसने किया किनार॥
वक्त-वक्त की धूप ने, बदले कितने तोड़—
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
कुछ चेहरे मुस्कान थे, कुछ बन बैठे घाव।
कुछ ने थामा हाथ तो, कुछ कर गए दुराव॥
साथ चले जो दूर तक, गए अचानक छोड़—
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
सपनों की गठरी लिए, निकला था नादान।
ठोकर ने हर मोड़ पर, रची नई पहचान॥
आँसू, हँसी, संघर्ष सब, जीवन की थी ओढ़—
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
अपनेपन के नाम पर, मिलते रहे हिसाब।
रिश्तों के बाजार में, बिकते देखे ख्वाब॥
मन के कच्चे धागे भी, समय गया जब तोड़—
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
फिर भी हिम्मत हारकर, बैठा नहीं मुँह फेर।
अंधियारों के बीच भी, खोजा नया सवेर॥
गिरकर फिर उठता रहा, लेकर जीवन दौड़ —
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
‘सौरभ’ जीवन-पथ का, यही रहा निचोड़।
चलते रहना सीख ले, चाहे टूटें जोड़॥
यादों की इस पोटली, संचित हर इक मोड़—
कितनी दूर चला यहाँ, कितने टूटे जोड़॥
✍️ — डॉ. सत्यवान सौरभ